लोकसभा चुनाव

बेगूसराय चुनाव – एक संस्मरण (भाग-3) – अनीश अंकुर

 

 

  • अनीश अंकुर 

 

जातिपूछने वाले की राजनीतिपता करो

 

नामांकन के बाद वाली सभा में घूमने के दौरान, बुजुर्ग कम्युनिस्ट नेता शिवशंकर शर्मा एक गोल घेरे में बैठे दिखे। उनके जनशक्तिके लिखे आलेखों को पसन्द करता रहा हूँ विशेषकर प्राचीन भारत के सम्बन्धी उनके आलेखों का। उनका अभिवादन किया तो वे उठ पड़े। उनसे आग्रह किया कि अपने लेखों को प्रकाशित कराएँ उन्होंने हामी भरी। साथ ही लगभग दस साल पुरानी घटना की मुझे याद दिलायी‘‘ मोतिहारी के सी.पी.आई जिला पार्टी ऑफिस में मैं बैठा था, उस समय वो जिला पार्टी की ओर से मैं ही देखता था। आप रिपोर्टर बन कर देर तक मुझसे बातें करते रहे और फिर चले गए। आपके जाने के के बाद लगा कि अरे ये तो अनीश है! ’’ वे उस वक्त की बात कर रहे थे जब 2009 के लोकसभा चुनाव को प्रभात खबरके लिए कवर कर रहा था। शिवशंकर शर्मा की स्मृति देख दंग था थोड़ा आह्लादित भी था कि उन्होने याद रखा हुआ है। उनसे पहले भेंट होती रही थी लेकिन पिछले कई वर्षों से भेंट लगभग नहीं के बराबर हुई थी। 2016 में कन्हैया के जेएनयू प्रकरण के दो-तीन महीनों बाद ए.आई.एस.एफ. द्वारा आयोजित पटना के एस.के. मेमोरियल में आयोजित सभा में उनको मंच पर देखा था। उनका नया परिचय कन्हैया के शुरुआती गुरू के रूप में कराया गया। उन्होंने सभा को सम्बोधित भी किया था। मार्क्सवाद कक्षाओं में दर्शन के जटिल पहलुओं को देसी ढ़ंग से समझाने वाले शिक्षक के रूप में खासे लोकप्रिय रहे थे।

सभा के बाद गेट से निकलने के दौरान चैतन्य मित्र,ए.आई.एस.एफ के पुराने साथ राकेश,मदन जी से भेंट हुई। राकेश भाई ने धोती पहन रखा था और अपने जिले सीवान में रह रहे हैं। जबकि मदन लक्खीसराय में वकालत कर रहे हैं। कन्हैया की नामांकन सभा में ये सभी चलकर आए थे। चाय की दुकान पर देर तक बेगूसराय के सियासी माहौल, कौन जाति किस करवट बैठेगा इसका आकलन व अनुमान लगाते रहे। चैतन्य मित्र ने कुछ बातें गम्भीरता से की। वैसे इप्टा के पटना में आयोजित पचहत्तरवें सम्मेलन के दौरान हुईबातचीत में कन्हैया की शैली को लेकर वे थोडे ओलाचनात्मक से थे लेकिन उस दिन उसके चुनाव जीतने की सम्भावनाओंको लेकर उत्साहित होकर वस्तुपरक आकलन कर रहे थे।

