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आधुनिक लोकतंत्र एवं अवसर की समानता

  • आनन्द कुमार त्रिपाठी 

 

आधुनिक लोकतंत्रीय राज्यों में ‘ अवसर की समानता ‘ की लंबी चौड़ी बातें की जाती हैं , परंतु फिर भी यह देखने में आता है कि ऊंचे पदों पर कुछ विशेष वर्गों का एकाधिकार बना रहता है । भारत की प्रशासनिक सेवाओं की रचना में पिछले चार – पांच दशकों के दौरान कुछ परिवर्तन अवश्य आया है , फिर भी कुल मिलाकर उनमें एक विशिष्टवर्ग की ही प्रधानता है । इनमें से अधिकांश किन्हीं विशेष परिवारों में जन्मे हैं , किन्हीं विशेष स्कूलों और कॉलेजों में पढ़ें हैं, एक विशेष प्रकार के सामाजिक ढांचे में पले – बढ़े हैं , और तो और अभी दुनियाँ के सबसे बड़े लोकतंत्र संयुक्त राज्य अमेरिका की न्याय पालिका ने नामचीन शिक्षातंत्रों में प्रवेश के लिए वर्षों से चले आ रहे घोटालों के ख़िलाफ़ की गयी कार्यवाही, शिक्षा तंत्र के घोटालों को उजागर करती है। ब्यौरे बतातें हैं की धनी अभिभावकों ने प्रसिद्ध शिक्षा संस्थानों में बच्चों को प्रवेश दिलाने के लिए किस तरह पैसे खर्च किये और उन संस्थाओं ने कैसे नियमों की धज्जियां उड़ाई इसलिए ज़ाहिर सी बात है की यह भारत के शिक्षा संस्थाओं में भी व्याप्त है और यहाँ प्रवेश तो छोड़िये शिक्षा संस्थाओं में नौकरियों की भी यही स्थिति है यहाँ गौर करने वाली बात है की यह दशा अन्य विभागों में भी है। कुछ अपवाद छोड़ दिए जाए तो लगभग यही व्यवस्था प्रशासन,न्याय और विधायिका में भी चलन में है।
अत : ऐसे लोगों का जीवन के प्रति एक विशेष दृष्टिकोण है। इन्होंने भारत के आम आदमी के संघर्ष को उस तरह नहीं झेला जिससे वे अपने – आपको उसकी स्थिति में रखकर देख सकें । ये अपनी योग्यता से तो आगे आए हैं , परंतु इन्हें एक छोटे से वर्ग के साथ मुक़ाबला करना पड़ा है । इनसे कहीं सुयोग्य और प्रतिभाशाली व्यक्ति साधनों के अभाव में बीच रास्ते में छूट गए , या भटक गए । फिर उन्हें इनके साथ चलने का अवसर कभी नहीं मिला। अतः आज के वर्तमान चरित्र को बदलने के लिए यह जरूरी है कि आगे बढ़ने का अवसर केवल संपन्न वर्गों का ‘ परमाधिकार ‘ न रहें । यदि साधारण परिवारों में जन्मे लोग केवल प्रतिभा और परिश्रम के बल ऊंचे पदों पर पहुँचने में समर्थ होंगे तो समाज की रचना भी बदल जाएगी , और उसका दृष्टिकोण भी।
समकालीन वर्तमान की रूप रेखा जगदीश्वर जी के इस शब्दों में इस तरह भी दिखाई देती है कि भारत विभाजनों का देश है। वर्ण विभाजन,गोत्र विभाजन,जाति विभाजन,धार्मिक विभाजन,अमीर-गरीब का विभाजन,पूंजीपति-मजदूर का विभाजन,मीडिया अमीर- मीडिया गरीब,डिजिटल समृद्ध -डिजिटल गरीब का विभाजन, छोटे-बड़े का विभाजन आदि। भारतीय समाज  बदल रहा है लेकिन पुराने विभाजन खत्म नहीं हो रहे। बल्कि विभाजन एक-दूसरे पर लदे हुए हैं। व्यक्ति एकाधिक विभाजनों की चपेट में है। विभाजन उसे भी प्रभावित करते  हैं जो इनको मानते हैं और उनको भी जो इनको नहीं मानते। पर यह स्थिति साम्यवादी सरकारों में नहीं रही है ऐसा कह कर बचा नहीं जा सकता है ,लोकतंत्र के सभी मॉडलों में यह एक गम्भीर समस्या है, अतः अभिजन वर्ग का विकेंद्रीकरण होना बहुत जरूरी है ख़ास कर के उस वर्ग विशेष का जिसका प्रत्यक्ष जुड़ाव सीधे जनता से है।
लेखक ‘अष्टाक्षर श्री’ दुनिया साहित्य की के फाउंडर हैं तथा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेखन करते हैं|
सम्पर्क- +918774511357, anandtripathi23@gmail.com
संदर्भ:
ओपी गाबा ( राजनीति विज्ञान विश्वकोश )
फ्रैंक ब्रुनी @ द न्यूयॉर्क टाइम्स 2019
प्रो० जगदीश्वर चतुर्वेदी/ फेसबुक वॉल से
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