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बोलने का बदलता सामाजिक-दायरा और भाषा

राजनीति राष्ट्रीय आत्मसम्मान की रीढ़ है। इस रीढ़ की मजबूती सुनिश्चित करने के लिए जनप्रतिनिधियों का चुनाव होता है। देश अपने राजनेता पर गर्व करता है जब उसका नेता सार्वजनिक रूप से बोल रहा होता है; कहीं किसी को सम्बोधित कर रहा होता है। भारतीय राजनीति के वे दिन देखें, जो ब्रिटिश राज की हुकूमत के थे; हमारे राजनीतिज्ञ जिस साहस, आत्मबल, दृढ़-संकल्प से अपनी बात लोगों के बीच रखते थे; अपनी सोच और इरादे को उनसे साझा करते थे; वह ‘कम्यूनिकेशन’ की आधुनिक शब्दावली में भी सर्वोत्तम तरीका कहा जाएगा। दरअसल, सार्वजनिक जीवन में बोलना एक शऊर का काम है। तब तो और जब हम किसी खास ओहदे पर हों। राजनीति का विस्तार और प्रभाव चौतरफा होने के नाते राजनीतिक व्यक्तित्व से शालीन और मर्यादित आचरण की अपेक्षा अधिक की जाती है। हाल के दिनों में राजनीति की जन-माध्यमों पर निर्भरता बढ़ी है। प्रचार-संस्कृति के बाजारू-संस्करण ने नई चिंताओं को सिरजा है। आजकल राजनेता बिना किसी पूर्व तैयारी और समीक्षा के बोल रहे हैं। (हाँ, वे जनता के मुद्दों का ‘गेटकीपरिंग’ खूब कर रहे हैं) यह जानते हुए भी कि उनका बोला अब राष्ट्रीय सीमाओं से बाहर तक अपनी पहुँच और दख़ल रख रहा है। फिर वह क्यों अनर्गल प्रलाप अथवा बिलावज़ह आरोप-प्रत्यारोप करते दिखते हैं; समझ से बाहर है। जबकि उनके द्वारा कही जाने वाली इन सब बातों से देश की गरिमा को ठेस पहुँचता है, अपनी छवि जो धुमिल होती है सो अलग। भारत में पहले बोलना दिल से होता था, अब दिमाग से। अब बोलने का मिज़ाज और लहजा बदला है, तो बोलने वाले की नियत और नेक-ईमान भी बदल चुकी है। मौजूदा राजनीति में आत्मबल से हीन व्यक्ति भी राजनेता बन सकते हैं। वे धनबल-बाहुबल, वंशवाद या फिर भाई-भतीजावाद के बूते जन-प्रतिनिधि होने का गौरव हथिया सकते हैं। सो वे क्यों राजनीति में ज़मीनी अनुभव और अनुभवी ज्ञान को तरज़ीह दें। किसी तजु़र्बे या तज़रबे के आगे शीश नवाए। आखिर उन्हें जरूरत ही क्या है कि वे सही बोलने का जिम्मा उठाए जबकि उनके कुछ भी बोल देने का रत्ती भर नुकसान उनको या उनकी पार्टी को न होता हो।

