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साहित्य

 अनुभूति के शिखर पर शब्द – भरत प्रसाद

 

  • भारत  प्रसाद

 

समय 19 वीं सदी देश – रूस, कथाकार – लियो टॉलस्टॉय। यह वही नाम हैं, जिन्होंने 20 वीं सदी के विश्व को ‘पुनरुत्थान’ दिया, ‘कज्जाक’ और ‘अन्ना केरेनिना’ दिया, जिन्होंने पूरी एक शताब्दी के रूसी किसान जीवन को ऐसी मुकम्मल प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत किया कि फिर टॉलस्टॉय के शब्द-चित्र रूसी किसान का स्थायी परिचय बन उठे। फिर आए गोर्की, आगे निकले शोलोखोव, जिनका महाकाव्यात्मक उपन्यास ‘धीरे बहे दोन रे’ रूस की ग्राम-संस्कृति के शाश्वत प्रवाह का प्रतीक माना जाता है। कह सकते हैं कि रूसी कथा-साहित्य का स्वर्णिम युग ग्रामीण सभ्यता की प्रतिसृष्टि रचने वाला युग रहा है। सोवियत रूस का यह वही स्वर्णकाल है, जिसने 20 वीं सदी के विश्व कथा-साहित्य की अगुवाई की है। रूसी किसान, मजदूर, व्यापारी, गृहस्थ, भिखारी, वेश्यावृत्ति में पिसती स्त्रियाँ, ग्रामीण परिवार, कस्बाई दुनिया, गरीब अपराधी, अबोध नौकरानी सबके सब ऐसे पुनर्जीवित हुए हैं, मानो बीत जाने के बावजूद उन्हें फिर कभी नहीं बीतना है, विलुप्त हो जाने के बावजूद फिर कभी नहीं विलुप्त होना है। सदा के लिए मौन रहकर भी हमेशा देश की दिशाओं में अपनी सार्वकालिक मौजूदगी का स्वर बुलंद किए रहना है।

 

यह संयोग ही माना जाएगा कि रूस की तरह ही भारतीय कथा-साहित्य का शिखरकाल 20 वीं सदी ही है। जिसकी लगाम बांग्ला के मानस-शिल्पियों ने थामी। मानव-मानस के ये सिद्ध शिल्पी थे – रविन्द्रबाबू और शरत़चन्द्र। लगभग इसी वक्त के आसपास उड़िया भाषा में उभरे फकीर मोहन सेनापति – ‘छमाण आठगुंठ’ के स्थापत्यकार, जिन्हें उड़िया साहित्य का प्रेमचन्द कथा जाता है। इधर हिन्दी समाज जिनकी कलम की आभा से एक बार फिर जगमगा उठा, जिनके अपराजेय मौन संकल्प ने साहित्य की संस्कृति को महानता के ढाँचे में तब्दील कर दिया, जिन्हें भारत की अंतरात्मा का अमर शिल्प कहा जाता है – ऐसे प्रेमचन्द का आगमन भी 20 वीं सदी में ही हुआ। प्रेमचन्द पर कुछ अलग, नया या खास लिख पाने की लगभग सारी सम्भावनाएँ समाप्त हो चुकी हैं, फिर भी यदि कुछ कहना ही पड़े तो कह दिया जाय कि भारत का सर्वश्रेष्ठ कथाकार ग्रामीण सभ्यता की पृष्ठभूमि पर ही अपना शिखरत्व हासिल कर सका। शरत् बाबू जिन्हें बंगाली स्त्रियों की आत्मा का महाशिल्पी कहा जाता है – दरअसल ग्रामीण बंगाल के अनन्य गायक हैं। शरतचन्द्र गोताखोर हैं जब बंगाली मनुष्य के चरित्र में डूबते हैं, बारीक मूर्तिकार हैं जब बंगाल के नौजवान, लाचार किसान और आम स्त्री का व्यक्तित्व गढ़ते हैं। शरतचन्द्र के ऐतिहासिक योगदान का ऐसा कौन सा हिस्सा है जो भूरि-भूरि मूल्यांकन वाली निगाहों से ओझल रह गया हो। जरा देखिए शरत बाबू की चित्रकला का टुकड़ा और मिलान कीजिए अपनी स्मृतियों में रचे-बसे ग्राम जीवन-दृश्य से – ‘मेरे बाप का नाम गौरी तिवारी है और भाई का नाम रामलाल तिवारी है। क्या तुम उन्हें पहचानते हो ? तीन महीने से मैं ससुराल आई हूँ। अभी तक एक भी चिट्ठी नहीं मिली। माँ-बाप, भाई, गिरिबाला और बाबू न जाने कैसे हैं, मुझे कुछ भी नहीं मालूम। उस पीपल के पेड़ के नीचे मेरी बहन की ससुराल है। पिछले सोमवार को दादी फाँसी लगाकर मर गई है, पर ये लोग कहते हैं कि वह हैजे से मर गयी है।’ (‘श्रीकान्त’ उपन्यास)

