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देशमुद्दा

सत्ता से मुठभेड़ करती पत्रकारिता की जरूरत

 

  • वीरेन नंदा

 

पत्रकारिता के पौराणिक आख्यान में सर्वप्रथम नारद मुनि की चर्चा मिलती है। उस अनुसार प्रथम पत्रकार के रूप में इन्हें भारत का प्रथम संचार वाहक माना जा सकता है। प्राचीन ग्रंथों में नारद मुनि के लिए ‘पिशुन’ शब्द आया है जिसका अर्थ ‘सूचना देने वाला’ बताया गया। देवताओं की नगरी के वे पहले पत्रकार थे। एक की खबर दूसरों तक पहुँचाने वाले आरंभिक भेदी पत्रकार! समाचार वाचक! संचारक! जिसके बल पर देवताओं के बीच अत्यंत लोकप्रिय हुए। देवता-गण दूसरे के मन की बात जानने के लिए नारद मुनि पर ही आश्रित थे। उनके एक दिन प्रकट नहीं होने पर सभी बेचैन हो जाते। खबरों का पता ही नहीं चल पाता। एक तरह से नारद मुनि खबरीलाल थे जो ‘सब की खबर ले, सब को खबर दे’ ते फिरते। किन्तु इन्होंने न कभी झूठी, एकपक्षीय या मनगढ़ंत खबरें फैलाई और न ही किसी  की चाटुकारिता की। वे स्पॉट रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकार थें न कि टेबल पर बैठ आज की तरह रिपोर्टिंग करने वाले! सदा उन्होंने लोकहित में पत्रकारिता की, न कि आज की तरह ‘लोभहित’ में।

रामायण-काल के एक प्रमुख किरदार पवन-पुत्र ‘हनुमान’ को सबसे विश्वस्त, खोजी, प्रबल, प्रबुद्ध और लोकप्रिय पत्रकार के रूप में देखा जा सकता है, जिन्होंने सीता की खोज कर राम का संदेश पहुंचाया। जड़ी-बूटी खोज में पर्वत ही उठा लायें। कई और महत्वपूर्ण समाचार लाने-पहुंचाने का कार्य किया। लोभ-लालच से परे उन्होंने साहसिक पत्रकारिता की मिसाल कायम की। आज के इस गर्हित पत्रकारिता के दौर में वैसी खोजी दृष्टि और साहसिकता लगभग लुप्त हो चुकी है।

महाभारतकालीन संजय ने कौरव-पांडव युद्ध का लाइव टेलीकास्ट धृतराष्ट्र को दिखलाते हुए एंकर जैसी निष्पक्ष भूमिका अदा की, बिना किसी मिलावट या छौंक छाँक के और धृतराष्ट्र के सवालों पर बेलाग टिप्पणी भी! न कि आज के लाइव टेलीकास्ट के नाम पर कट पेस्ट, फोटोशॉप और नफरत फैलाते हुए चिंघाड़ने वाले एंकरों की तरह झूठ का रायता फैलाया। पत्रकारिता के इसी मिथकीय और पौराणिक आख्यान ने हमें एक दृष्टि सौंपी, जिसके बल पर ही पत्रकारिता की शुरुआत हुई।

प्रामाणिक पत्रकारिता की ऐतिहासिक शुरुआत रोम से हुई, जहाँ पहला अखबार 131 ई. पूर्व निकला, जिसका नाम- “एक्टा डियूरण” (अर्थात दैनिक घटनायें) था। इसे जूलियस सीजर ने आरंभ किया था। यह अखबार धातू और पत्थरों पर समाचार उकेर कर रोम के भिन्न स्थानों पर आम जनता के लिए रखा जाता था। मध्यकाल में कारोबारियों का एक “सूचना-पत्र” भी इसी रूप में निकलता था।

चीन के शहंशाह ‘होती’ के समय एक व्यक्ति ‘ त्साई लून ‘ ने सन 105 में कागज की खोज की। इसी के बाद कागज पर लिखने का चलन शुरू हुआ। सन 618 ई. में चीन से “पेकिंग गजट” प्रकाशित होने लगा किन्तु “चिंग पाओ” को वहां का पहला अखबार माना जाता हैं। यूरोप में 1566 ई. में दीवार पोस्टर के रूप में अख़बार की शुरुआत हुई। यह इटली के वेनिस में शुरू हुई थी जिसे “नोटिज स्क्रिप्ट” कहा गया। लेकिन दुनिया का पहला अखबार फ्रांस के स्ट्रेसवर्ग से 1605 ई. में निकलने वाला “रिलेशन” था, जिसे जॉन कैरोलस ने प्रकाशित किया था। सन 1621 ई. में लंदन से “कोरेण्टो”, 1628 ई. में “बेस्ट मिनस्टर” और 1655 ई. में “ऑक्सफोर्ड गजट” नामक अखबार प्रकाशित हुआ। ऑक्सफोर्ड गजट के चौबीस अंक छपने के बाद 11 मार्च 1702 ई. में यह “लंदन गजट” नाम से छपने लगा। मुगल सल्तनत औरंगजेब के समय भी अखबार निकलने के प्रमाण मिलते हैं, किन्तु उसमें शहंशाह के फैसले, आदेश, दौरे और उनकी दिनचर्या की ही खबरें होती थी।

