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दिल टूटा, गठबन्धन टूटा, रिश्ते चकनाचूर – शिवाशंकर पाण्डेय

 

  • शिवाशंकर पाण्डेय

 

आखिरकार सपा और बसपा का गठबन्धन टूट ही गया। 24 जून को बसपा सुप्रीमो मायावती ने सपा के साथ अपनी पार्टी के सारे रिश्ते तोड़ने का ऐलान आधिकारिक तौर पर करके महीनों से चली आ रही अटकलों पर विराम लगा दिया। इसी दिन बसपा सुप्रीमो मायावती ने लगातार तीन ट्वीट किए। साफ तौर पर सार्वजनिक किया कि सपा (समाजवादी पार्टी) से गठबन्धन खत्म। बसपा अब सारे चुनाव अकेले ही लड़ेगी। यूपी की सियासत में इसे बड़े घटनाक्रम के रूप में देखा जा रहा है। युवा पत्रकार शिवम तिवारी कहते हैं – बसपा, सपा और रालोद के गठबन्धन का प्रयोग सफल न होने पर ये तो होना लाजिमी ही था। भारतीय राष्ट्रीय पत्रकार महासंघ प्रतापगढ़ के जिलाध्यक्ष अजय पाण्डेय कहते हैं – बसपा नये सिरे से दुबारा ताकत बटोरने के प्रयास में है। भाजपा के युवा नेता सूरज सिंह, ऋतुराज पाण्डेय की टिप्पणी – स्वार्थ के रिश्ते ज्यादा समय तक टिकते नहीं। राजनीतिक स्वार्थ के लिए दोनों दल एक हुए जरूर, पर बाद में दोनों अपनी-अपनी जगह। फिलहाल, लगता है कि बसपा (बहुजन समाज पार्टी) अब नये सिरे से खुद को मजबूत करना चाहती है। इसी तैयारी का एक प्रमुख हिस्सा इसे माना जा रहा है। राजनीतिक क्षेत्र में इस बात की चर्चा तेज है कि सोशल इंजीनियरिंग में माहिर मायावती कुछ नया सियासी प्रयोग करना चाहती है।

यूपी में बसपा और सपा दो प्रमुख दल के रूप में पहचाने जाते रहे हैं। दलित, मुसलिम और पिछड़ी जातियों के ध्रुवीकरण ने कई दशक तक सपा और बसपा की सियासी हनक बरकरार रखी। इसी जातीय गणित के चलते यूपी में सपा और बसपा कई साल तक सत्ता में भी रही। इसके पहले वर्ष 1993 में बसपा और सपा का गठबन्धन हुआ था पर उस समय मायावती और अखिलेश यादव नहीं बल्कि पार्टी प्रमुख के तौर पर कांशीराम और मुलायम सिंह यादव थे। गठबन्धन भी डेढ़ साल से ज्यादा चला। सपा और बसपा की मिलीजुली सरकार भी रही। 2 जून 1995 को गेस्ट हाउस कांड ने कांशीराम और मुलायम सिंह को एक दूसरे का इस कदर विरोधी बना दिया कि दोनों एक दूसरे को फूटी आंख देखना नहीं चाह रहे थे। गेस्ट हाउस कांड में मायावती पर जानलेवा हमला किया गया। शरीर के कपड़े तक फाड़ दिए गए। इसके लिए मुलायम सिंह को जिम्मेदार माना गया। सत्रहवीं लोकसभा चुनाव के नजदीक आते ही सत्ता की कुर्सी वाली इच्छा इस कदर बढ़ी कि एक दूसरे के धुर विरोधी मायावती और अखिलेश यादव को गठबन्धन करने के लिए मजबूर कर दिया। 26 साल बाद दोनों एक साथ एक मंच पर दिखे। गठबन्धन का ऐलान करने के बाद सरकार बनाने का दावा करने लगे। बाद में इस गठबन्धन में रालोद भी शामिल हो गया। मायावती अखिलेश यादव और अजित सिंह मिलकर पूरे संसदीय चुनाव में न सिर्फ मजबूत गठबन्धन का दावा बार बार दुहराते रहे बल्कि मोदी सरकार को उखाड़ फेंकने और गठबन्धन की जीत का दावा सार्वजनिक मंच पर करते रहे। संसदीय चुनाव का परिणाम बेहद चैंकाने वाला आया। मोदी के बवंडर में सारे दल धराशायी हो गए। सपा पांच सीट पर रह गयी तो दो सीट पर लड़ी रालोद का खाता नहीं खुला। रालोद प्रमुख अजित सिंह और उनके बेटे जयंत चौधरी दोनों ही चुनाव हार गए। बसपा को अलबत्ता थोड़ा फायदा मिला। पिछले संसदीय चुनाव में बसपा शून्य पर रही पर इस बार 10 संसदीय सीट पर जीत मिली। चुनाव परिणाम आने के बाद से ही बसपा सुप्रीमो मायावती ने हार का ठीकरा सपा पर फोड़ना शुरू कर दिया। 24 जून को मायावती ने सपा से गठबन्धन तोड़ने का फैसला सार्वजनिक करके यूपी की राजनीति के पटल पर एक नई इबारत लिखना शुरू किया है। कभी दलित, अति पिछड़े वोटरों के बल पर राज करने वाली बसपा को दुबारा उनका समर्थन हासिल करना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है।

लेखक सबलोग के यूपी ब्यूरोचीफ और भारतीय राष्ट्रीय पत्रकार महासंघ के प्रदेश महासचिव हैं|

सम्पर्क –  +918840338705, shivas_pandey@rediffmail.com

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