लेकिन यह बात भाषा का व्यक्ति नहीं कह सकता है। विचारों में जीने का आदी इंसान इसको सही नहीं ठहरा सकता है।  क्योंकि भाषा का आदमी यह बखूबी जानता है कि भाषा में कही जा रही बातें लिखे में आने के बाद स्थायी हो लेती हैं। महानता के सारे शास्त्र और ऐतिहासिक उद्बोधन कहे-सुने को लिखित स्वरूप प्रदान कर ही कालजयी हुई हैं। वैसे भारत में लेखन का काम बहुत बाद में हुआ। पहलेपहल तो लोगों में कहने-सुनने की रवायत ही आम थी। इसे बहुविध नामों से जाना जाता है-श्रुत, श्रवण, वाचिक, मौखिक, शाब्दिक इत्यादि। आज की साहित्यिक शब्दावली में कहें, तो देखे के बारे में लिखित बयान संस्मरण कहे गए। देखे का लिखित वर्णन भाषा की विधा में रिपोर्ताज और यात्रा-वृत्तांत कहलाए। लोक-केन्द्रित कथा-कहानी एवं उपन्यास की निर्मिति के पीछे भी कोई न कोई घटित सचाई हुआ करती है जिसका प्रत्यक्ष या परोक्ष उद्घाटन साहित्य अपने तरीके से करता है। प्राचीन काल में बीते अथवा घटित अनुभव को स्मृति में संजोये रखने का चलन खूब था। नई पीढ़ी के लिए ये अनुभव बड़े काम के थे। आगत भविष्य के बारे में ठीक-ठीक अनुमान लगा लेने के ये वे औजार थे जिसके बलबूते मनुष्य ने प्रकृति पर विजय पा ली थी। विभिन्न ख़तरनाक परिस्थितियों से जूझने का तरीका जान लिया था। चूँकि लोक अपने ज्ञान को सब में बाँटने का कार्य करता है। इसलिए पहले लोगों की आपस में बैठकी होती थी, चौपाल या मज़मा लगता था। बड़े-बुजुर्ग को सभी लोग बड़े चाव से सुनते थे। उनके अनुभव को सुनने और गुनने का काम साथ-साथ चलता रहता था। अक्सर इस प्रकार की बातचीत अथवा परिचर्चा में ज़िरह-बहस, तर्क-वितर्क, वाद-विवाद, सहमति-असहमति इत्यादि ज़ाहिर होते थे; जिनके निवारण की औषधि भी इन्हीं लोगों के पास हुआ करती थी। अनुभव के कच्चे होने पर तैश खाना स्वाभाविक है। नासमझ होने की स्थिति में हर बात पर क्रोध करना हमारी आदत है। जल्दबाज होने पर हड़बड़ी में कोई बड़ी गड़बड़ी कर बैठना हम सबकी फितरत है। इसी कारण बोलने-चालने की यह रवायत सबके लिए सामाजिकता की प्रयोगशाला थी। लोकवृत्त की यह हिन्दुस्तानी परिपाटी थी जिसे जुर्गन हैबरमास ने ‘पब्लिक स्फियर’ कहा है। हैबरमास थोड़ा ‘इंटेलेक्चुअल्टी’ पर बल अधिक देते हैं।

अब तो हुआ यह है कि लेखन के आधुनिक तौर-तरीकों ने सम्पर्क-संवाद की पुरानी विधाओं तथा विधियों को हथिया लिया है। इस कारण बोलने-चालने का ढर्रा काफी कुछ बदल चुका है। हम भाषा की जगह अक्षरों में बतिया रहे हैं। हम इस बात को लेकर कतई बेचैन नहीं है कि हमारा पढ़ा-लिखा कितना अनुभवसाध्य, सुविचारित और मूलतः हमारे हृदय के तंतुओं को छूने वाला है। उसमें ज्ञान के साथ विज्ञान और सबसे जरूरी तत्त्व संवेदना कैसी है। इलेक्ट्राॅनिक मीडिया तथा सोशल मीडिया के ठिकानों में कही जा रही अधिसंख्य बातें दुहराव और दोहरेपन का शिकार हैं। हर कोई दूसरे के स्क्रीन में हाज़िर होने को लालायित है। अब संभव नहीं रहा कि बिना किसी गैर-जरूरी विवाद और मनगढंत सनसनी ख़बर से उलझे-गुजरे दिन निकल जाए। इन सबके बीच एक प्रवृत्ति जो खासतौर पर लोगों के भीतर पनपी है वह है-आत्ममुग्धता। बदलाव के इस घटाटोप के कारण वितण्डावाद से लेकर विसंगतियों तक में इज़ाफा हो गया है। हम अपने ही मोबाइल-सेट या सोशल-मीडिया के प्लेटफाॅर्म पर गैर-जरूरी चीजों की बढ़ती आमद से परेशान हैं। कई बार हम हैरान होते हैं कि क्यों लोगों को सुबह-शाम खलबली मची होती है कि वह अपने को अधिक से अधिक लोगों के मोबाइल-स्क्रीन पर प्रकट कर ले। उनकी हसरत में है कि हाय-हैलो से लेकर कथा-चुटकुला चाहे जिस भी रूप में हो; बस मैसेजिंग हो जानी चाहिए। इसी तरह स्मृति-इतिहास, संस्कृति-परम्परा, कला-साहित्य, मूल्य-विश्वास, प्रतीक-संकेत सबकुछ अक्षरों अथवा अजीबोगरीब ‘इमोजियों’ या मीम्स’ के हवाले हो चुके हैं।

