Category: एतिहासिक

दास्तान ए दंगल सिंह

दास्तान-ए-दंगल सिंह (57)

 

  • पवन कुमार सिंह 

 

भागलपुर में हम सब की भाभी डॉ0 अनिता सिंह (दुर्गा वाहिनी, भाजपा, विश्व हिंदू परिषद, महानगर पूजा समिति आदि) से वचनबद्ध था कि शादी के बाद जल्द ही सुधा को उनसे मिलवाऊँ। उन भाभी-भैया की कथा भी अनोखी है। राधा भैया ने एक सप्ताह पहले बताया था कि उनके मंझले भैया( स्व0 डॉ0 सादनंद सिंह, नेता विश्व हिंदू परिषद) नेवी फोर्स से रिटायर होकर सपरिवार गाँव (कसबा, अमरपुर) आ गये हैं। उनके तीन बच्चे हैं। बच्चों की पढ़ाई के लिए भागलपुर में रहकर कुछ करने की योजना है। फिर अचानक एक दिन राधा भैया पीजी होस्टल पहुँचे और बोले, “भौजी भैया और बच्चों को साथ लिये भागलपुर आ गयी हैं। चलो मिलने।”
मिलने पर भैया ने बताया कि आज सुबह भाभी ने चाय देने के बाद कहा, “हे हो, मिली-जुली लेलहा नि सखा-समाज सँ! आबे चल$ भागलपुर। बच्चा सब र$ एडमिशन कराब$ आरु काम-धंधा खोज$।”
“अच्छा चलबै न। थोड़ा आरु रूक$।”
“नै, हम्मे सामान समेटि लेने छियै। आय दसबज्जी बस पकड़बै।”
और भाभी दसबज्जी बस से भागलपुर आ गयीं। ऐसी अगिया बैताल थीं तब की हमारी भाभी। भैया का केवल एक काम, रोजी-रोटी की व्यवस्था के लिए नया रोजगार ढूँढने का। बाकी, बच्चों का एडमिशन कराने से लेकर उनके यूनिफॉर्म और भैया सहित पूरे परिवार की पोशाक बनवाना और डेरा खोजना भी। सिंकी और रिंकी दो बेटियाँ और एक बेटा संतोष। हम सप्ताह में दो-चार बार उनके घर जरूर जाते और उनसे प्रभावित होकर लौटते। एक अकेली औरत, वह भी अस्थमा की मरीज और काम करतीं पाँच औरतों के बराबर। बच्चों का होमवर्क देख रही हैं, खाना पका रही हैं, हमसे विभिन्न मुद्दों पर बातें कर रही हैं, भैया की यात्रा की तैयारी भी कर रही हैं; यानी कि मशीन की तरह काम भी और विदुषी की तरह शास्त्रार्थ भी। वे पढ़ती भी बहुत थीं। समुद्र के तटीय क्षेत्रों में पोस्टिंग में उन्हें विभिन्न भाषाभाषी समुदायों के बीच रहने का अवसर मिला था। भाषा सीखने की अद्भुत क्षमता के कारण वे कई भाषाएँ धाराप्रवाह बोल सकती थीं। दुनियादारी की विलक्षण समझ उनमें थी। एक बार राधा भैया ने कहा था, “भौजी के साथ जब भी बाहर निकलता हूँ तो यही लगता है कि वे मेरे साथ नहीं, मैं उनके साथ चल रहा हूँ।”
भैया भी विचित्र जुनूनी इंसान थे। एक दिन रविवार के दोपहर बाद हम उनके घर गये तो देखा कि भाभी उनका सूटकेस तैयार कर रही हैं और खाना परोस रही हैं। मैंने जिज्ञासा प्रकट की कि कहाँ की तैयारी है? भैया ने कहा, “दिल्ली का काम आ गया है। अभी निकल रहा हूँ।”
“अभी दिल्ली के लिए कौन-सी ट्रेन मिलेगी?”
“अरे अभी ट्रेन नहीं है तो क्या कल तक यहीं बैठे रहें? अभी लोकल गाड़ी से कियूल चला जाता हूँ और वहाँ से रात में दिल्ली के लिए कोई ट्रेन पकड़ लूँगा। एक दिन की बचत हो जाएगी कि नहीं?” और इस तरह वे लोकल ट्रेन से चल पड़े दिल्ली।

स्व0 डॉ0 सादनंद सिंह, नेता विश्व हिंदू परिषद

लालबाग के पास रहते हुए उन्होंने घर बनाने के लिए बगल वाली जमीन खरीद ली थी। घर बनाने के लिए प्लॉट में ईंट गिराई जा रही थी। एक दिन राधा भैया ने भैया को कहा कि “देखिए ट्रैक्टर वाले ने रास्ते पर ईंटें गिरा दी हैं। रास्ता ब्लॉक हो गया है।” सुनते ही फौजी फरमान सुना दिया गया। “चलो ईंटों को सही जगह पर थाक लगा देते हैं।” एक ट्रॉली ईंट को दोनों भाइयों ने मिलकर सही जगह पहुँचा दिया। इस अनाहूत परिश्रम से राधा भैया का हाल-बेहाल हो गया था। इस घटना के बाद से वे भैया को सूचना या सलाह देने में अतिरिक्त सावधानी बरतने लगे थे।
इस आदर्श और कर्मठ जोड़े से हमारी मंडली के सभी साथियों ने काफी प्रेरणा ली थी। मेरी हार्दिक इच्छा थी कि सुधा को बिना समय गँवाए उनसे मिलवाऊँ। मेरी इस इच्छा की जानकारी मिलने पर भाभी ने मुझसे वचन ले लिया था कि शादी के बाद जब भी भागलपुर आना हो, एक दिन उनके घर हम अवश्य ठहरें। मैंने सुधा को उनके विषय में विस्तार से बताकर मिलने के लिए प्रेरित किया था और मिलवाया भी था। भाभी ने कुछ जीवनोपयोगी टिप्स दिए थे, जिन्हें सुधा ने गुरुमंत्र की तरह याद रखा है। उन सिखावन-बुझावन का असर हमारे दाम्पत्य जीवन पर हुआ है। हम दोनों भैया-भाभी के ऋणी हैं।
तीनों संतानों की शिक्षा-दीक्षा और विवाहादि के दायित्वों का सफलतापूर्वक निर्वहन करने के बाद दोनों सामाजिक जीवन में अधिक सक्रिय हो गये थे। जीविकोपार्जन से जो भी समय बचता, उसे समाजसेवा में लगाते थे। सबकुछ अच्छा-भला चल रहा था कि पता नहीं इस परिवार को किसकी बुरी नजर लग गयी! दो साल पहले एक सड़क हादसे में हमसब के प्रेरणापुंज हमारे आदरणीय भैया की इहलीला समाप्त हो गयी। भाभी बीमार होते हुए भी सक्रिय हैं। भैया की पुण्य स्मृतियों को नमन!😢
(क्रमशः)

मध्यमवर्गीय किसान परिवार में जन्मे लेखक जयप्रकाश आन्दोलन के प्रमुख कार्यकर्ता और हिन्दी के प्राध्यापक हैं|
सम्पर्क- +919431250382,
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