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अरुणाचल प्रदेश

अरुणाचल के ‘बंवंग लोसु’ ने अपने जनजातीय समुदाय ‘वांचो’ की भाषा की लिपी बनाके रचा इतिहास

 

  • सुवालाल जांगू

 

अरुणाचल प्रदेश के लोंगडिंग जिला के बंवंग लोसु ने अपनी जनजाति समुदाय ‘वांचो’ की भाषा की लिपि की रचना करके विश्व इतिहास बना दिया। वांचो लाईची – अरुणाचल प्रदेश की एक प्राचीन जनजातीय समुदाय “वांचो” की भाषा हैं।  बंवंग लोसु ने वांचो लाईची (भाषा) की नयी वर्णमाला और लिपि बना कर इसे विश्व जनजातीय भाषालिपियों में शुमार कर दिया। लोसु की मेहनत से न केवल वांचो – लाईची को लिपि मिली, बल्कि इसको इंटरनेशनल यूनिकोड स्टैंडर्ड में भी जगह मिल गयी। जनजातीय भाषा की लिपि की रचना एक वैज्ञानिक आविष्कार से कम नही हैं। अरुणाचल में वांचो – जनजाति के इतिहास में यह एक महत्वपूर्ण घटना के रूप में दर्ज हो गयी। एक स्कूल बॉय का प्रोजेक्ट इस प्रकार से एक महत्वपूर्ण इतिहास मे तब्दील हो गया। अब वांचो – भाषा को अपनी एक स्वतंत्र लिपी मिल जाने से विश्व भाषा संग्रह में स्थान मिल गया हैं।

 

अरुणाचल के पूर्वी भाग में “वांचो – भाषा” एक तिब्बतो-बर्मी भाषा के रूप में बोली जाती है इसके अलावा यह भाषा म्यांमार, नागालैंड और असम के कुछ भागो में भी थोड़े भिन्नता के साथ बोली जाती है। वांचो – जनजाति और इसकी भाषा अरुणाचल प्रदेश की पटकाई पहड़ियां में स्थित लोंगडिंग जिला और इससे लगे हुये असम, नागालैंड और बर्मा में बसे हुये इस समुदाय में बोली जाती है। इस जनजातीय भाषा में उच्चारण के उच्च और निम्न स्वर के आधार पर शब्द का अलग-अलग अर्थ निकलता है। जैसे माई  शब्द का उच्चारण उच्च और निम्न ध्वनि में करने से इसका अलग-अलग अर्थ निकलता है। अगर आप माई  शब्द को जल्दी और हल्का बोलोगे तो इसका अर्थ – अच्छा होता है।अगर माई के “ई” को थोड़ा ज़ोर से बोला जाता है तो इसका अर्थ ­– पूछ होता है और अगर इस पर और ज्यादा ज़ोर देकर बोलते है तो इसका अर्थ – मांस होता है। इसलिए जनजातीय भाषाओ में किसी अक्षर या शब्द का अर्थ उसके उच्चारण करने के तरीके पर निर्भर करता है। इस वजह से जनजातीय भाषाओ में स्वर (vowels) अपेक्षाकृत ज्यादा होते है।

उच्चारणीय भिन्नताओ ने 2001 में 17वर्षीय स्कूल बॉय लोसु को परेशानी में डाल दिया, जब वह अपने वांचो – जनजाति समुदाय के सामाजिक-आर्थिक जीवन पर दिये गये एक प्रोजेक्ट का इंग्लिश से वांचो में अनुवाद करने की कोशिश कर रहा था क्योकि वांचो भाषा को रोमन लिपी में लिखा जाता रहा है जो बहुत कठिन होता है। इस भाषा के अक्षर और शब्दों का उच्चारण रोमन वर्णमाला में मुश्किल से होता है। उच्चारण में भिन्नता का मतलब शब्द की ध्वनि में बदलाव, ध्वनि में बदलाव का मतलब अर्थ में भिन्नता हो जाती है। इस प्रकार लोसु के स्कूल दिनो का एक अनुवाद-प्रोजेक्ट दो दशक की लम्बी यात्रा के बाद हकीकत मे बदलते हुये वांचो – एक जनजातीय भाषा की लिपी के तौर पर विकसित हुआ। इस भाषा को अकेले लोंगडिंग जिले में 55000 लोग बोलते है।