इस बदलाव की चपेट में समाज और उसका बदलता सामाजिक दायरा सबसे पहले है। इसका चिंताजनक पहलू यह है कि इससे आपसी लगाव का सामूहिक-बंध टूटा है। अनावश्यक दोस्ती-यारी से अटी पड़ी आभासी दुनिया ने एक सामूहिक मिथ रच दिया है। जबकि हमारी वास्तविक दुनिया खुश होने की जगह गुमसुम है। संचार की शब्दावली में राजनीति इस ‘स्पाइरल आॅफ साइलेंस’ का जनक है। कारण कि वर्तमान राजनीति से हमारे मनोव्यवहार और उसकी मनोगतिकी तक निर्धारित होने लगे हैं। सरकार और शासकीय-तंत्र को हमने अपना ‘लाइफ लाइन’ घोषित कर दिया है। राजनीति को प्राप्त इस केन्द्रीयता ने हाल के दिनों में व्यक्ति और समाज की चूलें इस कदर कस दी है कि राजनीतिक कार्यकलाप, गतिविधियाँ, घटनाक्रम आदि हमारे लिए जरूरी खुराक-सा हो गए हैं। बच्चों की कार्टून में दिलचस्पी जिस बेशुमार तरीके से बढ़ी है; सयाने लोगों की ख़ातिर बहुचर्चित राजनीतिज्ञ बिल्कुल कार्टून-चरित्रों की भाँति जनता के मनोरंजन का उम्दा साधन हो चले हैं। अधिसंख्य जनता उनके बहुरुपिएपन को पसंद करती है; उनके नकलचीपन पर उछलती है। कई बार तो वह उनकी गाली-गलौच की भाषा पर योग से लेकर समाधि तक की यात्रा तय कर लेती है। प्रश्न उठता है, ऐसा क्यों हो रहा है तो जवाब है-‘मूल्यहीन राजनीति’। ध्यान दिया जाए तो राजनीति अपने अधिकार और कर्तव्य पर सबसे अधिक परदा डालने में जुटी है। सांविधानिक नीति निर्देशक तत्त्वों तथा दिशा-निर्देशों का उल्लंघन और उसका माखौल बनाने का काम राजनीतिज्ञों द्वारा ही सर्वाधिक किया जा रहा है।

