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मध्यप्रदेश

रोजी-रोटी और पानी का संकट – रामस्वरूप  मन्त्री

 

  •   रामस्वरूप  मन्त्री

 

मालवा निमाड़ की उपजाऊ मिट्टी, पुरुषार्थ करने वाले लोग, कल-कल बहती नर्मदा और चंबल तथा उसकी सहायक नदियां, धरती के गर्भ में छुपे खनिज भंडार, उथला जल स्तर, स्थानीय राजाओं की विकास एवं रोजगार की सोच के चलते कहावत थी, ‘मालव माटी गहन गंभीर, डग-डग रोटी पग-पग नीर । लेकिन अब यह कहावत इतिहास की बात हो गई है । इस इलाके की जनता तो अभी भी गंभीर यानी सहनशील बनी हुई है मगर ना रोटी (रोजगार) का पता है और ना ही पानी का । रोजगार की तलाश में धार, झाबुआ, खरगोन, बड़वानी से ही नहीं, बल्कि इंदौर जैसे प्रदेश के सबसे विकसित शहर से भी पलायन हो रहा है।

खेती के मामले में भी मालवा निमाड़ पर संकट है। कपास उत्पादन के मामले में निमाड़ का देश में ऊंचा स्थान था, लेकिन अब इस इलाके में कपास उत्पादन करना किसानों ने लगभग खत्म कर दिया है। निमाड़ के गुणवत्तापूर्ण कपास उत्पादन के चलते ही इंदौर, उज्जैन, बुरहानपुर और सनावद में कपड़ा मिलों, सूत मिलों की स्थापना की गई थी और इन मिलों में 70 हजार से ज्यादा मजदूर काम करते थे, रोजगार प्राप्त करते थे । इंदौर, उज्जैन की पहचान ही सूती वस्त्र उद्योग के कारण देश और दुनिया में बनी थी । यहां की मिलों में उत्पादित लट्ठा और छींट की ख्याति देश ही नहीं, विदेशों तक भी थी।

इंदौर के होलकर महाराज की भी विकास के प्रति दृष्टि थी । उसी का परिणाम था कि इंदौर में पहली कपड़ा मिल की स्थापना हुई।  इंदौर की मालवा यूनाइटेड मिल की स्थापना के लिए जब विदेशों से मशीनें मंगाई गईं, तो मुंबई से इंदौर तक मशीनों को लाने में भारी दिक्कतें आई । परिवहन के साधन नहीं होने से मशीनों को हाथियों पर लाद कर लाया गया । इस परेशानी को तत्कालीन महाराजा ने समझा और जन्म हुआ बीबीसीआई रेलवे का । डेढ़ सौ साल से ज्यादा पुरानी इस रेलवे की स्थापना हुई और आकार लिया खंडवा अजमेर रेल लाइन ने।  इस रेल लाइन के बनने के बाद यातायात सुगम हुआ। उद्योगपतियों की कल कारखाने स्थापित करने की रुचि और बढ़ी और एक के बाद एक इंदौर, उज्जैन में कई कपड़ा मिलों की स्थापना होने लगी । रोजगार के अवसर के कारण इंदौर की ख्याति औद्योगिक शहर के रूप में होने लगी । लेकिन 1977 में केंद्र सरकार के एक निर्णय ने इन कपड़ा मिलों की सांसे छीन ली । जनता सरकार के समय केंद्रीय कपड़ा मंत्रालय ने पावरलूम को टैक्स मार्क देने का निर्णय लिया जिससे पावरलूम का उत्पादित कपड़ा भी ऊंचे भाव पर बिकने लगा । परिणाम हुआ कि कपड़ा मिलों में महंगी मजदूरी और लागत के चलते मिलों के कपड़े की लागत ज्यादा आने लगी और मिलें धीरे-धीरे लगातार घाटे में जाने लगीं । 1990 के बाद एक-एक कर सभी मिलें बंद हो गईं, मजदूर बेकार हो गए । मिलें बंद हुईं तो खेतों में पैदा होने वाले कपास की कीमतें भी गिर गई और किसानों को कपास उत्पादन घाटे का सौदा लगने लगा । इस तरह कपास की खेती धीरे-धीरे पूर्ण रूप से बंद हो गई । इस अंचल के नेतृत्व की कमी ही मानी जाएगी कि कपड़ा मिलों की बंदी के बाद यहां रोजगार का कोई बड़ा विकल्प नहीं आ पाया । उद्योग स्थापना के लिए पीथमपुर में कहने को एशिया का सबसे बड़ा औद्योगिक क्षेत्र विकसित जरूर किया गया, मगर यहां आए अधिकांश बड़े उद्योगों ने इस क्षेत्र को केवल सरकारी सुविधाएं हासिल करने और सब्सिडी डकारने का जरिया ही बनाया  । यहां आई अधिकांश ऑटो इंडस्ट्री ने अपनी पूरी इकाई स्थापित करने की बजाय इस क्षेत्र में केवल असेंबलिंग कर अपने वाहन बनाए, जिससे उद्योग घरानों को आर्थिक लाभ तो हुआ लेकिन रोजगार के बहुत ज्यादा अवसर पैदा नहीं हुए । परिणामस्वरूप पीथमपुर औद्योगिक क्षेत्र अपने स्थापना के उद्देश्य से ही भटक गया । रही-सही कसर सरकार की अफसरशाही और लालफीताशाही ने पूरी कर दी । 30-40 सालों में भी इस औद्योगिक क्षेत्र में इंफ्रास्ट्रक्चर ही डेवलप नहीं हो पाया । क्षेत्र में ना सड़के हैं, ना पर्याप्त पानी, जिसके चलते उद्योग दम तोड़ रहे हैं । रोजगार के अभाव में बेरोजगार दो ही रास्ते चुन रहे हैं; पलायन या फिर अपराध और इन दो रास्तों ने खुशहाल मालवा निमाड़ की दशा और दिशा दोनों बदल दी है ।