लिपि विकास प्रक्रिया की यह 2 – दशक की लम्बी यात्रा अगस्त माह के दूसरे सप्ताह में समाप्त हुयी जब इंटरनेशनल यूनिकोड स्टैंडर्ड में वांचो – भाषा की यूनिकोड प्रकाशित हुयी। सामान्य तौर पर यूनिकोड का अर्थ यह हुआ कि अब वांचो – भाषा को एक डिजिटल आइडैनटिटि (अंकीय पहचान) प्राप्त हो गयी और जिससे दुनिया भर में अब यह भाषा कम्प्युटर पर टाइप हो सकेगी हैं। वांचो – भाषा की लिपि को यूनिकोड का दर्जा मिलने की खबर पुणे में पढ़ायी कर रहे बंवंग लोसु को अगस्त के प्रथम सप्ताह में मिली। लोसु इसी साल जुलाई से पुणे के प्रतिष्ठ डेक्कन कॉलेज में भाषा विज्ञान की पढ़ाई कर रहे हैं।

लोसु और वांचो सांस्कृतिक समाज और छात्र संघ ने 2017 में वांचो – भाषा की लिपि को 2017 में इंटरनेशनल यूनिकोड स्टैंडर्ड को भेजा था। लोसु ने बताया, “हमने 2017 में इंटरनेशनल यूनिकोड स्टैंडर्ड को लिपि का प्रस्ताव भेजा था। जब मुझे इस बात का समाचार मिला तो मैं अति आनंदित हो गया। क्योंकि यह मेरे जीवन-भर का सपना रहा हैं।” वांचो लिपि में 44 अक्षर हैं जिनमें 15 स्वर और 29 व्यंजन हैं। बंवंग लोसु ने 2001 में लोंगडिंग जिला उच्च माध्यमिक स्कूल से 12 क्लास पास की थी। इसी समय से लोसु ने अपने भाषा ज्ञान के आधार पर वांचो भाषा के सभी शब्दों और उनकी आवाज को इकट्ठा करना शुरू कर दिया था। इसके अलावा लोसु ने गांव के बड़े-बुजुर्ग लोगों से भी कई बार भाषा के ज्ञान के बारे में विचार विमर्श किया।

लोसु ने बताया, “हमारी भाषा मौखिक लोककथाओं और कहानियों की हैं – कुछ शब्द इंग्लिश और हिन्दी से मिलते-जुलते और कई सारे दूसरे शब्द बहुत ही विलक्षण हैं।” कई सालों के शोध के बाद 2012 में लोसु ने अक्षरों की एक सूची तैयार की, एक पेपर पर प्रिंट लिया और अपने दोस्तों को दिखाया। हर कोई इससे प्रभावित हुआ। क्योंकि किसी ने भी पहले ऐसा नही किया था। वांचो सांस्कृतिक समाज और वांचो विद्यार्थी संघ ने लोसु के इस काम को एक प्रोजेक्ट के तौर पर लिया। लोग आगे आये और कई और शब्दों को जुड़ाते गये जिन्हें लोसु भूल गया था।  इसके लिए कई जगहों पर जागरूकता कार्यशालायें का भी आयोजन किया गया। 2013 में लोसु ने वांचो लिपि पर एक किताब प्रकाशित की थी। हालांकि वो रोमन लिपि में थी लेकिन मूल रूप से वांचो लिपि पर यह पहली किताब थी, जिसमें वांचो – भाषा के वर्णमाला का उच्चारण करने के अलावा कई दूसरी और जानकारिया थी।