 

आंचलिक, देशज या देहाती भाषा मौलिक स्रोत होती है साहित्यिक भाषा की। एक तरह से कहा जाय तो साहित्य को जमीन, दिशा, उर्वरता, आकाश और उम्र देने की निर्णायक भूमिका यही ग्रामीण भाषाएँ ही निभाती हैं। इसीलिए जिस देश का साहित्य अपनी जमीन, जनपद, अंचल और माटी की गन्ध उसके रंग, स्वाद, चमक, से रिश्ता तोड़ लेता है, वह चाहे कितना भी कलात्मक क्यों न हो, धीरे-धीरे उस साहित्य की आयु समाप्त हो जाती है। देशज बोली में करोड़ों जनता का हृदय धड़कता है, आत्मा बोलती है, मन खिलता है, चित्त की सच्चाई मचलती है। इसीलिए यदि देश के गौरव की मूल इकाई जनता को समझना हो, तो उसकी बानी को साधिए, उसकी जुबान को पीजिए, उसकी आवाज को कंठ में बसाइए। जनता की जुबान का मर्म सिर्फ बोलकर, सुनकर या कलम में उतारकर नहीं समझाया जा सकता, क्योंकि उसकी ताकत व्यंजना में, एहसासों में, कशिश में, स्वाद और अनमोल गंध में छिपी होती है। इसीलिए जिस रचनाकार के व्यक्तित्व का संस्कार उस भाषा में नहीं हुआ है, जिसने सिर्फ सुनकर उस ग्रामीण भाषा को सीखा जाना है, जो पौधे की तरह माटी से एकाकार होकर नहीं, फूल की तरह खिला रहकर धरती से आत्मीयता विकसित किया है, वह जीवनपर्यन्त ग्राम भाषा के मर्म को नहीं बूझ सकता। ग्रामीण भाषा की तासीर भाषणों से नहीं, व्याख्याओं से नहीं, बहसों से नहीं समझी जा सकती। वह तो बस मौन में झरता हुआ अनहद आनन्द है, हृदय के क्षितिज-क्षितिज में गूँजता हुआ मन्द्र निनाद है, गूंगे का गुड़ है, उसे जितना ही पीयोगे, प्यास उतनी ही बढ़ेगी। ग्रामीण भाषा का सम्पूर्ण अन्तःसत्य अव्याख्येय है, शब्द से परे है, अपरिभाषेय है। यहाँ तक कि साहित्य की विधाएँ अपनी पूरी ताकत झोंककर भी ग्रामीण भाषा के अथाह गौरव का पुनर्सृजन नहीं कर सकतीं।

