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मांद में मात

  • जावेद अनीस

भारतीय राजनीति में 16 मई 2014 के बाद 11 दिसबंर 2018 की तारीख एक अहम पड़ाव है.  ऐसा माना जा रहा था कि इस बार पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे आने के बाद देश के राजनीति की दिशा बदलने वाले साबित हो सकते हैं और ठीक ऐसा होता दिखाई भी पड़ रहा है. तीन राज्यों मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ में कांग्रेस और भाजपा सीधे तौर पर आपने-सामने थीं. भाजपा के सामने चुनौती इन तीन राज्यों में अपनी सरकारों को बचाने की थी. राजस्थान में हर पांच साल बाद सत्ता बदलने का चलन रहा है लेकिन मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में तो भाजपा पिछले पंद्रह सालों से सत्ता में है. इसलिये कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिये यह राज्य बहुत अहमियत वाले थे. पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा इन तीनों राज्यों की कुल 65 लोकसभा सीटों में से 62 सीटों पर चुनाव जीता था. कांग्रेस के लिये तो यह एक तरह से अस्तित्व से जुड़ा हुआ चुनाव था.

राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की वापसी तय मानी जा रही है और मध्यप्रदेश में भी कांग्रेस की सरकार बनने की संभावना है. यह कांग्रेस की जबरदस्त वापसी है और इससे देश की राजनीति में लम्बे समय से अपना मुकाम तलाश रहे राहुल गांधी आखिरकार एक राजनेता रूप में स्थापित हो जायेंगें.

इन तीनों राज्यों में अगर कांग्रेस सरकार बना लेती है तो इसमें उसके लिये मध्यप्रदेश की जीत बहुत खास होगी. दरअसल गुजरात के बाद मध्यप्रदेश को भाजपा व संघ की दूसरी प्रयोगशाला कहा जाता है यहां जनसंघ के जमाने से ही उनका अच्छा-खासा प्रभाव है इसलिये मध्यप्रदेश के नतीजे का विशेष महत्त्व है इससे कांग्रेस को भाजपा पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने में मदद मिलेगी.

मध्यप्रदेश में बहुत ही थोड़े समय में कांग्रेस ने अपना कायाकल्प करने का चमत्कार किया है  और इसका श्रेय निश्चित रूप से राहुल गांधी को दिया जायेगा जिन्होंने कमलनाथ, सिंधिया और दिग्विजय सिंह की जिम्मेदारी तय करते हुये इन्हें एक साथ काम करने को प्रेरित किया.

इस साल एक मई को कमलनाथ को मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष की जिम्मेदारी मिली थी, इस दौरान उनका सबसे ज्यादा फोकस संगठन और एकजुटता पर रहा. इस दौरान उन्होंने पंद्रह साल से सुस्त पड़ चुके संगठन को सक्रिय करने पर जोर लगाया जिससे पार्टी बूथ स्तर तक खड़ी दिखाई पड़ने लगी. लेकिन मध्यप्रदेश में असली कमान राहुल गांधी के हाथों में रही जिसमें  कमलनाथ और सिंधिया को साथ में रखते हुये खुद फ्रंट पर दिखाई दिये. मध्यप्रदेश में राहुल ने सबसे अधिक 25 जनसभाएं और 4 रोड शो किये.

अगर 16 मई 2014 का दिन नरेंद मोदी का दिन था तो 11 दिसबंर 2018 राहुल गांधी का दिन है. यह उनके कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर एक साल पूरा करने का दिन भी है जिसका सेलिब्रेशन उन्होंने अभी तक के अपने राजनीतिक जीवन की सबसे बढ़ी सफलता के साथ किया है.