नामांकन के तीन दिनों बाद 12 अप्रैल को जनशक्ति भवन’ (सी.पी.आई का राज्य कार्यालय) में बेगूसराय चुनाव में कन्हैया को समर्थन देने के लिए पटना के बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओंकी एक बैठक बुलायी गयी। केदार दास श्रम व समाज अध्ययन संस्थान, पटना द्वारा आयोजित इस बैठक का मुख्य मकसद था एक सप्ताह पश्चात यानी 20 अप्रैल को पटना से बस द्वारा बेगूसराय चलकर कन्हैया के पक्ष में पटना के बुद्धिजीवियों का एक मार्च आयोजित करना। बैठक, हिन्दी के प्रख्यात कवि आलोकधन्वा और नवीनचन्द्र की अध्यक्षता में सम्पन्न हुई जिसमें सी.पी.आई (एम.एल- पी.आर.सी) के अजय कुमार सिन्हा, सी.पी.आई (एम.एल-कानू सान्याल) , के नन्द किशोर सिंह, सी.पी.आई (एम.एल- लिबरेशन) के कुमार परवेज, कम्युनिस्ट सेंटर फॉर इण्डिया के सतीश जी, शिक्षाविद् अक्षय जी,अधिवक्ता मदन कुमार सिंह,‘पटना खोया हुआ शहरजैसी चर्चित पुस्तक के लेखक अरूण सिंह, ‘एसोसियेशन फॉर स्टडी एण्ड एक्शनके अनिल कुमार राय, पटना विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफेसर सतीश कुमार, स्वामी सहजानन्द सरस्वती के अध्ययेता राघव शरण शर्मा ,रुपेश, गजेन्द्रकांत शर्मा , रंगकर्मी जयप्रकाश, गौतम गुलाल, विनीत राय सरीखें पटना के नागरिक व साहित्यिक -सांस्कृतिक समाज के कई लोग मौजूद थे। इस बैठक की पहलकदमी ली थी केदार दास श्रम व समाज अध्ययन संस्थान के सचिव अजय कुमार ने। अजय जी खुद भी बरौनी के रहने वाले थे लिहाजा अपने परिवहन विभाग की अपनी नौकरी से छुट्टी लेकर पंद्रह दिन बेगूसराय चुनाव के लिए समर्पित थे।

बैठक में जिन लोगों ने भी चुनाव को लेकर बातें की वे कन्हैया को लेकर बेहद उत्साह व उत्तेजना में थे। पहली बार मैं लोगों को कम्युनिस्ट पार्टी के बारे में इतनी उम्मीद से बातें करता देख रहा था। आलोकधन्वा ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में अपनी बातें कुछ इस प्रकार रखीं ‘‘ कम्युनिस्ट पार्टी का जो विवेक है वो सबसे महत्वपूर्ण है। कन्हैया हमारे कम्युनिस्ट विवेक का प्रतीक हैं। सुप्रीम कोर्ट में सुरक्षा प्रहरियो के बीच उसकी आँख पर हमला किया गया। ये हम सबने देखा है। हमारा जो भी भविष्य है कम्युनिस्ट पार्टियों के साथ है। कम्युनिस्ट पार्टियों के भाईचारे का प्रतीक है कन्हैया। वो हमारी दुर्निवार आशा का प्रतीक है। यदि आज हम कन्हैया के पक्ष में खड़े न हुए तो इतिहास हमें कभी माफ नहीं करेगा। ’’

आलोक जी बिल्कुल सही बात कह रहे थे। वैसे वामपन्थी समूहों को जिनके मुख से सी.पी.आई-सी.पी.एम के प्रति अच्छी बातें कभी न सुनी थी , हमेशा क्रिटिकल रहने वाले लोग भी आज कन्हैया के लिए साथ खड़े थे। यह सब अभूतपूर्व था। अन्ततः बीस अप्रैल को बस द्वारा बेगूसराय चलने की बात निश्चित की गयी। अजय जी ने बताया कि दो बसों का इंतजाम हुआ है। जो लोग भी चलना चाहते हैं वे सुबह आठ बजे जनशक्ति भवन आ जायें। केदार दास श्रम व समाज अध्ययन संस्थानको बसों का इंतजाम तथा उसके लिए परमीशन लेने की जिम्मेवारी दी गयी। जाने वालों को जाने के सम्बन्ध में पहले इत्तला करने का आग्रह किया गया।