इन दिनों राजनीतिक-व्यवहार चूँकि दर्शनीय तथा सर्वसुलभ है इस कारण इनका अतिक्रमण हमारे ऊपर ही नहीं हमारे अन्दर भी सबसे ज्यादा हो रहा है। अप्रत्याशित एवं अनपेक्षित तरीके से समाज में राजनीति की बढ़ती केन्द्रीयता ने हमारे सामाजिक व्यक्तित्व और सामूहिक सम्बन्धों का सत्यानाश कर डाला है। हम बाहरी और फ़ालतू के मुद्दों पर जिरह-बहस करने लग जाते हैं। जबकि राजनीतिक ‘एजेण्डा-सेटिंग’ से उलट हमारी दुनियादारी और निजी घरेलूपन संकरा और नितांत स्वार्थी होता चला जाता है। हमारी अपनी खू़बी-विशेषता, संस्कार-तहज़ीब या तो नष्ट हो जाते हैं या कि फिर छिन्न-भिन्न। नतीजतन, हम राजनेताओं के बयान में अपनी प्रसन्नता ढूँढते हैं। उनके द्वारा रैलियों के दौरान कही गई बातों से अपना भविष्य सुरक्षित पाते हैं। यही नहीं वह चाहे जिस किसी प्रेस-वार्ता में जो आँकड़े परोस देते हैं; हम उसी पर लटटू हो जाते हैं। ऐसा क्यों हो रहा है? इसके लिए संचार के बदलते सामाजिक दायरे की पड़ताल जरूरी है। क्योंकि आवश्यक पर अनावश्यक चीजें इस कदर आच्छादित हो चली हैं मानों अपनी जिंदगी भी विज्ञापन के ट्रैक पर हो जिनका हमारे प्रति सम्बोधन तो होता है; लेकिन जिंदा जुड़ाव या सजीव प्रेम नहीं झलकता है। हमें यह बात जे़हन में रखनी चाहिए कि संचार के साथ भाषा सम्बन्ध कायम रखती है। अपनी मजबूत पकड़ बनाती है। संचार-साधनों में प्रयुक्त भाषा का सामाजिक दायरा विस्तुत और बहुआयामी होता है। इसीलिए हम मानते हैं कि समाज के साथ भाषा की भूमिका सहोदरी है। अंतःक्रिया के स्तर पर साझेदारी की है। यह देखें कि संचार की बुनियादी समझ सूचना, शिक्षा एवं मनारंजन को  समाज के जिन अंतःआधारों से जोड़ते हैं; भाषा उन सबके केन्द्र में है। हाल के दिनों में भाषा के मुहाने बदले हैं। उनमें प्रत्याशित-अप्रत्याशित बदलाव बहुतेरे हुए हैं। इन सबका कारण बदलता हुआ समाज-शास्त्र है, तो उसका मुख्य कारक कहीं न कहीं आधुनिक संचार-संस्कृति और भाषिक-राजनीति भी है।

संचार-संस्कृति के बदले किंतु सकारात्मक ‘फाॅर्मेट’ की बात करें, तो तकनीकी एवं प्रौद्योगिकी आधारित वैज्ञानिकता ने नई संवृत्तियों (फिनोमिना) को जन्म दिया है। यह अन्तर सिर्फ ‘सरफेस’ तक नहीं सीमित है, अपितु ‘कोर स्ट्रक्चर’ तक इसका असर गहरा है। आधुनिक समय में तर्क एवं विवेक आधारित चिन्तन-दृष्टि का बाहुल्य है जिसने अधिरचना और मनोरचना दोनों को प्रभावित किया है। यानी जो कुछ घट रहा है उसका सीधा प्रभाव बाहर से लेकर भीतर तक जबर्दस्त है। इसकी सबसे अच्छी परिणति है-लोकतंत्र यानी ‘डेमोक्रेसी’। लोकतंत्र की आधारभूमि है-समानता, स्वतन्त्रता एवं विश्वबंधुत्व। आधुनिक लोकतंत्र की संकल्पना ने भारतीय जनसमाज का नक़्शा बदलकर रख दिया है। इस सहस्त्राब्दी में ‘आईसीटी’, ‘डीएससी’, ‘कन्वर्जेंस’, ‘मार्केट’, ‘कम्युनिकेशन’ एवं ‘लैंग्वेज हेजमनी’ की बदलती स्थितियाँ निर्णायक हैं। सूचना-समाज की बदली हुई स्थितियों ने साबित किया है कि आधुनिक समय कुशल दक्षता एवं प्रवीणता का है; सूचनाओं के अपरिमित प्रयोग, प्रभाव और प्रविधि का है। जातिवाद, क्षेत्रवाद, सत्तावाद, सामंतवाद आदि धारणाएँ अब विलुप्त हो रही हैं। जातिसूचक नामों का आतंक, दबदबा तथा रौब-दाब ख़त्म हो रहे हैं और जो लोग इसे अब भी छाती से चिपकाए बैठे हैं; उनकी स्थिति अंधविश्वासी से इतर कुछ नहीं है। इन अर्थों में भाषा की चालाकियों और उसकी बेशुमार राजनीति को समझना जरूरी हो चला है। ऊपरी तौर पर संचार आधारित भाषा ने अपना शब्दार्थ बदल डाला है; सामाजिक विधि-विधानों में जरूरी फेरफार किया है। हम समझते हैं कि अभिव्यक्ति आधारित अभिव्यंजना का पुरातन समीकरण बदल चुका है। अब शब्द सबके हैं इसलिए अर्थ पर सबका समान अधिकार कायम है।  यह सचाई का एक पक्ष मात्र है जिसके अपने प्रभाव और परिणाम है। परन्तु कुल सकारात्मक रूख के बावजूद बदलाव के मूलभूत कारकों और सूचकांकों को पढ़ा जाना आवयक है; इनकी यथोचित एवं गंभीर पड़ताल जरूरी है।

