Category: स्तम्भ

मैं कहता आँखन देखी

दास्तां एक और शहीद की

 

  •  नवल किशोर कुमार

 

उसका नाम जितेंद्र मरावी था। प्यार से उसके घर वाले और उसके मित्रगण उसे सोनू कहते थे। था भी वह गजब का हिम्मतवाला। लेकिन उसने बीते 9 अक्टूबर को खुदकुशी कर अपनी शहादत दी। वह चाहता तो लड़ सकता था। लेकिन जिस कारण उसने यह निंदनीय कृत्य किया, वह कई मायनों में उल्लेखनीय है।

क्रांति हमेशा शहादत मांगती है : सुसाइड नोट की जुबानी
12 अगस्त 1997 को जन्मा जितेंद्र छत्तीसगढ़ के सूरजपुर जिले के केतका गांव का रहने वाला था। उसका घर सूरजपुर थाने में ही था। 9 अक्टूबर 2019 को फांसी लगाकर अपने जीवन का अंत करने से पहले उसने एक सुसाइड नोट लिखा। इसके मुताबिक, यह मेरी नैतिक हार थी । और यह हार मैं बर्दाश्त नही कर पाया। पर यह कदम मैने डर के नहीं उठाया है । बस उन लोगो की आखें खोलने के लिए यह कदम उठाया है । और इसकी पूरी जिम्मेदारी समिति वालो की है । मेरे सभी साथियों से क्षमा चाहूंगा कि लड़ाई बीच मे छोड़ कर जा रहा।  एक बात याद रखना कि क्रांति हमेशा शहादत मांगती है । और मैं इसी शहादत को पाने की इच्छा रखता हूं। अब पुरखों की इज्जत से खिलवाड़ करने वालो की खैर नही होनी चाहिए। यह दुर्गा पूजा मुझे दिन रात तोड़ रही थी। लगा 55 दिन का बलिदान व्यर्थ गया। मैं साथियों से चाहूंगा कि मेरी अधूरी लड़ाई पूरे जोर शोर से लड़ें । मैं हमेशा आप सभी के साथ हूं। और वे तमाम लोग जो मुझसे जुड़े हुए थे। उनसे पुनः माफी चाहूंगा। मैं घर वालो से भी माफी चाहूंगा कि मेरी वजह से आपको हमेशा शर्मिंदा होना पड़ा। बस यह आखरी तकलीफ दे रहा हूं। इसके बाद और नही। मेरी शरीर का चीड़फाड़ न किया जाय। यह मेरी आखरी इच्छा है।
# LovegodwanaSonumaravrudr
09
अक्टूबर  2019

सुसाइड नोट में दर्ज एक आदिवासी युवक की पीड़ा
छत्तीसगढ़ सहित देश के विभिन्न आदिवासी बहुल राज्यों में बीते एक दशक में सांस्कृतिक अस्मिता की लड़ाई तेज हुई है। जिस महिषासुर और रावेन को हिन्दू धर्मावलम्बी राक्षस मानते हैं और दुर्गापूजा के मौके पर इनका अपमान करते हुए हिंसक तरीके से इनका वध दिखाते हैं, आदिवासी मूल के लोग इसका विरोध कर रहे हैं। जितेंद्र मरावी इस सांस्कृतिक प्रतिकार के आंदोलन में करीब 15 वर्ष की उम्र में ही जुड़ गया था। पढ़ने-लिखने में होशियार तो था ही, उसमें नेतृत्व क्षमता भी गजब की थी। गोंडवाना गणतंत्र पार्टी से जुड़ा। इससे पहले उसने गोंड युवाओं के संगठन का नेतृत्व किया। सुसाइड नोट में उसने जिस 55 दिन के बलिदान की बात कही है, दरअसल वह यह है कि पिछले वर्ष वह 55 दिनों तक जेल में रहा। पुलिस ने उसे फेसबुक और व्हाट्सअप के जरिए धार्मिक उन्माद फैलाने और हिन्दू देवी-देवताओं का अपमान करने के आरोप में गिरफ्तार किया था।

आखिर जितेंद्र ने क्यों की खुदकुशी?
जिस जितेंद्र ने पिछले महीने की 26 तारीख को सर्व आदिवासी समाज के बैनर तले अपने साथियों के साथ सूरजपुर के जिलाधिकारी को महिषासुर वध व रावण दहन के विरोध में ज्ञापन दिया और यह मांग रखी कि  इस पर रोक लगे, उस नौजवान ने आखिर खुदकुशी क्यों की?

इस सवाल का आंशिक जवाब उसके सुसाइड नोट से मिलता है। इस संबंध में विस्तार से उसके साथी रहे विजय विस्तार से बताते हैं जो कि सूरजपुर के ही रहने वाले हैं और उस समय जितेंद्र के साथ थे जब 26 सितंबर 2019 को जितेंद्र ने जिलाधिकारी को ज्ञापन सौंपा था। विजय के अनुसार, दुर्गा पूजा समिति वालों (सुसाइड नोट में समिति) ने उसके परिजनों पर दबाव बनाया और उसके ही घर में दुर्गापूजा का आयोजन करवाया। जितेंद्र और उसके परिजनों के बीच झगड़ा हुआ। इस झगड़े की परिणति अंतत: उसकी खुदकुशी के रूप में हुई।

क्या कहती है पुलिस?
घटना के बारे में स्थानीय अखबार में प्रकाशित खबर के मुताबिक, सूरजपुर के एसपी का कहना है कि पुलिस सुसाइड नोट में लिखे कथ्य की जांच हैंडराइटिंग एक्सपर्ट से कराएगी और तब इसके बाद कार्रवाई होगी। हालांकि खबर लिखे जाने तक इस मामले में किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है। इस संबंध में दूरभाष पर बातचीत में एसपी कार्यालय ने बताया कि इस मामले में जांच चल रही है।

बहरहाल, इस बात की संभावना कम ही है कि पुलिस सुसाइड नोट में लिखे तथ्यों की जांच करेगी और जिनकी वजह से जितेंद्र को अपनी जान देनी पड़ी, उनके खिलाफ कार्रवाई करेगी।

लेखक फॉरवर्ड प्रेस, दिल्ली के सम्पादक (हिन्दी) हैं|

सम्पर्क-  nawal4socialjustice@gmail.com

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