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दास्तान ए दंगल सिंह

दास्तान-ए-दंगल सिंह (66)

 

  • पवन कुमार सिंह

 

माई के आँगन से निकला तो बाहर बाबूजी की प्रशस्त फुलवारी ने बाँहें फैलाकर स्वागत किया। दर्जनों किस्म के स्थाई सदाबहार फूलों और सजावटी पौधों से युक्त बाबूजी की वह बागवानी समय-समय पर विभिन्न रंग-बिरंगे मौसमी फूलों से गुलजार रहती थी। बाबूजी के हाथों में बचपन से जो कुछ पसंदीदा चीजों को देखने का अभ्यस्त हो चुका था, उनमें प्रमुख थी उनकी बंदूक, कलम, खुरपी और डंडा वाली झाड़ू। शिकार, खेती, सफाई और बागवानी ये ही चार शौक थे उनके। दरवाजे से बाहर खेलने की उम्र हुई तो घर के सामने ही बाबूजी के लगाए आम और अन्य मौसमी फलों के बगान में आश्रय था। डोल-डोलीचा, राम छुर, बुढ़िया कबड्डी, कबड्डी, गोलचुक्का, गुज्जु-गुज्जु, चोरिया-नुकिया, सामा-चकेवा, हरदी-गुरदी(पानी में) आदि खेलते बड़ा हुआ। इस दरम्यान पेड़-पौधों से नजदीकी साहचर्य के चलते उनसे गहरा आत्मीय रिश्ता बन गया और संस्कार में समा गया। प्रकृति-प्रेम और उसके कारण फुलवारी का शौक उचित अवसर व माहौल की प्रतीक्षा कर रहा था। उस बीज को अंकुरित और प्रस्फुटित होने का अवसर मिला एनटीपीसी की कॉलोनी में।

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टाइप टू 46 में आवासन मिला था। क्वार्टर के आगे छोटी-सी फुलवारी और पीछे बाड़ी के लिए जमीन खाली थी। पिछला हिस्सा ऊँची दीवार से घिरा था, किन्तु आगे वाली फुलवारी में बाड़ नहीं लगी थी। अभी कॉलोनी निर्माणाधीन ही थी। कॉलोनी की चारदीवारी भी अधूरी थी, जिसके कारण निकटवर्ती गाँवों की बकरियाँ वहाँ बेरोकटोक चरती फिरती थीं। हमने डेरा बसाते ही आँगन वाली जमीन में कुछ-साग-सब्जियाँ लगा दी थीं। क्वार्टर बनाने वाले ठेकेदार परिचित निकल आये थे। उनसे बोलकर अपनी फुलवारी में फेंसिंग और गेट लगवा लिया। सामने गेट के बाँई ओर लगभग आठ फीट लम्बी व चार फीट चौड़ी जमीन में सबसे पहले सफेद, लाल, गुलाबी और बैंगनी रंग के चार देसी गुलाब के पौधे लगाए थे जो उस क्वार्टर में रहने तक (1991) लहलहाते-खिलखिलाते रहे थे। दाहिनी ओर लगभग 10×10 फीट जमीन थी जिसे धीरे-धीरे व्यवस्थित और विकसित करने की योजना थी। कुछ दर्जन मिट्टी के गमले खरीदे और ठेकेदार मित्रों के सौजन्य से कुछ सीमेंट के गमले जुटा लिये थे। इसी क्रम में एक बार देवघर जाना हुआ तो वहाँ के बावन बीघा नर्सरी से एक-एक काला, प्रिंटेड, सफेद, गुलाबी, नारंगी, लाल और बैंगनी हाइब्रिड गुलाब के पौधे लाकर लगा दिये। इस तरह फुलवारी की खाली जमीन में केवल गुलाब-ही-गुलाब भर गये और शौकीन लोगों के आकर्षण का केंद्र बने रहे थे। 90 के दशक में कॉलोनी का नामकरण ‘दीप्तिनगर’ कर दिया गया था। उस समय तक कॉलोनी में कई अधिकारियों और कर्मचारियों ने गहन बागवानी की शुरुआत कर दी थी। तत्कालीन महाप्रबंधक एस एम नागमोती और उनकी धर्मपत्नी श्रीमती अरुणा नागमोती, दोनों फुलवारी के शौकीन थे।