गुमनाम आम जीवन के प्रति करूणा से आकंठ भरे हुए हृदय ने शरत बाबू को सिर्फ बंगाल का ही, सिर्फ भारतवर्ष का ही नहीं – विश्व का कालजयी बना दिया। इसी बेजोड़ तत्व ने प्रेमचन्द और रेणु को बहुमूल्य विकल्पहीनता के शिखर पर पहुँचाया। करूणा सिर्फ व्याकुलता की नदी का नाम नहीं, कोरी भावुकता की बाढ़ बहने का नाम नहीं, न ही वह आँसुओं की धार में धैर्य को खो देने का सिलसिला है, बल्कि लेखक की करूणा, असत्य के खिलाफ तनकर खड़ा अपराजेय विवेक है, चरित्रों हक दिलाने वाली समझौता विहीन लड़ाई है, पीड़ित मानवता को सुरक्षा देने वाली ममता है। यह करूणा अपने चरम पर पहुँच जाय तो कलाकार द्रष्टा हो जाता है, सिद्धशिल्पी बन जाता है, सृष्टिदर्शी कल्पना का मालिक हो उठता है। विश्व के मानदण्डी कथाकारों ही नहीं, कवियों, दार्शनिकों यहाँ तक कि साहित्य-सुधारक आलोचकों में भी यह करूणा साधारण रूप से सक्रिय पायी जाती है। अपने असाधारण स्वरूप में करूणा जब कथाकार के भीतर बलखाती हुई करवटें बदलती हैं, तब उसके भीतर विषय के निःशेषसत्य को पी जाने की कूबत आ जाती है और कथाकार मौन साधना में  अन्तदृष्टि को  एकाग्र बनाये हुए  विषय को  ऐसे देखता है, जैसे  मानव शरीर के डिजिटल एक्सरे को कोई डॉक्टर देखता है। चरित्र के मन की बातों को खोल लेता है वह, मौन की अन्तध्र्वनियों को सुन लेता है वह, चेहरे की रंगत का व्याकरण पढ़ लेता है वह। चरित्र जितना अपने बारे में नहीं जानता उसके बारे में उससे कई गुना ज्यादा जान लेता है – करूणा से लबालब भरा हुआ सर्जक।

 विश्व के सार्वकालिक शब्द-शिखरों में से एक अन्तोन चेखव कैसे अपने बाल-चरित्र को करूणा का सुरक्षा कवच पहनाते हैं, जरा इन पंक्तियों में देखिए – ‘कल मुझ पर बुरी तरह मार पड़ी, क्योंकि मैं मालिक के बच्चे को झुलाते-झुलाते सो गया था। मालिक, जो चीज सामने पड़ जाय उसी से मेरी ठुकाई करने लगता है। मैं सो भी नहीं पाता। बाबा ! मैं तुम्हारी सूंघनी पीस दिया करूँगा। प्यारे बाबा, मैं तुम्हारी देखभाल करूँगा और कोई तकलीफ नहीं होने दूँगा, और जब तुम मर जाओगे, तब तुम्हारी आत्मा की शान्ति के लिए प्रार्थना करूँगा, जैसे मैं अम्मा के लिए करता हूँ।’ (‘वान्का’ कहानी)

 