यह इसलिए भी जरूरी है कि हमारी समझ और सूचना आधारित बोध पश्चिम की ओर मुख कर चकित एवं किंकर्तव्यविमूढ़ भाव से खड़ी दिखाई देती है। इतिहास-बोध और सामाजिक-संस्कृति से सहजात लगाववृत्ति नहीं होने के कारण हम तात्कालिक परिणाम और निष्कर्ष को ही सबकुछ मानते हैं। हम तकनीकी-प्रौद्योगिकी आधारित विकास को महत्त्व देते हैं जबकि विज्ञान और वैज्ञानिक प्रवृत्तियाँ आज भी आम भारतीयों में सबसे कम है। जबकि हमें पता होना चाहिए कि हमने अपने श्रम, शिल्प, शैली और सौन्दर्यात्मक काव्य-रूपों का पूरे विश्व में लोहा मनवाया है। भारतीय जनसमाज में लोकवृत्त जैसी खदबदाहट और परिपाटी काफी पहले ही शुरू हो गई थी। लोकायत से लेकर साहित्य का भक्तिकाल आधुनिकता की पूर्वपीठिका इन्हीं अर्थों में है। प्रचलित पांडित्य को चुनौती देने का काम संत-साहित्य ने किया। उसने संस्कृत की ‘दैवीय सत्ता’ को नकारा और देशज भाषा-बोली में साहित्य-रचना कर लोकप्रियता के नए संस्करण आरंभ किए। लोकमानस को न सिर्फ गहरे प्रभावित किया, अपितु चिन्तन-दृष्टि को आस्था के बरअक्स ज्ञान, विवेक और तर्क से चुनौती देने की हरसंभव चेष्टा की। दरअसल, भक्ति-युग ने आरंभ से ही भारतीयता को नए अर्थ-सन्दर्भ, रूप-आकार, स्थापत्य-संस्कृति, कला-साहित्य आदि दृष्टियों से संवाद-विमर्श हेतु आमंत्रित किया है। उसने संचार की नई वैचारिकी खोजे जिसमें रसास्वदन का एकरेखीय प्रारूप नहीं दिखाई देता है। उसमें जो गौरतलब पहलू है वह है-मानवीय सत्ता एवं भूगोल की वास्तविकता में खोज। संत-परम्परा से जुड़े संतों के यहाँ उपदेशक-शैली नहीं है, अपितु उनके कहन में जनचेतना का हुंकार है। समसामयिक गतिरोध के प्रति सीधा और आक्रामक प्रतिरोध है। वहाँ कहा गया सबकुछ प्रत्यक्ष, प्रामाणिक और सत्तावान है; आँखन की देखी है। नवजागरण का स्थूल-सूक्ष्म सन्दर्भ लें, तो विद्वानों के मुताबिक-अठारहवीं सदी के दौरान यूरोप (मुख्यतः फ्रांस) में चले वैचारिक आन्दोलन को ज्ञानोदय (एनलाइटमेंट) के नाम से जाना जाता है। इस आन्दोलन ने जिन प्रवृत्तियों को जन्म दिया उन्हें हम आधुनिकता या आधुनिकतावाद के नाम से जानते हैं। समता और न्याय की धारणाओं के प्रचलन का श्रेय भी इसी आन्दोलन को दिया जाता है। मोटे तौर पर इसे अंधविश्वास पर विज्ञान की और आस्था पर विवेक की विजय के नाम से जाना जाता है। ज्ञानोदय के विचारक मानते थे कि तर्कबुद्धि के जरिए सामाजिक, बौद्धिक और वैज्ञानिक समस्याओं का हल किया जा सकता है। वे परम्परा और संस्थागत धर्म के ‘प्रतिगामी’ प्रभाव की कठोर आलोचना करते थे।…उन्नीसवीं सदी के राजनीतिक-सामाजिक प्रयोगों ने ज्ञानोदय के वैचारिक वर्चस्व को मजबूत किया और धीरे-धीरे ज्ञान का एक नया सिद्धान्त प्रकाश में आया। इतिहास का महत्त्व, प्रगति और विकास की अपरिहार्यता, सेकुलरवाद और राष्ट्रवाद का विचार भी इसी ज्ञानमीमांसा की देन है। आधुनिक राजनीति की समस्त वैचारिक और व्यावहारिक गोलबंदी इन्हीं धारणाओं के आस-पास हुई है। विचार के क्षेत्र में फ्रेंकफुर्त स्कूल के चिंतकों ने ज्ञानोदय के अंतर्निहित द्वंद्व को सामने ला कर आधुनिकता की आलोचना के द्वार खोले।

