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खुला दरवाजा

गणेश : प्रकृति और पर्यावरण का विराट रूपक

 

  • ध्रुव गुप्त 

 

तमाम काल्पनिक देवी-देवताओं, अंधविश्वासों और कर्मकांडों के बीच भी हमारे पुराणों में ऐसी बहुत सारी चीजें हैं जो अपनी दृष्टिसम्पन्नता और सरोकारों से चकित करती हैं। जरूरत है उन्हें वैज्ञानिक और समाजशास्त्रीय तरीके से पढ़ने और सोचने की। पुराणों में वर्णित गणेश का स्वरुप एक ऐसा विराट रूपक है जो प्रकृति और पर्यावरण के प्रति हमारी संवेदनाएं जगाता हैं और उनके प्रति हमें अपनी जिम्मेदारियों का बोध कराता है। गणेश पुराणों के सबसे अलबेले और विचित्र देवता हैं। महादेव शिव और देवी पार्वती के पुत्र कहे जाने वाले गणेश वस्तुतः कोई लौकिक अथवा अलौकिक अस्तित्व नहीं, प्रकृति की शक्तियों और सौंदर्य की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति हैं। इस रूपक को प्रामाणिकता देने के लिए उनके आसपास असंख्य मिथक गढ़े गए हैं जो कहीं-कहीं मूर्खतापूर्ण भी लग सकते हैं। यह रूपक देखने में कुछ अजीब तो है, लेकिन उसमें जीवन के कई गहरे अर्थ छुपे हैं। उनके रूप में प्रकृति और मनुष्य के बीच संपूर्ण सामंजस्य का एक आदर्श प्रतीक गढ़ा गया है।

गणेश का मस्तक हाथी का है। चूहे उनके वाहन हैं। बैल नंदी उनका मित्र और अभिभावक। मोर और साँप उनके परिवार के सदस्य ! पर्वत उनका आवास है। वन उनका क्रीड़ा-स्थल। आकाश उनकी छत। वे शक्ति के पुत्र हैं, लेकिन उनका प्रचलित रूप गढ़ने में नदी की बड़ी भूमिका रही है। कहा जाता है कि शक्तिरूपा पार्वती ने अपने शरीर के मैल से एक छोटी-सी आकृति गढ़ी और उस आकृति को गंगा में नहला दिया। गंगा के स्पर्श से उस आकृति में जान भी आई और वह विशालकाय भी हो गई। पार्वती ने उसे पुत्र कहा तो देवताओं ने उसे गांगेय कहकर संबोधित किया। गणेश गणपति के रूप में गणों के अधिपति तो हैं ही, उन्हें जल का अधिपति भी माना गया है। गणेश के चार हाथों में से एक हाथ में जल का प्रतीक शंख है। उनके दूसरे हाथ में सौंदर्य का प्रतीक कमल है। तीसरे हाथ में संगीत का प्रतीक वीणा है। उनके चौथे हाथ में शक्ति का प्रतीक परशु या त्रिशूल हैं। गणेश के शरीर का रंग हरा और लाल है। हरा रंग प्रकृति तथा लाल शक्ति का प्रतीक है।

स्वयं गणेश के नाम के पीछे प्रकृति से उनके एकात्म का रहस्य छुपा है। यह सर्वमान्य है कि काव्य के छंद की उत्पति प्रकृति में मौजूद विविध ध्वनियों से हुई थी। छन्दशास्त्र में कुल आठ गण होते हैं – नगण, भगण, मगण, जगण, यगण, रगण, सगण और तगण। ये गण प्रकृति की आठ अलग-अलग ध्वनियों के रूप हैं। गणेश इन आठों गणों के अधिष्ठाता देवता हैं। यह भी एक कारण है कि उन्हें गणेश नाम दिया गया। अब गणेश के परिवार को देखिए ! देवशिल्पी विश्वकर्मा की दैहिक और सृष्टि के रचेता ब्रह्मा की दो मानस पुत्रियाँ रिद्धि और सिद्धि उनकी दो पत्नियाँ हैं। रिद्धि और सिद्धि वस्तुतः देह में हवा के आने और जाने अर्थात प्राण और अपान की प्रतीक हैं जिनके बगैर कोई सृष्टि या जीवन संभव नहीं। गणेश की पत्नी सिद्धि से उन्हें शुभ या क्षेम और रिद्धि से लाभ नाम के दो पुत्र हुए। उन दो पुत्रों के नाम हम घरों या व्यावसायिक प्रतिष्ठानों पर बनाए जाने वाले स्वास्तिक के दोनों तरफ लिखते हैं। यह प्रतीक यह बताने के लिए है कि प्रकृति के प्रति आदर के बगैर जीवन में शुभ और लाभ की प्राप्ति संभव नहीं है।