लेकिन मीटिंग समाप्त होते होते सोशल मीडिया पर बवाल हो गया। ज्योंहिं कुछ लोगों ने सभा की तस्वीरें डाली गयीं मंच पर मौजूद लोगों की जातिढूंढ़कर कन्हैया की जाति से मिलान करहमला शुरू कर दिया गया। जनशक्तिमें मौजूद एकाध साथी भीथोड़े उत्तेजित हो कहा ‘‘ आप लोग थोड़ा मंच पर मौजूद लोगों के सामाजिक समीकरणें का भी ख्याल करिए। सब एक ही जाति के लोगों को बिठा देते हैं ! ’’ इस मुद्दे पर हल्की बहस भी हो गई उनसे कहा गया कि ‘‘ ऐसा कतई न था एक-दो को छोड़ कोई एक ही जाति का न था। और जाति को लेकर इतना डिफेंसिव होने की जरूरत नहीं हैं।’’ फिर उक और व्यक्ति प्रतिवाद करता है ‘‘ हमलोगों को आईडेंटिटी पॉलिटिक्स वाले गेम में ट्रैप नहीं होना है। हमें अपना काम करते रहना है।’’ लेकिन फिर कोई आगाह करता है ’’ये ठीक है कि हमलोग अपना काम ठीक से करते हैं लेकिन हमारे मंचों पर भी सबका चेहरा दिखना चाहिए। सिर्फ एक ही जाति के लोग न हो। इसे लेकर थोड़ा सतर्क व सावधान रहना चाहिए’’

आलोकधन्वा को लेकर सबको थोड़ा बुरा लग रहा था कि उनको बेवजह इस जातिमें घसीटा गया। उस वक्त कुछ ऐसा माहौल हो गया था कि जो कोई भी कन्हैया का समर्थन कर रहा था एक समूह के द्वारा सबों को एक सिरे से भूमिहारघोषित कर दिया जा रहा था। प्रतिउत्तर में फिर एक तर्क दिया जाता है ‘‘ देखिए यदि विरोध करने वालों की जाति देखिएगा न तो वे लोग भी तो एक ही जाति के दिखेंगे। सब के सब यादव ही ये सवाल उठा रहे हैं! ऐसा क्यों? ’’एक साथी यह भी जोड़ते हैं ‘‘ यादव में भी जो रिएक्शनरी यादव है वही सब है इसमें। ’’ फिर किसी की टिपपणी आती है ‘‘ इसमें से तो कई पहले माले में रह चुके हैं। ’’ लेकिन एक साथी कहते हैं ‘‘ सबसे दिलचस्प है कि इन सबका सरगना तो दिल्ली के कुछ ऐसे ब्राह्रण हैं जो पिछड़े-दलित की मुखौटा पहने घनघोर कम्युनिस्ट विरोध की राजनीति करते हैं। कई तो प्रमुख भाजपा नेताओं का ट्विटर आदि भी हैंडल करता है। ’’‘‘ दखिए इन आईडेंटिटी पॉलिटिक्स वालों के तार कहीं न कहीं दक्षिणपन्थियों से मिले रहते हैं। इस बातचीत का अन्त होता है एक साथी की इस टिप्पणी से कि ‘‘ हमें मुक्तिबोध की तरह ऐसे लोगों से पूछना चाहिए किपार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है ? ’’ ‘‘ यदि कोई जाति पूछे तो, जवाबमें प्रश्न दागो कि पहले अपनी राजनीति क्या है? ये बताइए ’’ ‘‘करेंगे राजद का समर्थन और पूछेंगे जाति’ ?’’

जनशक्तिके सामने वाली चाय की दुकान पर इस गपशप का अन्त हंसी-ठहाके से होता है।

20 अप्रैल की तैयारी शुरू हो जाती है। अनिल कुमार राय केदार दास की ओर से एक पर्चे का ड्राफ्ट तैयार करते हैं। थोड़े संशोधनों के साथ पाँच हजार पर्चा और दो बैनर का आर्डर दिया जाता है। पर्चा व बैनर पर कन्हैया की तस्वीर रखा जाये या नहीं इस बारेमें विमर्श होता है और अन्ततः रखने के पक्ष में तय किया जाता है।

20 अप्रैल को बेगूसराय यात्रा के बारे में प्रचार-प्रसार शुरू हो जाता है। निर्धारित तिथि नजदीक आने लगती है लेकिन इक्का-दुक्का लोग ही जाने की अपनी सहमति देते हैं। लोग जायेंगे या नहीं? ये आशंका घर करने लगती है। ऐसा न हो कि बस भरे ही नहीं बहुत बुरा लगेगा। इसी बीच दो में से एक बस का परमीशन मिलने की बात सामने आती है। हल्की राहत की सांस ली गयी चलो अब एक ही बस भरना होगा। लेकिन 19 तारीख को इतने लोगों के जाने की बात होने लगती है। कि हम सभी थोड़े चकित से थे। जाने वालों की संख्या देख अन्तिम समय में कुछ लोगों को मना किया जाता है।