भारत में इससे पहले ही गाँधी ने हिंद स्वराज लिख कर एशिया की तरफ से आधुनिकता की आलोचना की शुरुआत कर दी थी। पिछले तीन दशकों से ‘छोटी पहचानों की बगावत’, ‘समुदाय की वापसी’ और ‘बहुसंस्कृतिवाद’ की परिघटनाओं ने ज्ञानोदय के वर्चस्व को कड़ी चुनौती दी है। जैसे-स्त्रीयता से सम्बन्धित विमर्श, अश्वेत, दलित, पर्यावरणवादी और अन्य विद्रोही विमर्श।‘ ध्यातव्य है कि इन सबके केन्द्र में प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष ढंग से संचार और भाषा के अंतःसम्बन्ध शामिल हैं जिन्होंने पिछले समय-काल में जरूरी विमर्श खड़े किए है, जनमूल्य आधारित जनान्दोलन को जन्म दिया है; लोक-संवृत्ति के दायरे में एक समांतर किन्तु अधिक प्रभावशाली वैचारिक-संस्कृति को खड़ा किया है। प्रतिरोध के स्वर इस 21वीं सदी में बुलंद हो चले हैं, तो इसमें नवीन संचार साधन एवं माध्यम आधारित भाषा का योगदान प्रमुख है। परिणामस्वरूप हाशिए पर ढकेली गई प्रतिभाएँ विशेषकर स्त्रियाँ अब केन्द्र की चूलें कस रही हैं, लोकतंत्र की बाँह पकड़ उन्हें जाग्रत कर रही हैं। विवेकी जन जाति-विशेष की पाँव पूजने जैसे पाखंड को खारिज़ कर रहे हैं। ज़मीन-जायदाद अथवा इफ़रात दौलत होने मात्र की वजह से किसी को अपना नेता मान लेने को अब अधिसंख्य भारतीय तैयार नहीं हैं। इसी तरह विदेशी सरज़मी पर शिक्षा ग्रहण कर स्वदेश लौटे राजनीतिक बेटे-बेटियों को वह आँख मूँदकर चुनाव जिताने के पक्षधर नहीं हैं।

