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संस्कृति के उन्माद का समय

सुनीता गुप्ता

संस्कृति के जिस राजनीतिकरण के दौर से आज हम गुजर रहे हैं वह एक भयानक परिदृश्य निर्मित कर रहा है। संस्कृति उच्चतर मानवीय मूल्यों का समुच्चय होती है जो साहित्य और कलाओं में न केवल प्रतिभाषित  होती है बल्कि उन्हीं से धार भी पाती है और वहीं संरक्षित भी होती है। इसे सभ्यता की आंख कहा जा सकता है जिसके बिना सभ्यता अंधी हो जाती है और बर्बरता के तत्व वहां प्रश्रय पाने लगते हैं। सभ्यता के जिस दौर से आज हम गुजर रहे हैं वहां संस्कृति का विलोपन एक ऐसे ही बर्बर युग की ओर ले जा रहा है। संस्कृति के विलोपन से अधिक दुर्भाग्यपूर्ण है संस्कृति के उपादानों का दुरुपयोग। उपभोक्तावाद का यह चरम रूप है जो एक एक कर वस्तुओं, व्यक्ति के साथ  मनुष्य के विचार और भावना तक को अपनी गिरफ्त में ले चुका है। यह समय पूंजी और राजनीति के गठजोड़ का है। राजनीति ने पूंजी के सम्मुख घुटने टेक दिये हैं। राजनीति का न तो अब विचारों से नाता रह गया है और न नीति से और न ही मूल्य से। इसका सीधा और एकमात्र लक्ष्य अधिक से अधिक पूंजी एकत्र करना है क्योंकि इस पूंजी के बल पर ही वह लोकतंत्र के खेल में अपनी जीत सुनिश्चित कर सकता है और अपना वर्चस्व बनाये रख सकता है। पूंजी को भी अपनी सत्ता बनाये रखने के लिए राजनीति का साथ चाहिए। पूंजी और राजनीति के इस मेल और खेल ने दूसरी सारी चीजों को हाशिये पर डाल दिया है। इस अभियान में उसका अगला शिकार संस्कृति है। संस्कृति जो अब तक क्रय विक्रय से परे थी, उसे भी आज बाजार की चीज बना दिया गया है और बड़े सुनियोजित तरीके से उसका राजनीतिकरण हो रहा है। यह संस्कृति के बाजारीकरण और राजनीतिकरण का बड़ा वीभत्स दौर है। यह अनायास नहीं है कि संस्कृति के नए नये तत्व तलाशे जा रहे हैं, और उस नाम पर बाजार चल रहे हैं। पर्व-त्यौहार जीवन से अधिक बाजार के उत्सव हो गए हैं। बाजार को चलाने के लिए इस तरह के नये  पर्व जीवन में जोड़े जा रहे हैं। दूसरी तरफ राजनीति का छद्म है जो संस्कृति के नये  नाम तलाश कर अपने को परंपरा के संरक्षक के रूप में प्रस्तुत कर रही है। सवाल यह है कि ये चीजें संस्कृति को कितना समृद्ध कर रही हैं?

बाजारीकरण और बाजार में फर्क होता है। बाजार का सम्बन्ध  जरूरतों से होता है। यह समाजीकरण का भी एक रूप होता है जहां व्यक्तियों के एक दूसरे पर अवलंबन से समाज का स्वस्थ और स्वाभाविक विकास होता है। इसीलिए बाजार सभ्यता का पहला सोपान भी रहा है। पर बाजारीकरण का सम्बन्ध  लोभ से है और इसका एकमात्र लक्ष्य मुनाफा कमाना होता है और इसके लिए दिखावा और चकाचौंध  जरूरी हो जाता है। चकाचौंध रोशनी का वह अतिरेक है जो आंखों को अंधा कर देता है। आंखों को अंधा करने वाले इस चकाचौंध का इस्तेमाल बाजार भी कर रहा है और राजनीति भी।