पिछले 2 सालों से वांचो – भाषा को अरुणाचल प्रदेश की कई सरकारी विद्यालयों में एक विषय के तौर पर पढ़ाया जा रहा हैं। लोसु कहते हैं कि मैं बिना किसी भाषाविज्ञान के ज्ञान के, ये सब किया। स्कूल के दिनों में, मैं एक पायलट बनना चाहता था – जिसमें ज्यादा पैसा और आराम की ज़िंदगी थी। लेकिन ज़िंदगी ने मुझे कही और ले आयी। 2004-2005 के दौरान, जब लोसु इटानगर स्थित राजीव गांधी केन्द्रीय विश्वविद्यालय में अग्रेजी विषय में एमए कर रहे थे,उस समय उसको विश्वविद्यालय पुस्तकालय में भाषाविज्ञान और फोनेटिक्स पर एक किताब मिली। लोसु स्वयं अपनी आपबीती को बताते हुये क़हते हैं, “यह पहली बार था जब मैं भाषा कि तकनीकियों के बारे में पढ़ रहा था। मैं इसमें इतना खो गया कि विश्वविद्यालय से बाहर हो गया और फिर मैं वांचो लिपि के विकास पर पूरे समय के लिए काम करना शुरू कर दिया।”

कई लोगों ने मुझसे पूछा क्यों आप अपना समय बर्बाद कर रहे हो। कभी कभी तो मेरे पास कोई अच्छा जवाब नही रहता था। मैं ये तमाम बातें जानता था कि किसी भाषा को बोलने वाले चाहे 15 लोग हो या 15 लाख – हरेक भाषा महत्वपूर्ण होती हैं। और मैं अच्छा करूंगा मेरी अपनी भाषा को बनाये रखने के लिए। बंवंग लोसु ने जुलाई 2019 में पुणे स्थित डेक्कन पीजी कॉलेज और अनुसंधान संस्थान के भाषाविज्ञान विभाग में एमए कोर्स में प्रवेश लिया हैं। उसके द्वारा खिची गयी कच्ची रेखाओं से एक ब्रांड नई लिपि के विकास के लगभग 15 साल बाद, बंवंग लोसु आखिरकार औपचारिक तौर पर भाषाविज्ञान का अध्ययन कर रहा हैं।

जनजातीय भाषायें उत्पति के आधार पर पुरानी और स्वभाव से प्राकृतिक होती हैं। दूसरी जनजातियों की और बाहरी भाषाओं से बहुत ही कम संपर्क में होने से मौलिक, प्राकृतिक और शुद्ध होती हैं इसीलिए भाषा की वर्णमाला की रचना करना बहुत मुश्किल होता। जनजातीय भाषायें का प्रचलन मौखिक, बोलचाल और स्मृतियों के रूप में मौजूद रहती हैं। जनजातीय भाषा तब तक ही जिंदा रहती हैं जब तक इसको बोलने वाले हैं। देश एक साल में कोई एक-आधा दर्जन बोलियाँ मर जाती हैं क्योंकि इनको बोलने वाले नही रहने से और लिपि नही रहने से। लिपि की वजह से कोई भाषा मरती नही हैं वो हमेशा जिंदा रहती हैं। 2017 में अंडमान निकोबार में बोली जाने वाली बो – भाषा खत्म हो गयी क्योंकि इसको बोलने वाली आखरी बो – महिला के मर जाने से।

पूर्वोत्तर में कोई 250 से अधिक जनजातीय भाषायें हैं लेकिन इनमें से कोई एक दर्जन भाषाओं ही लिपिबद्ध हैं। भाषा की लिपि से उस समुदाय की न केवल भाषा बल्कि उसके इतिहास, साहित्य और संस्कृति की जड़ें, विकास और समृद्धि का पता जलता हैं। अब लिपि के हो जाने से वांचो – समुदाय के इतिहास और साहित्य के बारे में कई जानकारिया सामने आएगी। वांचो भाषा की लिपि और यूनिकोड बन जाने से पूर्वोत्तर राज्यों की सेकड़ों जनजातीय भाषाओं की लिपियों के विकास के प्रयासों को प्रोत्साहन और माहौल मिलेगा। बंवंग लोसु का यह आविष्कारीक कार्य काफी सराहनीय और प्रेरणादायक हैं। सरकार और समाज को इस प्रकार के प्रयासों को और बढ़ावा देना चाहिए। एक सामान्य आदमी के तौर पर लोसु का यह कार्य साहित्यकारों, भाषावैज्ञानिकों और समाज वैज्ञानिकों के लिए भी एक चुनौती और सबक़ हैं।

लेखक मिजोरम विश्वविद्यालय, आइजोल में राजनीति पढ़ाते हैं|
सम्पर्क- +919436768637, sljangu18@gmail.com

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