लोकतंत्र आधारित संसदीय राजनीति में अब तक निर्बाध जारी रहे कुप्रथाओं, कुरीतियों, कुप्रचारों, कुविचारों, कुतर्कों आदि को विशेषकर ‘युवा भारत (यंग इंडिया) ने नकार दिया है। देश की युवा-आबादी अपने हक़-हकूक पर दूसरे की दखल और पाबंदी को परे धकेल स्वयं इस दिशा में आगे बढ़ रही है। लिहाजतन, कुल, घराना, वंश, खानदान आदि चोचलों और रिवाजों को इस उत्तर शती में भारी चुनौती मिल रही है। समानता, स्वतन्त्रता और न्याय की पाठ पढ़ी यह नई पीढ़ी है जो गरीबी, लाचारी, बेबसी,अभाव आदि में घुट-घुटकर जीने और कुछ न कहने की पुरानवादियों के संस्कार को तोड़ रही है। नई पीढ़ी अधीर और जल्दबाज नहीं है। वह अमीरी में पले-बढ़े लाडलों की तरह अति-महत्त्वाकांक्षी भी नहीं है। वह सच के लिए सचमुच लड़ने-भिड़ने का मादा रखने वाली पीढ़ी है। वह योग्य और काबिल है, इसलिए वह हाशिए पर रहने को तैयार नहीं है। वस्तुतः यह युवा पीढ़ी विवेकसम्मत तरीके से अपनी मानसिकता, जागरूकता, हस्तक्षेप, विरोध, एकजुटता आदि को प्रदर्शित करना चाहती है। वह यह बात भली-भाँति जान चुकी है कि राष्ट्र के समक्ष असली समस्या राजनीतिक-वृत्ति में आया गिरावट और उनके नैतिक-बोध में हुआ विघटन है। राजनीतिक दलों में छाया ‘वीआईपीवाद’ भी एक प्रमुख कारण है जिसने उनको धनलोलुप और भ्रष्ट-व्यक्ति बनाया है। ज़मीनी सहयोग-समर्थन नहीं होने के कारण वर्तमान राजनीति मिट्टी का वह लोंदा है जिसकी उर्वरा-शक्ति गायब है। ऐसी राजनीति का निहितार्थ जन-कल्याण और राष्ट्रहित का न होकर स्वयं का स्वार्थपूर्ति करना मात्र है। यह बात काफी पहले से उठती रही है कि राजनीतिक दलों में ‘वन मैन शो’ का चलन किसी व्यक्ति-विशेष के पहल, प्रभाव और परिचय को मान्यता देना है न कि सत्ता का विकेन्द्रीकरण या कि अधिकारों का जनतांत्रिकरण करना है।

