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उत्तरप्रदेश

वेस्टर्न यूपी: कभी चलता था सिक्का, अब वजूद का संकट

 

  • शिवाशंकर पाण्डेय 

 

सियासत में कभी उनका सिक्का चला करता। पर, समय बदला भी तो इस कदर कि वजूद बचाने का संकट सामने है। यूपी के पश्चिमी हिस्से में करीब डेढ़ दर्जन सियासी घराने ऐसे हैं, जिनके कभी ‘निगाह-फेर’ देने भर से सत्ता की गणित बदल जाया करती, कई दशकों तक ऐसे ही चलता रहा। दिन रात कार्यकर्ता-समर्थकों की लंबी भीड़, यहां से उठते सियासी बवंडर, चुनावी हवा का रूख भांपते पत्रकारों का हुजूम…। यह गुजरे जमाने की बात हो चुकी है। इन सियासी घरानों में अब सन्नाटा है। वजह, कद्दावर नेताओं और समर्पित कार्यकर्ताओं का अभाव। दल बदल और मौकापरस्ती ने यहां राजनीति का चेहरा काफी हद तक विद्रूप कर दिया है।

बागपत जिले की छपरौली से राजनीति शुरू करने वाले चौधरी चरण सिंह दो बार यूपी के मुख्यमन्त्री बने। बागपत से सांसद बने। केंद्रीय गृहमन्त्री से लेकर प्रधानमन्त्री तक की कुर्सी हासिल की। राष्ट्रीय राजनीति में अहम किरदार की भूमिका निभाने वाले चौधरी चरण सिंह के निधन के बाद बेटे अजित सिंह ने राजनीतिक विरासत संभाली। चरण सिंह की राजनीतिक ‘पूंजी’ का लाभ चौधरी अजित सिंह को मिलता रहा। बागपत सीट से अजित कई बार सांसद बने। 1998 में भाजपा की लहर में सोमपाल शास्त्री से चुनाव हारे। अगली बार फिर चुनाव जीते। 2014 में चुनाव के पहले ही मुजफ्फरनगर दंगा हुआ। इसका असर चुनाव में इस कदर पड़ा कि चौधरी अजित सिंह, उनके बेटे जयंत चौधरी समेत उनके दल के एक भी प्रत्याशी चुनाव नहीं जीत पाए। 2017 के विधानसभा उपचुनाव में महज एक प्रत्याशी सहेंद्र रमाला छपरौली से जीते पर कुछ समय बाद भाजपा में चले गए। खुद अजित सिंह इस बार अपनी सीट बदलकर मुजफ्फरनगर से चुनाव लड़ रहे हैं। चौधरी चरण सिंह की तीसरी पीढ़ी जयंत चौधरी इस बार बागपत से चुनाव मैदान में हैं। पश्चिम यूपी के प्रमुख दलों में शुमार रालोद अस्तित्व बचाने के लिए हांफ रहा है। चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत किसानों के बड़े नेता के रूप में उभरे। पश्चिमी यूपी के कई जिलों में सियासी हनक रही। भाकियू के नाम से बना दल महत्वाकांक्षा की भेंट चढ़ गया। कई हिस्से हुए। हालत यह है कि भाकियू को कोई भी दल भाव नहीं दे रहा है। चर्चित सीट कैराना में कभी हुकुम सिंह घराने का सिक्का चला करता। हुकुम सिंह कैराना से 1974 से लगातार चुनाव लड़ते रहे। सात बार विधायक और एक बार सांसद बने। 2014 में भाजपा से संसद पहुंचे तो उनकी बेटी मृगांका सिंह को टिकट मिला। हुकुम सिंह के निधन के बाद मृगांका सिंह ने विरासत संभाली। इस बीच हुकुम सिंह के भतीजे अनिल सिंह ने विद्रोह कर दिया। मृगांका चुनाव हारीं। दो बार चुनाव हारने के बाद मृगांका सिंह का टिकट कट गया। इस बार उनकी जगह गंगोह सीट से विधायक प्रदीप चौधरी चुनाव लड़ रहे हैं।

