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अंतरराष्ट्रीयचर्चा में

बहादुर महिला- ज़िंदाबाद!!

जूली एनी जेंटर—जी हाँ, यही नाम है।
आखिर इन्होंने क्या बहादुरी की?
क्या पर्वत चढ़ गयीं?
शेर से भिड़ गयीं?
बहादुरी का कौन-सा कारनामा कर दिखाया?

क्या यही सब बहादुरी के करतब हैं, और कोई काम उस परिभाषा में नहीं आता?

जूली एनी जेंटर न्यूज़ीलैंड में मंत्री हैं। वे माँ बनने वाली थीं। उन्होंने मंत्रीपद से तीन महीने की छुट्टी ली। अपनी साइकिल उठायी। और खुद साइकिल चलाकर अस्पताल गयीं। दाख़िल हुईं और एक स्वस्थ-सुंदर संतान की माँ बनी। क्या इसे साधारण काम मान लिया जायगा?

जेंटर ग्रीन पार्टी की सांसद हैं। ग्रीन पार्टी यूरोप के बड़े हिस्से में वैकल्पिक राजनीति लेकर उभरी है। पहले पूँजीवादी पार्टियाँ ही नहीं, वामपंथी पार्टियाँ भी ग्रीन पार्टी का विरोध करती थीं। ग्रीन पार्टी भी कोई इन सबके प्रति अच्छा रुख नहीं अपनाती थी। समय के साथ यह स्पष्ट हुआ कि ग्रीन पार्टी पर्यावरण के जिन सवालों से प्रेरित होकर राजनीति की धारा मोड़ना चाहती है, वे सभी सवाल विकास के पूँजीवादी ढाँचे की देन हैं। नतीजा, वामपक्ष और ग्रीन पार्टी की दूरियाँ कम हुईं। अब पश्चिमी यूरोप के अनेक देशों में वामपक्ष के साथ उसका मोर्चा है।

अपने ही देश में देखें, पॉलिथिन के प्रयोग से कितना नुक़सान होता है। लोगों के पॉलिथिन प्रयोग पर सरकार और अदालतें आये गिन पाबंदी लगाती हैं। लेकिन बड़े औद्योगिक घरानों पर पॉलिथिन-प्रयोग पर रोक लगाने की कोशिश नहीं होती। इसलिए सारे आदेशों के बावजूद पॉलिथिन बदसतूर चल रही है। नदियों-नालों-पहाड़ों की साँस पॉलिथिन कि जमघट से घुट रही है। विनाश के कई दृश्यों में पॉलिथिन के ढेर दिखायी देते हैं।

इसी प्रकार, गंगा-सफ़ाई का मामला है। अरबों रुपये स्वाहा हो गये। गंगा साफ नहीं हुई। क्यों? क्योंकि शहरों के गंदे नाले और पनाले सीधे गंगा में गिरते हैं। हर शहर के भीतर जितने उद्योग हैं, उनका कचरा जगह-जगहों पनालों में मिलता चलता है। किसी सरकार की हिम्मत नहीं हुई कि इतना कचरा गंगा में डालने से उद्योगपतियों को रोके। कोई ग़रीब आदमी तो उद्योगपति है नहीं। अकबर से औरंगज़ेब तक मुग़ल बादशाहों ने नगर की गंदगी गंगा में डालने पर प्राणदंड का विधान किया था। यह विराट प्रदूषण अभियान अंग्रेज़राज में शुरू हुआ।

हमारी सरकारें अंग्रेज़ों की नीति पर चल रही हैं। आजकल मुग़लों को इतिहास का खलनायक बनाने की राजनीति ज़ोरों पर है। ऐसे में अंग्रेज़ों की नक़ल और ज़रूरी हो जाती है। अंग्रेज़ों ने अपने देश की नदियों की यह दुर्गति नहीं की। भारत उनका देश नहीं था, वह उपनिवेश था। मुग़लों के लिए भारत उनका अपना देश था। दोनों की पर्यावरण नीति का अंतर इसी कारण था। गंगा की जो दुर्गति हुई है, वही सब नदियों की हुई है।

पर्यावरण आंदोलन ने यूरोप में जब यह समझा कि वायु-प्रदूषण से जल-प्रदूषण तक पर्यावरण विनाश का मुख्य कारण पूँजीवादी लूट-खसोट है, तब उसका रुख बदला। पूँजीपतियों का ध्यान केवल मुनाफ़े पर रहता है, जिसके लिए “ख़र्च में कटौती” के दो सरल उपाय हैं—मज़दूरों का वेतन कम करो और कचरे का शोधन करने पर पैसा ख़र्च न करो! यह बात कोई भी सच्चा पर्यावरणवादी आसानी से समझ सकता है। तब वह पूँजी से अधिक महत्व श्रम को देना शुरू करेगा। प्राथमिक है श्रम, पूँजी उसकी सहायक है।

यह बास समझ में आने पर यूरोप के अनेक देशों में ग्रीन पार्टियाँ वामपंथ के साथ आयीं। हमारे नेताओं की अपेक्षा उनमें कथनी और करनी का अंतर कम है। इसलिए वे राजनीति के उच्च पदों पर जाकर भी श्रम के प्रति अवज्ञा का भाव नहीं अपनाते। जूली जेंटर का उदाहरण इसी बात की पुष्टि करता है। मंत्री के रूप में सारी सुविधाएँ उपलब्ध होते हुए उन्होंने गर्भावस्था की पूरी अवधि में शारीरिक-मानसिक परिश्रम जारी रखा और अंत समय स्वयं साइकिल चलाकर अस्पताल जाने का निर्णय लिया। इसके लिए हमारे नेताओं की तरह झाड़ू पकड़कर फ़ोटो खिंचवाने का इंतज़ामपहले से नहीं किया। ऐसे दृश्य भारतवासी पिछले पचास से देखते आये हैं, जिनमें इधर वृद्धि हुई है। जूली जेंटर की पहली तस्वीर और पहला समाचार तब देखने को मिला जब अस्पताल से आकर वे पति के साथ तस्वीर के लिए उपलब्ध हुईं।

हम जानते हैं कि श्रम करते रहने पर दत्ता-बच्चा दोनों स्वस्थ रहते हैं। कारण, हम प्रकृति केजितने निकट रहेंगे, उतने ही तन-मन से स्वस्थ रहेंगे। पूँजी इसमें सहायक हो, हावी न हो, यह देखना सरकार का काम है। यह तभी संभव है जब सरकार पूँजी के दबाव में न हो।

-अजय तिवारी

लेखक वरिष्ठ आलोचक हैं.

Mob- 97171 70693

Email- tiwari.ajay.du@gmail.com

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