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एनआरसी के सियासी मायने

 

  • डॉ॰ अनिल कुमार राय  

 

असम में National Register of Citizens तैयार हो गया है और उसमें 19 लाख से अधिक (19,06,657) लोग घुसपैठिया करार दिये गए हैं। कागजी तौर पर यह माना गया है कि इसमें 1971 के बाद आए लोग घुसपैठिया हैं। जैसी कि खबरें हैं, इस सूची से बड़ी संख्या में वे लोग भी बाहर हैं, जो लम्बे समय से यहाँ रह रहे हैं और सेना और प्रशासन में लम्बी नौकरी करके रिटायर हुए हैं। बहुत सारी गड़बड़ियाँ भी बताई जा रही हैं, जैसे बेटे का नाम है, लेकिन पिता का नाम नहीं है या एक भाई का नाम है, दूसरे का नाम नहीं है आदि-आदि। कहने का मतलब यह कि इस सूची में शामिल नामों की प्रामाणिकता पर गहरे प्रश्नचिह्न हैं। इन त्रुटियों का निवारण अभी लम्बे समय तक चलता रहेगा।

यह मामला उठ तो बहुत पहले से रहा है, लेकिन 2015 में सुप्रीम कोर्ट के द्वारा मॉनिटरिंग किए जाने के बाद इस कवायद में तेजी आई और 5 वर्षों तक 62 हजार कर्मचारियों की मेहनत तथा 1200 करोड़ रुपये खर्च करके यह सूची तैयार की गई। इस सूची में नाम जुड़वाने के लिए कितने ही लोगों ने अपने जेवर-जमीन बेचे। अभी भी जिन 19,06,657 लोगों का नाम इस सूची से बाहर है, वे फोर्नर ट्रिब्यूनल में दस्तक दे सकते हैं। उसमें भी अवैध सिद्ध होने पर वे डिटेन्शन कैंप में रहकर कोर्ट में आवेदन कर सकते हैं। अर्थात यह प्रक्रिया अंतहीन समय तक चलती रहेगी और तब तक इस संख्या में, इनके बाल-बच्चों की जुड़ती हुई संख्या के कारण, भारी इजाफा हो जाएगा।

इन प्रवासियों में बड़ी संख्या उन बांग्लादेशियों की है, जो 71 में युद्ध के समय, जिस समय पाकिस्तान से बांग्लादेश के स्वतंत्र होने के लिए भारत सैनिक और नैतिक समर्थन कर रहा था, बांग्लादेश में उस समय हो रहे खून-खच्चर से बच-बचाकर जान की सुरक्षा के लिए भारत की सीमा में प्रवेश कर गए थे। उस समय उन्हें शरण देना भारत की राजनीतिक और नैतिक आवश्यकता थी। परंतु एक बार आकर वे फिर कभी वापस नहीं गए। बड़ी संख्या में ये ही लोग हैं, जो घर-बार बनाकर, व्यापार-नौकरी करके यहाँ पूरी तरह रच-बस गए हैं। कुछ वे लोग भी हैं, जो दैनिक या मौसमी रूप से मजदूरी करने के लिए आते-जाते रहते हैं तथा कई बार यहाँ बस भी जाते हैं। और, कुछ लोग वे भी हैं, जो सीमा पार से आकार आपराधिक घटनाओं को अंजाम देते हैं। ये दोनों किस्म के घुसपैठ कमजोर सीमा-चौकसी के परिणाम हैं। जब तक इससे बचाव के लिए पुख्ता सीमा-चौकसी नहीं की जाएगी, तब तक कोई भी सूची अंतिम नहीं होगी।

ऐसा नहीं है कि केवल भारत में ही बांग्लादेश के अवैध प्रवासी हैं। बांग्लादेश में भी बड़ी तादाद में भारत के अवैध प्रवासी रह रहे हैं। बांग्लादेश की आर्थिक अवस्था और नागरिक जीवन अभी भारत से बेहतर हैं। इसलिए बड़ी संख्या में भारत के मजदूर अवैध रूप से बांग्लादेश में प्रवेश करते रहे हैं और अपनी जीविका चला रहे हैं। कहा जाता है कि वहाँ ऐसे अवैध भारतीयों की संख्या पाँच लाख के करीब है।

लेकिन अभी का महत्वपूर्ण प्रश्न एनआरसी की नई सूची के तहत 19 लाख से अधिक लोगों के निवास को अवैध घोषित किया जाना है। उन्हें अवैध घोषित किए जाने के बाद क्या होगा? क्या उन्हें वापस बांग्लादेश भेजा जा सकेगा? इसकी संभावना एकदम नहीं है। लाकृष्ण आडवाणी ने अपने कार्यकाल में उन्हें वापस भेजने के लिए प्रयास किया था। लेकिन बांग्लादेश ने स्पष्ट शब्दों में उन्हें लेने से माना कर दिया था। इस बार जैसी कि हवा है, उन अवैध घोषित नागरिकों को वापस भेजने के लिए कोई प्रयास नहीं किया गया है या किया जा रहा है। कहा जा रहा है कि फौर्नर ट्रिब्यूनल से अवैध घोषित होने के बाद उन्हें डिटेन्शन कैंप में ले लिए जाएगा। लेकिन यह बात भी अव्यावहारिक लगती है कि इन लाखों लोगों को या फिर अन्य प्रान्तों से भी अवैध घोषित किए गए करोड़ों लोगों की बढ़ती हुई जनसंख्या को कोई भी सरकार अनंतकाल तक बैठाकर भरण-पोषण करते रहना चाहेगी। निश्चय ही यह आर्थिक बोझ कुछ ही दिनों में असहनीय हो जाएगा। तो ऐसी कोई गुंजाइश नहीं दिखती है, जिससे इन अवैध घोषित नागरिकों से छुटकारा पाया जा सके।