विगत कुछ वर्षों में संस्कृति और परंपरा के प्रति लोगों का अनुराग अचानक बढ़ गया है। कहने की आवश्यकता नहीं कि अपने स्वरूप में यह पुनरुत्थानवादी है। इसे देशप्रेम से जोड़कर उन्माद की सीमा तक पहुंचा दिया गया है। धनोपार्जन का कौशल सीखाने वाली नयी शिक्षण पद्वति से समाज और जीवन का संबंध छूट गया है। यही कारण है कि एक ऐसी पीढ़ी सामने आ रही है, जिसके पास अपने देश और समाज की सही समझ तो है ही नहीं, संस्कृति तो बहुत दूर की बात है। इनके लिए संस्कृति कुछ नामों का पर्याय भर है। वह कितनी परंपरा के पक्ष में है और कितनी उसके प्रतिपक्ष में – यह जानने समझने की फुरसत और चाहत किसी में नहीं है। भारतीय संस्कृति कितनी ही परंपराओं का विराट समन्वय है। रवीन्द्रनाथ ने यूं ही इसे ‘महामानवसमुद्र’ नहीं कहा है। हजारी प्रसाद लिखते हैं, ‘‘जिसे हम हिंदू रीति नीति कहते हैं, वह अनेक आर्य और आर्येतर उपादानों का अद्भुत मिश्रण है। एक एक पशु, एक एक पक्षी न जाने कितनी स्मृतियों का सार लेकर हमारे सामने उपस्थित है।’’ चंडीदास जब गाते हैं ‘शबार ऊपरे मानुष सत्य’ तो यह अचानक नहीं है – इसके पीछे दक्षिण के आलवार संतों से होती हुई समूचे भारतवर्ष में भक्ति आंदोलन के रूप में फैलने वाली एक समूची परंपरा है। गांधी ने जिस रामराज्य का स्वप्न देखा था, वह कोई धार्मिक राज्य नहीं था, उसमें ‘पीर पराई जानि रे’ का भाव शामिल था। यह इसी समावेशी संस्कारों का प्रतिफल था कि पश्चिमी देश आश्चर्य से देखते रह गए पर हम एक राष्ट्र के रूप में अपने आपको स्थापित करने में सफल रहे। हमारे संविधान की धर्मनिरपेक्षता कोई आकाश से टपकी हुई चीज नहीं है – इसमें बुद्व की अहिंसा, नामदेव की निष्ठा, विवेकानंद का सर्वधर्म समभाव और गांधी का मानवतावाद भी शामिल है। पर आज जिस संस्कृति का शोर मचाया जा रहा है, इसमें परंपरा का कोई तत्व नहीं है। इसकी धार उल्टी दिशा में प्रवाहित है। इस परंपरा में ज्ञान की अवहेलना है – ज्ञान के नाम पर पाखंड है, हिंसा का तांडव है, अलगाव की वैचारिकता है। कहां है इसमें चंडीदास के शबार ऊपरे मानुष सत्य का तत्व, कुंभनदास का ‘संतन कहां सीकरी सो काम’ की सत्ता निरपेक्ष दृष्टि, तुलसी की ‘मांग के खाइबो, मसीद में सोइबो’ वाली अक्खड़ता, कबीर का ‘मोको कहां ढूंढे रे बंदे…’ की धर्मनिरपेक्ष दृष्टि, प्रसाद की ‘अरुण यह मधुमय देश हमारा’ की उदात्त राष्ट्रीय चेतना? इनसब को विस्मृत कर एक नयी परंपरा गढ़ी जा रही है इतिहास की, नयी अतार्किक व्याख्याओं के साथ। क्या यही है हमारा इतिहास बोध, हमारा संस्कृति प्रेम? जो राम ‘तजु बाप को राज बटाउ की नाई’ की निस्पृहता से चल पड़े थे वन की ओर, आज वे ही सत्ता प्रप्ति का साधन बन गये हैं। और इसे संस्कृति का संरक्षण माना जा रहा है। ज्ञान की समृद्ध परंपरा के परे अज्ञान और झूठ का महाजाल रचा जा रहा है, संस्कृति को मनुष्य का आखेटक बनाया जा रहा है और      कहा जा रहा है कि हम परंपरा की रक्षा कर रहे हैं।

वस्तुतः यह संस्कृति के उन्माद का समय है। यह मूल्यविहीन राजनीति और लोलुप बाजार का सबसे निर्मम प्रहार है। यदि अब भी इसे नहीं समझा गया तो कुछ भी नहीं बचेगा हमारे पास परंपरा के नाम पर।

  बिहार विश्वविद्यालय के एक महाविद्यालय में सह प्राध्यापक सुनीता गुप्ता आलोचना और कथा लेखन में सक्रिय हैं|

 

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