20 अप्रैल की सुबह जनशक्ति भवन में पूरा बस भर जाता है। एक भी सीट खाली नहीं। यदि फिलहालकी सम्पादक प्रीति सिन्हा अपनी कार से दो-तीन कुछ लोगों को न ले गयीं होती तो काफी मुश्किल हो गयी होती। कार में जयप्रकाश आन्दोलन के प्रमुख शख्सीयत चक्रवर्ती अषोक प्रियदर्शी जी एवं सतीश जी भी थे। बस में थे प्राच्य प्रभा के सम्पादक विजय कुमार सिंह, सीताराम आश्रम बिहटा के बिनेश, नरेंद्र कुमार, जयप्रकाश, विनीत, गौतम गुलाल, पी.डी.वाई.एफ. केनौजवान साथी।

मुसारीघरारी में हम दोपहर में पहुँचे। वहीं एक होटल में खाने का इंतजाम किया गया। खाने के दौरान होटल में चार-पाँच अधेड़ मुसलमान लोगों का एक झुंड मिला। अजय जी ने पता किया तो उनलोगों ने कहा ‘‘ हमलोग दरभंगा के हैं। चार-पाँच दिनों से बेगूसराय में ही थे, कन्हैया के लिए। ’’ ‘ मुसलमानों के रूख के बारे में पूछनेउनलोगों का जवाब था:‘‘ अभी तो पचास से साठ प्रतिशत लोग कन्हैया के साथ हैं जो अन्त आते-आते लगभग अस्सी से नब्बे प्रतिशत तक चला जायेगा।’’

हमारी बस पहले कन्हैया के गाँव बीहट में रूकी। बीहट गाँव में प्रवेश करते समय दोनों ओर दुकानें थीं। गाँवों में ऐसे बाजार कम देखने को मिलते हैं। हम एक जत्था बनाकर दोनों बैनर आगे पीछे कर चले। बाजार के लोग थोड़े उदासीन व निरपेक्ष से नजर आए। जत्था बेगूसराय के मशहूर नेताओं चन्द्रशेखर सिंह, चन्द्रेश्वरी सिंह की मूर्तियों पर माल्यार्पण किया गया। बीहट में मौजूद कॉमरेडों ने जत्थे का स्वागत किया। फिर बगल के स्कूल में ले जाया गया। स्कूल का प्रांगण विशाल था। याद आया अरे! ये तो वही स्कूल है जिसके प्रिंसिपल को रवीश कुमार का कार्यक्रम आयोजित करने के कारण निलम्बित कर दिया गया था लेकिन फिर जनदबाव के परिणामस्वरूप पुनः प्रिंसिपल को बहाल करना पड़ा। वहाँ शाम में सभा थी जिसे संभवतः कन्हैया सम्बोधित करने वाले थे। जत्था को वहाँ की लोकल कमिटी की ओर से पानी व चाय की व्यवस्था की गयी। जत्थे को तेघड़ा विधानसभा से पिछले चुनाव में कम्युनिस्ट पार्टी के प्रतिनिधि रह चुके कॉमरेड रामरतन सिंह ने सम्बोधित किया। रामरतन सिंह बेगूसराय में कम्युनिस्ट पार्टी, यहाँ के शहीदों, प्रमुख कम्युनिस्ट नेताओं के सम्बन्ध में बताया। यहीं पर बेगूसराय इप्टा के मशहूर गायक दिलीप मिले। उनकी गाने के ढ़ंग को मैं काफी पसन्द करता रहा हूँ। विशेषकर जिस ढ़ंग से वे निराला, फैज , मख्दूमआदि की रचनाओं को गाते रहे हैं। उनसे चुनाव को लेकर बातें हुई तो उनका जवाब था ‘‘ अभी कहना बहुत मुश्किल है। लड़ाई काफी टफ है।’’