अन्वेषण दृष्टि वह सूत्र है जो विषयों में छिपी हुई अर्थ की परतों को खेालती रहती है। यह दृष्टि कथाकार की कल्पनाशीलता, निर्माणधर्मिता, भावावेश, अन्तःविवेक और तत्वग्राही चेतना का समन्वित परिणाम होती है। इस अन्वेषण-दृष्टि को अन्तर्दृष्टि भी कहा गया है। ग्राम-जीवन सदियों से अपनी बहुमुखी संरचना में जटिल, रहस्यमय और चुनौतीपूर्ण रहा है। न सिर्फ भारतवर्ष बल्कि विश्व के अनेक जीवन-शिल्पी कथाकारों ने ग्राम सभ्यता के बहुस्तरीय यथार्थ को स्थायी चित्रों में तब्दील करने का प्रयास किया है। जैसे रूस में गोर्की, चीन में लूशून और फ्रांस में बाल्जाक। ग्राम-जीवन अपने जमीनी यथार्थ में जितना सरल और स्पष्ट नजर आता है, दरअसल उतना होता नहीं। ग्रामीण जीवन में दिखते हुए एक-एक सत्य के पीछे गुमनाम रहस्य की जड़ें फैली होती हैं। वे अदृश्य किन्तु मजबूत जड़ें जो जीवन में बाहरी घटनाओं को अंजाम देती हैं। 25 साल का नौजवान अमृतसर में मजूरी करने के बाद गाँव वापस आकर किसी अज्ञात रोग से क्यों मर गया ? 80 साल के बूढ़े काका शहर में रहने वाले अपने बेटे और नाती-बहू को छोड़कर जर्जर हो चुके खपरैल के घर में अकेले क्यों रहते हैं ? हर साल बाढ़ में डूब जाने वाली खेती-किसानी के बावजूद काका अपनी जन्मभूमि से जीवन पर्यन्त पलायन क्यों नहीं करते ? ग्राम-संस्कृति की अन्तरात्मा को आत्मसात करने के लिए गाँव की मिट्टी में जन्म लेना बस पर्याप्त नहीं है। ग्राम-सभ्यता का अधिकारी व्यक्तित्व बनने के लिए चाहिए ग्रामीण आँखें, गंवई दिल, देहाती भावुकता, ठेठ बुद्धि और दुख-दर्द की कठिन आँच में तपा हुआ चरित्र। गाँव अपनी सम्पूर्ण अभिव्यक्ति के लिए कथाकार से लबालब समर्पण की माँग करता है। समर्पण किसानी के प्रति, लाचार आँसुओं के प्रति, पराजित चेहरों के प्रति, धूल खाए नंगे पैरेां के प्रति, धैर्यशील सच्चे गूंगेपन के प्रति, टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियों, गलियों, झीलों, श्यामल तालाबों और बहुरूपिया वेश बदलते देहाती  आसमान के प्रति । जो कथाकार गाँव की बोली में भरे  हुए रस को छक कर नहीं पीया है, जिसने अंजुली भरकर अपने गँवई साँवले तालाब का अमृत जल नहीं पीया है, जो छितरा-छितराकर जमीन में धँसी हुई पीपल की जड़ों पर नंगे बदन नींद लूटने की मस्ती में नहीं डूबा है, वह क्या गाँवों का प्रामाणिक प्रवक्ता बनेगा ? देश का एक-एक गाँव उपेक्षित सभ्यता के इतिहास की पाठशाला है। गाँव को आत्मसात करने के लिए गुमनाम इतिहास को परखने वाली निगाहें चाहिए। गाँव मूल्यों के सृजन का स्रोत है, संस्कारों के निर्माण की प्रयोगशाला है, संसार को ठेठ जमीन से खड़े होकर देखने की नींव है। गाँव मनुष्य के व्यक्तित्व को अष्टधातुओं से निर्मित करने वाली साधना भूमि है। आधा पेट खाकर खड़ी दोपहरी में खेत पर पसीना बहाने का अर्थ क्या होता है – यह पढ़कर नहीं जाना जा सकता। इसीलिए जो कथाकार सच्चे अर्थों में गाँव का प्रामाणिक प्रति सृष्टिकार बनना चाहता है उसे मिट्टी में छिपी पसीने की गाथा समझनी होगी। सुनना होगा पकती बालियों के संगीत के पीछे किसानों की कभी समाप्त न होने वाली गहरी पीड़ा को। अपनी कल्पना-दृष्टि का फलक विस्तृत करना होगा, जिससे वह मानस में गुमनाम अतीत को पुनर्जीवित कर सके, समूचा जीवन खेती को अर्पित कर देने वाले सपूतों के अद्वितीय मूल्य को महसूस कर सके। अन्तःजागृति के आलोक में सधे हुए कथाकार के लिए गाँव मनुष्यता का प्राचीनतम आश्चर्य है, खेत-खलिहान, तालाब, बाग, सीवान – अकूत संवेदना की बाढ़ पैदा करने वाले आदिम प्रेरणा स्रोत हैं। सवर्ण, दलित, पिछड़े हुए, व्यापारी, भूमिहीन, संतानहीन, जैसे निर्बल-सबल वर्गों एवं परिवारों से मिलकर बनता है – गाँव का चेहरा। आश्चर्यजनक यह कि हर वर्ग के हृदय की सोच की आकांक्षा और सपने की राम-कथा अलग-अलग है। सबके लाइलाज दुख और बेवशी का व्यकरण जुदा-जुदा है। यहाँ तक कि एक ही छत के नीचे पलती 30 और 65 वर्ष की स्त्रियों की मानसिकता, आशा, चाहत और प्रकृति को नितान्त भिन्न रूप देखा जा सकता है। इतना ही नहीं अलग-अलग उम्रों में जीते चरित्रों की भाषा और बोलने की शैली भी अलग-अलग हो जाती है। अर्थात् भाषा के कितने टोन, कितने ढंग, कितने स्तर होंगे, पूरे बूझना आसान नहीं है। यहाँ तक कि आर्थिक और सामाजिक स्थितियों में अन्तर एक ही गाँव में बसने वाले व्यक्तियों की बोली में स्थायी अन्तर पैदा कर देता है। जो कथाकार विभिन्न स्थितियों में जीते-मरते हुए चरित्रों की भाषा के इन बारीक भेदों को नहीं साध पाता वह ग्राम-सभ्यता का प्रतिसृष्टिकार बन ही नहीं सकता।