जब इनसे छुटकारा पाने की कोई गुंजाइश नहीं है तो फिर इसे इतनी हवा क्यों दी जा रही है? इसका जवाब वर्तमान सरकार की राजनीतिक प्रवृत्ति में ढूँढा जाना चाहिए। भाजपा का यह आलीशान राजनीतिक महल ही हिन्दू-मुस्लिम विद्वेष की बुनियाद पर खड़ा है। उसने सत्ता-प्राप्ति की राजनीति की रणनीति ही मुस्लिमों के विरुद्ध हिन्दू तुष्टीकरण के आधार पर बनाई है। भारत में सदियों से हिंदुओं-मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक द्वेष का धुआँ सुलगता रहा है। 1947 के आसपास देश के अधिकांश हिस्सों में भीतर-ही-भीतर इस सुलगती हुई आग ने भीषण लपटों का रूप लेकर लाखों लोगों के जीवन को तबाह कर दिया था। उस संप्रदायिक हिंसा की तपिश को सहकर भी कुछ मुसलमानों ने भारत को ही अपना वतन माना था। लेकिन उनके भी मन में असुरक्षा और भय व्याप्त था। किसी भी जवाबदेह सरकार का यह दायित्व हो जाता है कि वह अपने नागरिकों के भीतर असुरक्षा और भय को दूर करने का प्रयास करे। इसलिए पूर्व की सरकारों ने मुसलमानों के साथ ऐसा बर्ताव किया, जिससे वे आश्वस्त हो सकें कि शासन उनकी सुरक्षा और हितों की हिफाजत में कोताही नहीं बरत रहा है। यह एक ऐतिहासिक राजनीतिक आवश्यकता थी। और, शुरुआत के दिनों में यह प्रयास सफल भी हुआ।

लेकिन बाद में चलकर क्षेत्रीय दलों ने जातीय विद्वेष के चूल्हे में फूँक मार-मारकर अपनी सफलता की सीढ़ियाँ निर्मित कीं तो उधर भाजपा सांप्रदायिक विद्वेष की राजनीति में अपने भविष्य को देखने लगा। इसमें उसे सफलता भी मिली। सांप्रदायिक विद्वेष की आग में यह देश जितना झुलसा, भाजपा का राजनीतिक आकार उतना ही बड़ा होता गया। अर्थात सांप्रदायिकता भाजपा की सफलता का मूल मंत्र हो गई। असम में दशकों से चली आ रही अवैध प्रवासियों की समस्या के विरुद्ध इसी मंत्र का अनुष्ठान करके वह सत्ता पर कब्जा करने के काबिल हो पायी थी। सुप्रीम कोर्ट की शह पाकर भाजपा ने विधानसभा चुनाव के समय किए गए उसी वादे को पूरा किया है।

असल कहानी फोर्नर ट्रिब्यूनल की सुनवाई के बाद डिटेन्शन सेंटर में लाये जाने के नाम पर शुरू होगी। डिटेंशन सेंटर में लाये जाने के लिए सारे लोग एक जगह गोलबंद होकर बैठे हुए नहीं हैं कि उन्हें पकड़कर उस सेंटर में रख दिया जाएगा। वे यत्र-तत्र बिखरे हुए हैं। उनमें से कई दूसरे प्रान्तों में पलायन कर जाएंगे। ऐसी स्थिति में मुसलमानों को हर जगह भारत का कानूनी नागरिक होने का पहचान पत्र मांगा जाएगा, सभी बातों के लिए। इस प्रक्रिया में जिनके पास पहचान पत्र नहीं होगा, उन्हें डिटेन्शन सेंटर भेजा जा सकता है। हो यह भी सकता है और जैसी कि हवा है, उसमें यह असंभव नहीं दिखता है कि पाँच लोग किसी मुसलमान को पकड़कर कहें कि साबित करो कि तुम भारतीय हो। इस तरह मुसलमानों को नीचा दिखाने और उनके सामाजिक बहिष्कार का यह एक सरकार प्रयास साबित हो सकता है। चुनावी प्रक्रिया से उन्हें बाहर करके हाशिये पर तो धकेल ही दिया जाएगा, आसानी से उन्हें आतंकवादी भी घोषित किया जा सकेगा।

इस तरह यह एनआरसी मुसलमानों को जलील और तंग करने के लिए एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है।

लेखक सामाजिक कार्यकर्त्ता और ‘आसा’ के संयोजक हैं|

सम्पर्क- +919934036404, dranilkumarroy@gmail.com

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