यह आश्चर्यजनक है कि भारत में सर्वप्रथम पत्रकारिता की शुरुआत ईस्ट इंडिया कम्पनी के भ्रष्टाचार और शोषण के विरुद्ध हुई थी और वह भी अंग्रेज कर्मचारी द्वारा ! विलियम वोल्ट्स वह पहला अंग्रेज सख्स था जिसने ईस्ट इंडिया कम्पनी के विरोध में अखबार निकालने की सोची। वोल्ट्स ने जब देखा कि कम्पनी में भ्रष्टाचार करने वाले अधिकारी न केवल उनका व्यक्तिगत शोषण कर रहे हैं बल्कि उन्हें दबा कर भी रखना चाहते हैं तो उसने कम्पनी से 1768 ई. में त्यागपत्र देकर एक अखबार निकालने की मंशा जाहिर करते एक सूचना जारी की – “मेरे पास ऐसी बहुत सी बातें हैं जो मुझे कहना है और जिनका संबंध हर व्यक्ति से है।” इस बात की खबर लगते ही कम्पनी ने विलियम वोल्ट्स का बोरिया-बिस्तर बंधवा कर उसे वापस भेज दिया गया। विलियम की मंशा धरी की धरी रह गई, जिसे अपनी किताब “कंसीडरेशन ऑन इन्डियन अफेयर्स-1772” में अंग्रेजों की खबर लेते हुए उनकी नीतियों की धज्जियाँ उड़ाते कहा – “एक व्यक्ति के सिर्फ अखबार निकालने की मंशा जाहिर कर देने भर से उसे भारत से रुखसत कर दिया जाता है।”

बंगाल गजट अख़बार

वोल्ट्स के बाद इस महाद्वीप में पत्रकारिता की नींव रखने का श्रेय ईस्ट इंडिया में काम करने वाले एक अंग्रेज मुलाजिम जेम्स अगस्टस हिकी को जाता है। यह अखबार निकालने की भारत में दूसरी घटना थी और वह भी ईस्ट इंडिया कम्पनी के ही शोषण और भ्रष्टाचार के विरूद्ध, जिसने भारत में पत्रकारिता की नींव रखी। जेम्स अगस्टस हिकी ने विलियम वोल्ट्स की मंशा को जमीनी हकीकत बख्सी। हिकी ने भी विलियम वोल्ट्स की तरह कम्पनी से त्याग पत्र देकर 2000 का कर्ज लिया और सन 1778 ई. में एक प्रेस की स्थापना कर 29 जनवरी 1780 को “बंगाल गजट” की शुरुआत की। इसमें कम्पनी के विरुद्ध ढेरों समाचार छपने लगे। चार पेजी इस अखबार में वारेन हेस्टिंग्ज और ईस्ट इंडिया कंपनी के कई आलाधिकारियों के भ्रष्टाचार, अत्याचार और उनकी निजी जिंदगी का भंडाफोड़ होने लगा। अगस्टस हिकी ने हेस्टिंग्स की पत्नी और मुख्य न्यायाधीश एलिज झम्पी की निजी जिंदगी पर भी कुठाराघात किया जिसके कारण उसे मानहानि, जुर्माना और जेल जाना पड़ा।

हिकी ने अपने पहले ही अंक में इस अखबार के उद्देश्य की चर्चा करते स्पष्ट रूप से उल्लेख किया  – “यह एक राजनीतिक और वाणिज्यिक साप्ताहिक है जो सभी दलों के लिए है परन्तु किसी के प्रभाव में नहीं।” हिकी की इस दुस्साहसिकता को रोकने की हर संभव कोशिश की गई किन्तु उसके प्रहार रुके नहीं। तब वायसराय वारेन हेस्टिंग्स ने उस पर मुकदमा कर जुर्माना लगाया किन्तु हिकी इससे डरने वाले कहाँ थे! वे न झुकने को तैयार हुए और न ही अपना रास्ता बदला। तब वारेन हेस्टिंग्ज द्वारा हिकी के समाचारों को निजी आक्षेप, कलंकित और शांति भंग करने वाला बताकर उसे बन्द कर दिया और उनके द्वारा लिया गया कर्ज न चुका पाने के एवज जेल में कैद कर दिया। इस तरह यह अखबार 16 मार्च 1782 ई. को करीब दो साल चलने के बाद बन्द हो गया। ‘संपादक के नाम पत्र’  स्तंभ के जनक जेम्स अगस्टस हिकी ही थे। हिकी एक ऐसे निर्भिक पत्रकार थे जो ईस्ट इंडिया कम्पनी के सम्मुख कभी झुके नहीं ! जिसका परिणाम तंगहाली के कारण इसे कम समय में ही जमींदोज़ हो जाना पड़ा। उन्हें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यवस्था से टकराने की कीमत चुकानी पड़ी। यह पत्रकारिता के इतिहास में शासन और अखबार की देश में पहली मुठभेड़ थी। आज फिर जेम्स अगस्टस हिकी जैसे पत्रकार की जरूरत है जो सत्ता से मुठभेड़ कर सके।

भारतीय प्रेस के पितामह कहे जाने वाले जेम्स अगस्टस हिकी दुनिया भर में पत्रकारों के बीच आज भी प्रेरणास्रोत हैं, लेकिन भारत में पत्रकारिता की दयनीय स्थिति जो चारो ओर दिखाई दे रही उससे हॉकी की आत्मा तार-तार हो चुकी है। नारद भी यह सब देख नारायण नारायण का जाप करते विचलित होंगे। भड़भड़ा कर गिरे इस चौथे खंभे को पुनः खड़ा करने के लिए हम सभी को एकजुट हो खड़े होने की जरूरत है।

लेखक वरिष्ठ कवि और संस्कृतिकर्मी हैं|

संपर्क- +919835238170,

 

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