अपने व्यक्तित्व में ग्रामीण सभ्यता को साधने का एक चमत्कार और भी होता है और वही सृजन की कालजयी सम्भावना सुनिश्चित करता है। वह है, दृश्य का दर्शन में, तथ्य का तत्व में, प्रकृति का सत्ता में और ग्राम संस्कृति का मूल्य के रूप में तब्दील हो उठना। जीवन को आर-पार निरखने वाली अनुभूति की इस अथाह चेतना में जीता हुआ कथाकार ग्राम सभ्यता के एक-एक यथार्थ को सौ-सौ आँखों से देखता है। आम, पीपल, बरगद की अखण्ड छाया उसे कद्दावर पिता के स्नेह से भी बढ़कर लगती है। जीवनदायी अन्न से खुशहाल करने वाली धूसर धरती का विस्तार माँ के आंचल से कम कीमती नहीं लगता। बचपन से बुढ़ापे तक सुख-दुख  के खेल  दिखाता  आकाश ईश्वर की  कृपा से कहीं  ज्यादा  महान  लगता है। दिशा-दिशा में खेाई हुई देहाती दिशाएँ भावाकुल कल्पनाशीलता की प्रेरणा भरती हैं। परन्तु किसी कथाकार में इस दुर्लभ क्षमता का जागरण तभी होता है, जब ग्राम-सृष्टि के प्रति उसमें समुद्रवत मोह भरा हुआ है, जब देहाती दुनिया को याद करते ही अनायास पूरी शरीर से आँसू जैसा झरने लगें, जब उसके व्यक्तिगत की जगह ग्राम का व्यक्तित्व ले ले। जब उसकी धड़कनों का कारण गाँव बन जाय। चार मण्डी की खेती वाले बाबा जीवन भर पेट काटकर अपने होनहार बेटे को इण्टर मीडिएट कैसे पढ़ा लेते हैं ? यह सिर्फ देखकर कैसे बूझा जा सकता है ? बच्चे, नौजवान, हित-दुश्मन सबको विमल आशीष बाँटने वाली बुढ़िया की आँखों में झांके बगैर उसके विलक्षण हृदय को कैसे समझा जा सकता है ? शिवमूर्ति के समर्थ कथाकार में उद्दाम  अन्तश्चेतना का जागरण  अधूरा रह गया, अनुभूति के शिखर पर सृजन का नृत्य करने से चूक गयी उनकी प्रतिभा, ग्राम-दृश्य को कालजयी दर्शन की धारा में तब्दील करने से शेष रह गये शिवमूर्ति। ग्राम-सभ्यता के जादुई व्यामोह में रात-दिन विचलित रहकर औघड़ सर्जक का स्तर नहीं हासिल कर पाए शिवमूर्ति। और यही है, कुशल ग्राम-शिल्पी शिवमूर्ति की अनिवार्य सीमाएँ। ऐसी चेतना का साधक कथाकार आखिर होता कैसा है ? इसे बूझने के लिए बस एक नमूना पर्याप्त है – ‘किसी खेत के रखवाले की बाँसुरी की आवाज जिसे दूरी ने तासीर व सन्नाटे ने सुरीलापन और तारीकी ने रूहानियत की दिलकशी बख्शी थी ………. यूँ कानों में आ रही थी, गोया कोई मुबारक रूह नदी के किनारे बैठी हुई नदी की लहरों को या दूसरे साहिल की खामोश व पुरकशिश दरख्तों को अपनी जिंदगी की दास्ताने गम सुना रही है।’ (प्रेमचन्द)

लेखक कवि, कथाकार तथा आलोचक हैं|

सम्पर्क- +919774125265,

 

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