राहुल का अभी तक का सफर संघर्ष और विफलताओं से भरा रहा है. इस दौरान उनके हिस्से में जबरदस्त आलोचनायें, मात और दुष्प्रचार ही आये हैं. लम्बे समय तक उनकी छवि एक अनिक्षुक, अगंभीर, बेपरवाह, कमअक्ल और ‘पार्ट टाइम पॉलीटिशियन’ राजनेता की रही है. इस दौरान उनका जितना मजाक शायद ही किसी और राजनेता का बनाया जाता हो, वे ट्रोल सेना के भी फेवरेट थे. लेकिन गुजरात विधानसभा चुनाव के बाद से राहुल एक जुझारू नेता के रूप में उभर कर सामने आये, जहां वे कुछ अलग ही अंदाज में दिखाई दिये थे जिसे देखकर लगा कि एक नेता के तौर पर उनकी लंबी और उबाऊ ट्रेनिंग खत्म हो चुकी है.

गुजरात में उन्होंने मोदी–शाह की जोड़ी को उन्हीं की जमीन पर बराबरी का टक्कर दिया था, इसके बाद कर्नाटक में भी उन्होंने आखिरी समय पर गठबंधन की चाल चलते हुये भाजपा की इरादों पर पानी फेर दिया था. गुजरात विधानसभा चुनाव ने राहुल गांधी और उनकी पार्टी को एक नयी दिशा दी है, इसे भाजपा और संघ के खिलाफ काउंटर नैरेटिव तो नहीं कहा जा सकता लेकिन इसने राहुल और उनकी पार्टी को मुकाबले में वापस आने में मदद जरूर की है. आज वे मोदी सरकार के खिलाफ विपक्ष की सबसे बुलंद आवाज बन चुके हैं.

वे अपने तीखे तेवरों से नरेंद्र मोदी की “मजबूत” सरकार को बैकफुट पर लाने में कामयाब रहे हैं, रफेल का मामला इसका सबसे बड़ा उदाहरण है जिसमें मोदी सरकार बुरी तरह से घिरी नजर आ रही है.

पिछले कुछ समय से राहुल लगातार खुद को पूरे विपक्ष की तरफ से नरेंद्र मोदी के विकल्प के तौर पर पेश करने की कोशिश कर रहे हैं. विपक्ष के दूसरे नेताओं के मुकाबले वे नरेंद्र मोदी के खिलाफ ज्यादा मुखर और आक्रामक राजनीति कर रहे हैं ऐसे में अगर कांग्रेस भाजपा को उसके दूसरे सबसे बड़े गढ़ में मात देने में कामयाब हो जाती है तो यह राहुल की अभी तक की सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जायेगी और उनकी इस कोशिश को एक ठोस मुकाम मिल जायेगा और वे हाशिये पर पड़ी कांग्रेस को वे भारतीय राजनीति के केंद्र में लाने में सफल हो जायेंगें.

राहुल के बरक्स नरेंद्र मोदी मध्यप्रदेश के चुनाव अभियान से सेफ दूरी बना कर चलते नजर आये. जहां एक तरफ राहुल गांधी मध्यप्रदेश को सबसे ज्यादा समय दिया, वहीँ नरेंद्र मोदी प्रदेश के चुनावी में खुद को सीमित किये रहे. राज्य में भाजपा के चुनाव प्रचार अभियान में भी केंद्र की उपलब्धियों पर ना के बराबर फोकस किया गया, ऐसा शायद इसलिये किया गया कि अगर इन राज्यों में भाजपा की हार होती है तो इसके जिम्मेदारी मौजूदा मुख्यमंत्रियों पर टाली जा सके और 2019 लोकसभा चुनाव के लिये मोदी ब्रांड को बचाये रखा जा सके .

बहरहाल 2018 ने जाते-जाते कांग्रेस को लाईफ लाईन दे दिया है जिसके सहारे वो 2019 के आम चुनाव में नये जोश और तेवर के साथ उतरेगी. इससे राहुल गांधी के विपक्ष में चेहरे के तौर पर स्वीकार्यता भी बढ़ेगी.

लेकिन इससे कांग्रेस और अन्य विपक्षी पार्टियां से यह सन्देश निकलती हैं कि 2019 में उनके लिये नरेंद्र मोदी को हराना बहुत आसान हो गया है तो यह उनके लिये आत्मघाती साबित हो सकती है. 2019 का चुनाव अलग ही ढर्रे और पिच पर पर लड़ा जायेगा.

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं|

 

 

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