स्पष्टतया संचार और भाषा से जुड़ी नव-आर्थिक अंतःसम्बन्ध इन सबके मूल में है। यह और बात है, अब समय पलटा है। अयोग्यता को वे काबिल लोग सीधी चुनौती देने लगे हैं, जो केन्द्र से बाहर थे, हाशिए पर थे या कि बाहैसियत अनुपस्थित थे। परिवर्तन के इस ज्वार से ऐसी हड़कम्प मची है कि आरक्षण को भला-बुरा कहने वालों की फौज बढ़ती जा रही है। आजकल सरकारी नौकरियों विशेषकर ‘क्लास वन’ की नौकरियों में नियुक्तियाँ धांधलीपूर्वक की जाती है। इस क्षेत्र में महारती और घोर जातिवादी लोग आरक्षण पर अपना बल कूटने के लिए अधिकतम योग्य को बाहर का रास्ता दिखाते हैं, वहीं न्यूनतम योग्य उम्मीदवार को नौकरी देने की प्रस्तावना रखते हैं। उसे अपना आजीवन कृपापात्र बने रहने के लिए मजबूर करते हैं। यह सांकेतिक षड़यंत्र है जिसके प्रतीकों, संकेतार्थों, अभिव्यंजनाओं को पढ़ने-जानने के लिए भाषा और संचार के नए विधान खोजने होंगे; मनोभाषिकी में घुसे बहु-तमाशी अभिनयों बहु-व्यापी ठिकानों को जाँचना-परखना होगा। टीवी शो की रियलिटी को हक़ीकत मानने की बजाय अपने चेहरे को पढ़ना जरूरी हो चला है। फेसबुक-व्हाट्स-अप आदि की दुनिया से युवा विरत भले न हो लेकिन इसे अपने लिए विद्रोह-मंच मान बैठना भयंकर भूल होगी। बीसवीं सदी के आखिरी दशक तक का भारत कुछ और था, लेकिन आज कुछ और है। अपने गैजेट्स में नधाये तथाकथित उत्तर-आधुनिक युवा की बात छोड़ दें, तो आधुनिक ज्ञान-मीमांसा आधारित संकल्पनाएँ ज्ञानोदय का सर्वसमावेशी तथा सार्वभौमिक मंच तैयार करने में जुटी हैं। लोकवृत (पब्लिक स्फियर) इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। समाजविज्ञानियों के अनुसार, समाजशास्त्र में नागरिक समाज के एक ऐसे दायरे की चर्चा भी है जिसमें संस्कृति और समुदाय की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ अन्योन्यक्रिया करती हैं। साथ ही, सार्वजनिक दायरे की गतिविधियाँ किसी मुद्दे पर आम राय बनाने और उसके जरिए राज्य-तंत्र को प्रभावित करने की भूमिका निभाती हैं। सार्वजनिक दायरा सबके लिए खुला रहता है जिसमें अपने विमर्श के जरिए कोई भी हस्तक्षेप कर सकता है। फ्रैंकफुर्त स्कूल के विख्यात विचारक युरगन हैबरमास ने इस धारणा का प्रतिपादन किया था; जिसका भारत की हिन्दीपट्टी तक दृढ़ विस्तार हुआ है। इस बाबत फ्रांचिस्का आॅरसेनी लिखित पुस्तक ‘हिन्दी का लोकवृत्त’ द्रष्टव्य है।

अतएव, संचार के बदलते सामाजिक-दायरे और उसमें प्रचलित भाषा के बोल-बच्चन को सावधानीपूर्वक समझने की जरूरत है। राजनीति ही नहीं अपनी पीढ़ी को भी इस बात का यथोचित ख़्याल रखना होगा। युवाओं को आज न कल यह समझना ही होगा कि नई पीढ़ी जिसके बारे में कहे-सुने अधिक जाते हैं पर किया-धरा सबसे कम जाता है; को एकजुट होने की आवश्यकता आन पड़ी है। उसके पास एक ही विकल्प है, वह अपने लिए लड़े किन्तु सबको साथ लेकर लड़े। वह दुनिया बदल जाने की कामना ही न करे अपितु दुनिया को बदलने के लिए औजार (टुल्स) भी खोजे। अपना नेता और नेतृत्व की तलाश करने वाले ऐसे युवाओं को चे-ग्वेरा के पोस्टर और भगत सिंह के साफ़े की जरूरत नहीं है। बस उसे यह याद रहे कि वह चाहे जिनसे भी बोले, जब भी बोले; जिस माध्यम से भी बोले, जो भी बोले, जिस भी भाषा में बोले, उसे उस भाषा के शब्दार्थ और संचार-शक्ति से वाक़िफ रहकर ही बोलना होगा। अन्यथा हमारे कहन और प्रस्तुति का मजाक बन जाना तय है। दरअसल, संचार-माध्यमों की अतिशय गति और तीव्रता ने भाषा के समक्ष सम्प्रेषण के जबर्दस्त संकट पैदा कर दिए हैं। प्रतिरोध को पैदा करने वाली शक्तियाँ भी भाषा में प्रकट हैं, तो उन्हें मटियामेट करने वाली ताकतें भी उसी भाषा में लड़ने-भिड़ने को तैयार बैठी हैं। ‘अप्प दीपो भवः’ की इस धरती पर युवा होने के नाते यह महती जिम्मेदारी हमारी है, हम सबकी है।

-राजीव रंजन प्रसाद

सहायक प्रोफेसर, हिन्दी विभाग

राजीव गाँधी विश्वविद्यालय

अरुणाचल प्रदेश-791 112

rrprgu@gmail.com

9436848281

 

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