शहरों से लगी जमीनों की कीमतें तो बढ़ीं लेकिन खेती लगातार घाटे का सौदा होती गई । अब मालवा निमाड़ में ना तो कपास उत्पादित होता है, और ना मशहूर मालवी गेहूं । मालवी गेहूं का तो बीज भी अब ढूंढे से नहीं मिलता । पारंपरिक खेती से किसानों का मोहभंग हो गया है । परिणाम हुआ है कि किसान परिवारों की खेती का रकबा लगातार घट रहा है और किसान पुत्र भी बेरोजगारी की भट्टी में झुलस रहा है । सोयाबीन उत्पादन में भी कभी यह इलाका सिरमौर हुआ करता था लेकिन उपज के सही दाम नहीं मिलने से सोयाबीन का रकबा भी लगातार घट रहा है और सोया इंडस्ट्री भी बर्बाहोद  गई है ।

इतनी उपेक्षा के बावजूद मालवा निमाड़ के लोगों के पुरुषार्थ ने हार नहीं मानी है । भले ही खेती, उद्योग-धंधे उजड़ रहे हों, रोजगार के लिए नौजवानों को पलायन करना पड़ रहा हो, फिर भी इस क्षेत्र के लोगों ने हिम्मत नहीं हारी है । आज भी लोग अपना रोजगार और व्यापार बचाने के लिए, खेती को लाभकारी बनाने के लिए तरह-तरह के जतन करने में जुटे हुए हैं ।

मध्य प्रदेश के कुल राजस्व में इंदौर-उज्जैन संभाग की भागीदारी 50 फ़ीसदी से ज्यादा है । आधे से ज्यादा राजस्व देने वाले इस इलाके के नेतृत्व की आवाज कमजोर होने से बजट की आय का आधा हिस्सा देने के बावजूद इस क्षेत्र को विकास के लिए बजट का 20 फ़ीसदी पैसा भी नहीं मिलता है । यदि हम जितना राजस्व देते हैं उसका 80 फ़ीसदी भी मालवा निमाड़ के विकास पर, रोजगार के अवसर बढ़ाने पर खर्च होने लग जाए तो यह इलाका फिर से ‘डग-डग रोटी पग-पग नीर’ वाली कहावत को चरितार्थ कर सकता है ।  मगर सवाल यह है कि इसके लिए आवाज कौन उठाए? वर्तमान नेतृत्व से तो यह उम्मीद करना बेकार ही है, क्योंकि उनके पास ना तो नीति है, ना नियत। पिछले 15-20 सालों से जो नेतृत्व इस इलाके को मंत्रिमंडल में ही पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं दिला सका वह आम जनता की बात शासन के सामने रख पाएगा यह सोचना ही बेकार है । अब मामा बालेश्वर दयाल जैसा नेता भी शायद ही मध्य प्रदेश की धरती पर पैदा हो, क्योंकि आज के किसी नेता में ऐसी दृष्टि नहीं दिखाई देती जो जनता की समस्या के लिए शासन को, प्रशासन को झुका सके । एक बार जब मामा जी के कार्यक्षेत्र झाबुआ में अकाल पड़ा तो उन्होंने आदिवासियों को पलायन करने से रोका और सड़क पर खंती खोदने के काम में लगा दिया । वे वहां से इंदौर आए, इंदौर के कमिश्नर से कहा कि पलायन कर रहे आदिवासी वहां पर राहत कार्य में जुट गए हैं । वह सड़क बनाने का और खंती खोदने का काम कर रहे हैं । उन्हें मजदूरी का भुगतान करने का आदेश दो । मामा जी के आग्रह पर इंदौर के तत्कालीन कमिश्नर ने मजदूरों की गणना कर उन्हें मजदूरी भुगतान करने के आदेश दिए । हालांकि उम्मीद पूरी तरह टूटी नहीं है; यह उम्मीद है मालवा निमाड़ की संवेदनशील जनता ।  नर्मदा को इंदौर लाने का आंदोलन हो या फिर नर्मदा को बचाने और विस्थापितों को बसाने के लिए मेघा पाटकर के नेतृत्व में चलने वाला जनांदोलन, यह आंदोलन उम्मीद की किरण इसलिए है कि ये जनता के लिए, जनता के आंदोलन थे और हैं तथा इन्होंने हक हासिल करने में इतिहास रचा है । अब मालवा निमाड़ को बचाने के लिए, पलायन रोकने के लिए, यहां का पैसा यही के विकास में खर्च करने के लिए जन आंदोलन की जरूरत है । लंबे अरसे बाद मध्य प्रदेश की सरकार में मालवा निमाड़ को पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिला है । नई सरकार भी नए उद्योगों में, धंधों में स्थानीय लोगों को रोजगार  देने की बात कर रही है । तो ऐसे में मालवा निमाड़ के लोगों को भी उठ खड़ा होना होगा और मांग करनी होगी कि मालवा निमाड़ के 16 जिलों से जितना राजस्व मध्यप्रदेश के खजाने को मिलता है, कम से कम वह पैसा तो यहीं के विकास पर खर्च हो ।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार है |

सम्पर्क- +919425902303, ramswaroopmantri@gmail.com

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