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मुस्लिम वोटों पर टिकी माया की नजर – शिवम त्रिपाठी

 

  • शिवम त्रिपाठी

 

बसपा सुप्रीमो मायावती को नजदीक से जानने वाले मानते हैं कि वे पीछे मुड़कर नहीं देखतीं। मतलब यह कि मायावती बीत चुके अतीत को गंभीरता से नहीं लेतीं, चाहे वह निजी जिंदगी हो या प्रोफेशन। राजनीति में भी वे आगे देखने की अभ्यस्त हैं, इसीलिए वे राजनीति में भी प्रयोग ज्यादा ही करती हैं। सपा से गठबंधन तोड़़ने के बाद अखिलेश यादव को गुनहगार बताने वाली मायावती की निगाह अब मुस्लिम वोट बैंक पर टिकी है। इसी में उनका फायदा दिखता नजर आ रहा है। भारतीय जनता पार्टी के हिन्दुत्व कार्ड के ठीक अपोजिट वे खुद को मजबूत करने के लिए सीधे तरीके से मुस्लिम कार्ड खेलना चाह रही हैं। सोशल इंजीनियरिंग की माहिर मानी जाने वाली मायावती मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण के जरिए बसपा को मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही हैं। यूपी में मुस्लिम वोटर 19 से 26 फीसदी हैं। यहाँ 12 जिले ऐसे हैं जहाँ एक तिहाई मुस्लिम आबादी है। इसी तरह 13 जिलों में 20 से 33 फीसदी 21 जिलों में 10 से 15 और 17 जिलों में 10 फीसदी मुस्लिम आबादी है। इसके अलावा पश्चिम यूपी को मुस्लिम वोटबैंक का बड़ा हिस्सा माना जाता है।

 

दरअसल, पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनावों में वोटर यह नहीं तय कर पाया कि सपा और बसपा में किसके साथ जाएं। और, यही वजह रही कि आखिर तक तय न हो पाने से मुस्लिम वोटों में बिखराव नजर आया। परंपरा के विपरीत इनके वोट बंट गए। प्रयागराज जिले के फूलपुर संसदीय क्षेत्र निवासी व पत्रकार रमाकांत त्रिपाठी बताते हैं कि मुस्लिम यह समझ रहा है कि समाजवादी पार्टी में उसकी उतनी अहमियत नहीं है जितनी मुलायम कार्यकाल में रही है। मुस्लिम परस्ती के कथित आरोपों को लेकर विरोधी मुलायम सिंह यादव को मुल्ला मुलायम का खिताब तक देने लगे थे। पर अब ऐसा नहीं है। मौजूदा पार्टी सुप्रीमो अखिलेश यादव समाजवादी पार्टी (सपा) में जाति विशेष का ठप्पा लगने के खिलाफ हैं। भारतीय राष्ट्रीय पत्रकार महासंघ के राष्ट्रीय संयोजक व परिष्ठ पत्रकार डॉ. भगवान प्रसाद उपाध्याय बताते हैं कि समय-समय की बात है। हर समय हर फार्मूला कामयाब नहीं हो पाता। वे कहते हैं कि सपा सुप्रीमो अखिलेश सिंह यादव अपने तरीके से पार्टी चलाना चाह रहे हैं। एक और वजह है, सपा में चल रही पारिवारिक जंग से होने वाला बिखराव…। कुछ ऐसी ही टिप्प्णी पूर्व जिला पंचायत सदस्य राम कैलाश सरोज, भाजपा के वरिष्ठ नेता इंद्रराज यादव, महेन्द्र पांडेय, होलागढ़ के कार्यकारी मंडल अध्यक्ष टीएन सिंह भी करते हैं। तर्क देते हैं कि भाजपा के सत्तासीन होने के बाद मुस्लिम वोटों का एक हिस्सा अभी भी इसे पचा नहीं पा रहा है, वे विकल्प की तलाश में हैं।

 

निश्चित रूप से समाजवादी पार्टी की आपसी कलह के चलते होने वाले बिखराव से मुस्लिम वोटर इसे ज्यादा भाव देने के मूड में नहीं दिख रहे हैं। चूँकि यूपी के भीतर कांग्रेस भी पिछले तीन दशक से अपना अस्तित्व बचाने के लिए हाँफने वाली कंडीशन में है, इसलिए मुस्लिम वोटर उधर से भी नजर फेर लिए हैं। वे एकजुट होकर कांग्रेस के भी साथ नहीं जा सकते। हालात कुछ ऐसे बन गए हैं कि फिलहाल, किसी एक दल के पक्ष में मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण नहीं हो पा रहा है। ऐसे में बसपा सुप्रीमो मायावती की रणनीति दलित वोटों को फिर से दुबारा जोड़ने की है जो बसपा से फिलवक्त छिटक चुके हैं। उधर, बिखरे मुस्लिम वोटरों का समर्थन अगर बसपा को मिल जाता है तो खुद को मजबूत दिखाकर वे अपने मूल दलित और अति पिछड़ी बिरादरी के वोटरों को साथ जोड़ लेने की कोशिश कर सकती हैं। इसी रणनीति के तहत मायावती इन दिनों मुस्लिम बिरादरी के नेताओं पर ज्यादा फोकस कर रही हैं। अमरोहा के सांसद दानिश अली को लोकसभा का नेता बनाया। पश्चिम यूपी और दानिश अली। एक तीर से दो निशाने साध रही हैं बसपा सुप्रीमो मायावती, राजनीतिक रणनीति का यह एक हिस्सा माना जा रहा है। राजनीति के पंडितों का तर्क है कि करीब 20 फीसदी मुस्लिम आबादी है। 15 फीसदी दलित वोटर हैं, दोनों को मिला देने के बाद आंकड़ा 35 फीसदी पहुंचता है, जो बसपा को संजीवनी तो दे ही सकता है।

 

लेखक सबलोग पत्रिका एवं न्यूज पोर्टल के पूर्वांचल रिपोर्टर हैं|
सम्पर्क – +919415383026

 

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