गणेश और प्रकृति के एकात्म का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि उन्हें महँगी पूजन सामग्रियाँ, सोने-चाँदी और रत्न नहीं, प्रकृति में बहुतायत से मौजूद पेड़-पौधों की पत्तियाँ और घास-फूस सबसे ज्यादा प्रिय है। वे अकेले ऐसे देवता हैं जिनकी पूजा प्रकृति में मौजूद विभिन्न पेड़-पौधों की पत्तियों से करने का प्रावधान है। गणेश के इक्कीस मुख्य नाम बताए जाते हैं। पुराणों में उनकी पूजा के लिए उनके इक्कीस प्रमुख नामों से प्रकृति के इक्कीस प्रमुख पेड़-पौधों की पत्तियाँ अर्पण करने का विधान है। उनके नामों में से सुमुखायनम नाम से शमी के पत्ते, गणाधीशायनम नाम से भंगरैया के पत्ते, उमापुत्राय नाम से बेल के पत्ते, गजमुखाय नाम से दूब, लम्बोदराय नाम से बेर के पत्ते, हरसूनवे नाम से धतूरे के पत्ते, शूर्पकर्णाय नाम से तुलसी के पत्ते, वक्रतुण्डाय नाम से सेम के पत्ते, गुहाग्रजाय नाम से अपामार्ग के पत्ते, एकदंताय नाम से: भटकटैया के पत्ते, हेरम्बाय नाम से सिंदूर वृक्ष के पत्ते, चतुर्होत्रे नाम से तेजपात के पत्ते, सर्वेश्वराय नाम से अगस्त के पत्ते, विकराय नाम से कनेर के पत्ते, इभतुण्डाय नाम से अश्मात के पत्ते, विनायकाय नाम से मदार के पत्ते, कपिलाय नाम से अर्जुन के पत्ते, बटवे नाम से देवदारु के पत्ते, भालचंद्राय नाम से मरुआ के पत्ते, सुराग्रजाय नाम से गांधारी के पत्ते और सिद्धि विनायकाय नाम से केतकी के पत्ते चढाए जाते हैं। प्रकृति में हर तरफ बहुतायत से उपलब्ध हरी-भरी दूब गणेश को सर्वाधिक प्रिय है। जबतक इक्कीस दूबों की मौली उन्हें अर्पित नहीं की जाय, उनकी पूजा अधूरी मानी जाती है। शास्त्रों में उल्लेख है कि आम, पीपल और नीम के पत्तों वाली गणेश की मूर्ति घर के मुख्यद्वार पर लगाने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। गणेश के मिट्टी से जुड़ाव का एक प्रमाण यह भी है कि किसी भी मंदिर, घर या दुकान में गणेश की मूर्ति रखते समय यह ध्यान देना होता है कि उनके पैर जमीन का निश्चित रूप से स्पर्श करें। यदि उनके पैर भूमि से सटे न हों तो अनिष्ट की आशंका होती है।

हमारी प्रकृति की तरह ही सरलता और भोलापन गणेश का स्वभाव है। प्रकृति की शक्तियों के प्रतीक होने के कारण वे एक साथ मासूम, शक्तिशाली, योद्धा, विद्वान, कल्याणकारी, शुभ-लाभ और कुशल-क्षेम के दाता हैं। गणेश के प्रति सम्मान का अर्थ है कि प्रकृति में मौजूद सभी जीव-जंतुओं, जल, हवा, जंगल और पर्वत का सम्मान। सम्मान सौन्दर्य, कला और सात्विकता का। उन्हें आदिदेवता, देवताओं में प्रथम पूज्य और आदिपूज्य भी कहा गया है। इसका अर्थ है कि प्रकृति पहले, बाकी तमाम शक्तियाँ और उपलब्धियाँ उसके बाद। हिन्दू धर्म और संस्कृति में किसी भी शुभ कार्य का आरम्भ करने के पहले ‘श्री गणेशाय नमः’ कहने और लिखने की परंपरा है। मनुष्य तो क्या, त्रिपुरासुर के बध के पहले स्वयं उनके पिता शिव को भी उनकी आराधना करनी पड़ी थी। हमारे पूर्वजों द्वारा गणेश के इस अद्भुत रूप की कल्पना संभवतः यह बताने के लिए की गई है कि प्रकृति को सम्मान देकर और उसकी शक्तियों से सामंजस्य बिठाकर मनुष्य शक्ति, बुद्धि, कला, संगीत, सौंदर्य, भौतिक सुख, लौकिक सिद्धि, दिव्यता और आध्यात्मिक ज्ञान सहित कोई भी उपलब्धि हासिल कर सकता है। यही कारण है कि संपति, समृद्धि तथा सौन्दर्य की देवी लक्ष्मी और ज्ञान, कला तथा संगीत की देवी सरस्वती की पूजा भी गणेश के बिना पूरी नहीं मानी जाती है। गणेश की भी कोई मूर्ति तबतक संपूर्ण नहीं कही जाती जबतक उनके एक तरफ लक्ष्मी और दूसरी तरफ सरस्वती विराजमान न हो।

जैसा कि आम तौर पर होता आया है, प्रतीकों की गहराई में जाकर उन्हें समझने और अपने जीवन में उतारने की जगह हम प्रतीकों की ही पूजा करने लगते हैं। परिणाम यह होता है कि प्रतीक हमारे आराध्य बन बैठते हैं और वे तमाम चीज़ें विस्मृत हो जाती हैं जिनकी याद दिलाने के लिए वे प्रतीक गढ़े गए थे। स्त्री और मातृशक्ति की प्रतीक दुर्गा के साथ यही हुआ। ज्ञान और कला की देवी सरस्वती के साथ यही हुआ। गणेश के साथ भी यही हुआ। गणेश के वास्तविक स्वरुप को भुलाने का असर प्रकृति के साथ हमारे रिश्तों पर पड़ा है। आज प्रकृति और अपने अस्तित्व के सबसे बड़े संकट से रूबरू हैं और इस संकट में हम उसके साथ नहीं, उसके खिलाफ खड़े हैं। गणेश के अद्भुत स्वरुप को समझना और पाना है तो उसके लिए असंख्य मंदिरों और मूर्तियों की स्थापना, मंत्रों और भजन-कीर्तन का कोई अर्थ नहीं। गणेश हम सबके भीतर हैं। प्रकृति, पर्यावरण और जीवन को सम्मान और संरक्षण देकर हम अपने भीतर के गणेश को जगा सकते हैं !

लेखक भारतीय पुलिस सेवा के पूर्व अधिकारी तथा कवि एवं कथाकार हैं|

सम्पर्क- +919934990254, dhruva.n.gupta@gmail.com

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