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उनकी पहल पर एनटीपीसी के उद्यान विभाग द्वारा बागवानी प्रतियोगिता और पुष्प प्रदर्शनी का आरम्भ किया गया था। जनवरी के अंतिम सप्ताह से फरवरी के पहले सप्ताह के बीच किसी रविवार को यह आयोजन होता था। सबौर कृषि विश्वविद्यालय से विशेषज्ञ निर्णायक बुलाये जाते थे। क्वार्टरों के अलग-अलग संवर्ग जैसे, टाइप वन, टू, थ्री, थ्री ए, ए, बी, सी, डी में जमीन और छत की बागवानी सहित स्थाई और मौसमी फूलों व पौधों, सजावटी पौधों, बोनसाई, कैक्टस आदि वर्गों में प्रतिस्पर्धा होती थी। उस दौर में मेरे अतिरिक्त डॉ0 एम के मिश्र, एन एन राय, आर एन झा, डॉ0 सुरेश कुमार, पी के चटर्जी, अमरेंद्र कुमार, सुरेश कुमार, आर के सिंह, ए के सिन्हा, के के दास, राकेश प्रसाद, कुंतल मजुमदार, बी बी सिंह, एस के पंडिता, आर के अखौरी, विमल कुमार, एन के सिन्हा, आर पी सिंह, ए के झा, एनामुल हक़, सी डी सिंह, डी एन झा, ए के चौधरी, जॉन पी जे, जेम्स मैथ्यू, श्री बोइपोई, पी के सिंह, ए के चौधरी, के एस झा, बी के सिन्हा, आर के सिन्हा, आई डी सिंह, गोपाल सिंह आदि फुलवारी के शौकीन लोग प्रतिस्पर्धी थे। बागवानों के इस समूह को हम मजाक में ‘माली एसोसिएशन’ बुलाते थे। पी के चटर्जी इस दल के मेंटर और कैप्टन थे, जिन्हें हम सभी दादा बुलाते थे। दादा सहित सभी के अपने-अपने पसंदीदा मौसमी फूल थे। अपवाद स्वरूप दादा हरफनमौला थे। मैं तो गेंदे का दीवाना रहा हूँ। इसकी विभिन्न किस्मों की अलग- अलग क्यारियाँ जब खिलकर पूरे सबाब पर होती हैं तो इनसे नजर हटाना मुश्किल होता है। शुरुआती दिनों में हमारे बीच बहुत स्वस्थ प्रतिस्पर्धा रही थी। लोग एक-दूसरे की फुलवारी देखते, कमियाँ-खूबियाँ बताते, पौधे-खाद-बीज-दवा या आवश्यक औजारों का उदारतापूर्वक आदान- प्रदान करते थे। बाद में एकाध बुरी नीयत वाले लोगों के मैदान में आ जाने से माहौल गंदा हो गया था। प्रतियोगिता की तैयारी और निर्णय-प्रक्रिया में राजनीति होने लगी थी। मुझे आश्चर्य होता था कि फुलवारी का शौक रखने वाले किसी व्यक्ति का दिल इतना मलिन कैसे हो सकता है!Related image

खैर…
मैंने तीन वर्षों तक लगातार अपने क्वार्टर के संवर्ग में और कैक्टस, सजावटी पौधे, मौसमी फूलों के कुछ किस्मों में प्रथम पुरस्कार प्राप्त किये थे। उस समय मेरे संग्रह में कैक्टस की कुल 62 किस्में एकत्रित हो गयी थीं। बाद में कई बार डेरा बदलने से लेकर अपने घर में बसने तक गमलों के पौधों की दुर्दशा होती रही। अभी मेरे पास कैक्टस की मात्र छः किस्में बची हैं, जिनमें से चार दशक पुराना गोल्डेन बॉल का एक जोड़ा हमारी छत पर शान से मुस्तैद है, जो सामने सड़क से गुजरने वाले राहगीरों को आकर्षित करता है। कई लोग तो उसी जोड़े के आकर्षण में मेरी वर्तमान फुलवारी के अंदर तक चले आते हैं। उस जोड़े में से एक भागलपुर के मशहूर पुस्तक विक्रेता व प्रकाशक ‘ग्रंथालय’ के संस्थापक स्व0 श्याम सुंदर प्रसाद जी का दिया उपहार है। उस समय दीप्तिनगर की प्रतियोगिता में स्कूल के कुछ अन्य शिक्षकों व सुरक्षा बल के कुछ कर्मियों को भी पुरस्कार मिल जाया करते थे। इस लोकप्रिय प्रतियोगिता में गलाकाट राजनीति का प्रवेश हुआ और इसे केवल एनटीपीसी कर्मियों के लिए आरक्षित कर दिया गया। इस दुर्घटना से आहत होकर माली एसोसिएशन के दिग्गज सदस्यों, जिनमें एनटीपीसी के लोग ही अधिक थे, ने प्रतियोगिता से हाथ खींच लिया। इस झटके का असर दीप्तिनगर की बागवानी संस्कृति पर बहुत बुरा हुआ। फुलवारी का स्तर लगातार गिरता चला गया और आज तक बागवानी के उस स्वर्णयुग की वापसी नहीं हो सकी है। मैं जब विश्वविद्यालय में नियुक्ति के बाद दीप्तिनगर से बाहर निकला तो कुछ स्थाई पेड़ सहित कैक्टस का एक बड़ा भारी गमला वहीं छोड़ आया था। मेरे उस क्वार्टर में अभी स्कूल के मेरे सहकर्मी थॉमस कुट्टी रह रहे हैं। हमारे पौधे अब भी उनकी फुलवारी की शोभा बढ़ा रहे हैं। इधर मेरे अंदर बागवानी का शौक स्थाई रूप से बसा हुआ है। अपने लिए जब घर बनाया तो जरूरत से दोगुनी जमीन खरीदी। आधे में मकान बना और आधे में फुलवारी सजा रखी है। एक बड़ा अंतर यह आ गया है कि गमलों की संख्या और फुलवारी के आकार के लिहाज से मेरी काम करने की क्षमता नहीं रही। अतः अब मजदूर का सहारा लेना पड़ता है।

मध्यमवर्गीय किसान परिवार में जन्मे लेखक जयप्रकाश आन्दोलन के प्रमुख कार्यकर्ता और हिन्दी के प्राध्यापक हैं|
सम्पर्क- +919431250382,
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