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नवजागरण के मनिषियों पर दक्षिणपन्थी हमले – कमल किशोर मिश्र

 

  • कमल किशोर मिश्र

 

आलोचना से बेहतर है उन तथ्यों को सामने लाया जाये, जिसके लिये हम महापुरूषों को याद करते हैं| आज किसी अभिनेत्री ने सती प्रथा का समर्थन किया है| और राजा राममोहन राय को अंग्रेजों का दलाल कहा है| कुछ दिन पहले अमित शाह की रैली के दौरान नवजागरण के महान नेता, समाजसुधारक ईश्वर चंद्र विद्यासागर की मूर्ति तोड़ी गयी| अभिनेत्री ने ट्यूटर हैंडिल में खुद को टीम भक्त लिखा है| मायने क्या है इसके?

बुरे सामाजिक रिवाजों को आप क्या फिर से लाना चाहते हैं? सती प्रथा के समर्थन का क्या मतलब है? आपने कहा है कि मुगलों के अत्याचार की वजह से स्त्रियाँ स्वयं सती होती थीं| लेकिन आज मुगलों का राज नहीं है| देश का कानून सती प्रथा की इजाजत नहीं देता है| स्वयं की इक्षा मायने नहीं रखती| इसमें सजा हो सकती है| सजा हो या न हो – इसे घोर पिछड़ी हुई मानसिकता माना जायेगा|

इतिहास के हिसाब से भी सती होने की दुखद कहानी है| सती होने से पूर्व उनको भांग पिलाया जाता था| कमाचियों में उनके हाथ बाँध दिये जाते थे| जोर-जोर से ढोल -नगाड़े बजाये जाते थे| धुआँ फैला दिया जाता था| क्यों? शरत ने बताया है –

1) भांग उनके होश छिन लेता था

2) बँध जाने से वह भाग नहीं सकती थी

3) ढोल में उनकी चित्कार दब जाती थी

4) धुआँ उनके मर्मांतक पीड़ा को ढक देता था|

मकसद क्या था? दूसरे घर से आई कन्या पति की मौत के बाद संपत्ति की हकदार न बन जाये| सती इसी कोढ़ का नाम था| राजाराम मोहन के महान प्रयास के बदौलत इसके विरूद्ध कानून बना| क्या इसका विरोध कर आप वापस मनुवाद को लाना चाहती हैं?

सवाल अपार बहुमत से चुने जाने का नहीं है| सवाल देश की शिक्षा का है| मनुवाद के सहारे हम आगे नहीं जा सकते|

विद्यासागर कौन हैं? मूर्ति तोड़ने वाला कौन है? इसी सवाल पर जबाब टिका है|

वे केवल विद्या के सागर नहीं हैं| करूणा और दया का सागर बस उनका परिचय नहीं है| आधुनिक शिक्षा के बीज बोने वाले हैं विद्यासागर! शिक्षा धर्मनिरपेक्ष हो, इसकी बुनियाद है विद्यासागर! रूढ़ीवादी दलदल में आकंठ डूबे हिन्दू समाज के खिलाफ हैं विद्यासागर! जहाँ यह विश्वास था कि नारी पढेगी तो विधवा हो जायेगी| उसी समाज में उसके घोर विरोध के बावजूद समाज के एक तबके को जगाकर नि:शुल्क नारी शिक्षा का आरम्भ करने वाले हैं विद्यासागर!

विद्यासागर ने उस अँधकार के युग में कहा,” संस्कृत नहीं, अंग्रेजी और विज्ञान की शिक्षा देश के लिए जरूरी है|” उन्होनें कहा ,” वेद और सांख्य दर्शन की भ्रांत प्रणाली है|”

एक ब्राह्मण परिवार में जन्म लिया| संस्कृत कॉलेज के प्रिंसपल थे| फिर भी इतना धर्मनिरपेक्ष और वैज्ञानिक सोच के हिमायती! यही विद्यासागर हैं! एक रीढ़विहीन  समाज में लोहे-इस्पात की रीढ़ लेकर!

विधवा को जीने का हक है| पति की मौत के बाद उसके जीवन का इतिश्री नहीं हो जाता| एक बेहद रूढ़ीवादी समाज में विधवा नारी के इस स्वभाविक दावे के साथ कौन खड़ा हो सकता है? वह बेहद  संवेदनशील इंसान ही हैं विद्यासागर!

विद्यासागर की मूर्ति तोड़ने वाला कौन है? जिनका मूर्ति तोड़ने का इतिहास है| पहले लेनिन को विदेशी कहा| फिर उनकी मूर्ति तोड़ा| फिर अम्बेडकर, पेरियार और गाँधी की| आखिर ये मूर्ति से क्यों डरते हैं? क्योंकि वे सिर्फ मूर्ति नहीं हैं| आदर्श के प्रतिक हैं| सच्चा जीवन और  सही विचारधारा के प्रतिक हैं| और ये कट्टर हिन्दूवाद के नाम देश को पिछे ले जाना चाहते हैं| ये विदेशी बोलकर अंग्रेजी भाषा का विरोध करते हैं| इंजीनियरिंग के छात्रों पर संस्कृत थोपना चाहते हैं| और सती पूजा करने वाले लोग हैं| अब वीडीओ फूटेज आ चुका है| बीजेपी और आरएसएस का चेहरा उजागर हो चुका है| अमित शाह का स्याह चेहरा बेनकाब हुआ है|

किन्तु दीदी  से भी सावधान रहना चाहिये| वे सत्ता के इस घृणित खेल में विद्यासागर को छोटा कर गयीं| उनकी मूर्ति तोड़ने को बंगाल का अपमान कहा| दरअसल यह समस्त मानवजाति का अपमान है|

लेखक मुहिम पत्रिका के सम्पादक मण्डल के सदस्य हैं|

सम्पर्क- +918340248851

 

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