इमरान मसूद और रशीद मसूद

सहारनपुर में रशीद मसूद घराने का भी खासा दखल रहा। रशीद छह बार सांसद और तीन बार राज्यसभा सदस्य बने। केन्द्र में स्वास्थ्यमन्त्री रहे। उपराष्ट्रपति का चुनाव लड़े। समय बदला, रशीद की सियासी विरासत बेटे शाजान मसूद ने संभाली। पर कामयाबी नहीं मिली। रशीद मसूद के पोते सायान मसूद सपा सरकार में दर्जा प्राप्त राज्यमन्त्री बने। रशीद मसूद के भतीजे इमरान मसूद सहारनपुर जिले की मुजफ्फराबाद विधानसभा सीट से निर्दल विधायक बने पर इस परिवार पर भी ‘ग्रहण’ लग गया। इमरान ने परिवार से विद्रोह कर दिया। 2014 में कांग्रेस के प्रत्याशी बनकर चचेरे भाई शाजान के खिलाफ ही ताल ठोंक दी। इसमें भी पराजय मिली। इमरान सहारनपुर से कांग्रेस के टिकट पर मैदान में हैं। कैराना में ही मुनव्वर का घराना सियासत में दखल बनाया रहा। कैराना के हुकुम सिंह और मुनव्वर दोनों गुर्जर बिरादरी से और दूर के पारिवारिक रिश्ते में भी आते हैं। मुनव्वर हसन राज्यसभा, लोकसभा, विधानसभा से लेकर विधान परिषद यानि चारो सदनों में पहुंचे। मुनव्वर के पिता अख्तर हसन ने बसपा सुप्रीमो मायावती को संसदीय चुनाव में दो लाख वोटों से हराकर सुर्खियाँ बटोरीं। इसी प्रकार मुजफ्फरनगर में कभी कादिर राणा के परिवार की सियासी हनक रही। एमएलसी के बाद कादिर मोरना से विधायक चुने गए। बसपा प्रत्याशी बनकर 2009 में मुजफ्फरनगर से सांसद बने। उनके भाई नूर सलीम राणा चरथावल से बसपा विधायक चुने गए। भतीजे शहनवाज राणा बिजनौर से विधायक और उनकी पत्नी इंतखाब जिला पंचायत अध्यक्ष बनीं। 2017 के चुनाव में परिवार का कोई सदस्य किसी भी सदन में नहीं पहुंचा। इस बार कोई सदस्य चुनाव नहीं लड़ रहा। राजनीतिक ‘ग्रहण’ मेरठ जिले के अखलाक मंजूर घराने को भी लगा। अखलाक 1989 में मेरठ से जद से विधायक और इनके बेटे शाहिद अखलाक मेयर के अलावा 2004 में मेरठ से बसपा सांसद बने। 2009 में सेक्युलर एकता पार्टी बनाई, चुनाव लड़े और हार गए। 2014 में बसपा से लड़े पर फिर हारे। इसके पहले 2012 में अपने भाई राशिद अखलाक को मेरठ दक्षिण सीट से चुनाव लड़ाया वे भी हारे। अब यह घराना राजनीति से किनारा कर चुका है। बात चर्चित सीट किठौर की। यहां से मंजूर अहमद 1967 और 1969 में लगातार दो बार विधायक बने। बाद में गढ़मुक्तेश्वर से भी विधायक चुने गए। समय बदला, बेटे शाहिद मंजूर ने पिता की सियासत संभाली। 2002 से 2017 तक लगातार तीन बार विधायक के अलावा प्रदेश के बेसिक शिक्षा, वित राज्य मन्त्री, श्रम एवं सेवायोजन कैबिनेट मन्त्री तक बने। 2014 के लोकसभा चुनाव में शाहिद हार गए। 2017 में भी पराजय का मुंह देखना पड़ा। इस बार चुनाव से किनारा कर लिया। इन सियासी घरानों के घटते वजूद ने इस बार पश्चिम यूपी की चुनावी तस्वीर भी बदलकर रख दी है।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार, और सबलोग के यूपी ब्यूरो से सम्बद्ध हैं|

सम्पर्क –  +918840338705, shivas_pandey@rediffmail.com

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