वहाँ से बस हर-हर महादेव चौक, जहाँ से मार्च शुरू होना था , पहुँचते- पहुँचते साढ़े चार बज गए थे। वहाँ बेगूसराय के भी कई साथीआए हुए थे। सी.पी.आई के राष्ट्रीय नेता नारायणा, इस्कफ के प्रदेश नेता रवीन्द्र नाथ राय, विश्वविद्यालय व महाविद्यालय कर्मचारियों (ए.आई. फुक्टो) के राष्ट्रीय नेता अरूण कुमार सहित बेगूसराय के कई रंगकर्मी भी शामिल थे। जुलूस प्रारम्भ हुआ। माइक का इंतजाम न होने के कारण परेशानी हो रही थी। लेकिन पटना से लाए गए केदार दास द्वारा छपवाए गए पीले रंग के पर्चे के साथ पी.डी.आई एफ के युवा साथियों का समूह भी सफेद रंग का पर्चा जुलूस के साथ-साथ बाँटतेचलते रहे थे। पर्चा लोग हाथों हाथ ले रहे थे। जुलूस अब बेगूसराय केमुख्य बाजार में प्रवेश कर चुका था। सड़क के दोनों किनारों के खोमचे वाले, फल वाले, चाय दुकान वाले, छोटे दुकानदार बड़ी उत्सुकता से पर्चे व जुलूस को देख रहे थे। हाँ कुछ दुकानदार टीका टिप्पणी भी कर रहे थे। विशेषकर शीशे की बड़ी दुकानों के अन्दर बैठे लोगों को पर्चा दिया जाता ये सुनने को मिलता ‘‘ आपलोग देशद्रोही का प्रचार कर रहे हैं’’एक दुकानदार ने यहाँ तक कहा ‘‘ टुकडे़-टुकड़े गैंग के लिए वोट मांग रहे हैं?’’शीशे वाली दुकानों से उलट खुदरा दुकानदार, आम लोग बड़ी ललक से पूछते ‘‘ अच्छा कन्हैया का पर्चा है लाइए-लाइए’’ पूरा जुलूस लगभग दो घंटे तक तेज गति से चलता रहा। रास्ते में हिुदस्तान के पत्रकार व रंगकर्मी विजय, चर्चित रंगकर्मी संतोष राणा और आलोक (एन.एस.डी) मिल गए। थोड़ी देर चुनाव के बारे में बात हुई और एक बिहार भर के रंगकर्मियों की ओर से कन्हैया के पक्ष में बयान जारी करने सम्बन्धी चर्चा हुई। जल्दी-जल्दी में ये तय किया गया कि इसको जरूर किया जाए। विजय ने कहा कि प्रेस रिलीज जरूर भेज दीजिएगा।

इसी बीच प्रेस रिलीज तैयार करने के चक्कर में मैं जुलूस से थोड़ी देर के लिए अलग हो गया। रास्ता ठीक से मालूम न होने के कारण एकफल वाले से पूछा ‘‘ एक जुलूस इधर से गुजरा है क्या?’’फल वाला जवाब देता है ‘‘ वो कन्हैया वाला जुलूस ?’’ मैंन झट से कहा ‘‘ हाँ हाँ..’’ उसने हाथ के इशारे से जुलूस की दिशा बतायी और बेगूसराय की भाषा में पूछ बैठा ? ‘भिया कन्हेया जीततै नै’ ( भैया कन्हैया जीतेगा न?) फल वाले से कुछ देर तक बातें होती रही। वो हमसे कन्हैया के जीत की गारन्टी चाहता था। वो बताता है कि उनके परिवार का वोट, लगभग पाँच-छह तो कन्हैया को ही जायेंगे। अन्त में वो थोड़ी आशंका से कह उठता है ‘‘ नै जीततै त जुलूम भै जतै’’ ( नहीं जीतेगा तो जुल्म हो जाएगा)

अन्ततः अॅंधेरा होने के बाद जुलूस समाप्त हुआ। सभी लोग सी.पी.आई के दफतर कार्यानन्द भवनगए। वहाँ काफी भीड़ थे। हम सभी बुरी तरह थक चुके थे। अस्सी वर्षीय राघव शरण शर्मा, नवीनचन्द्र जी जैसे बुजुर्गों ने सात-आठ कि.मी. की यात्रा की थी। सतीश जी ने बताया कि बीमारी के कारण इतनी लम्बी पैदल यात्रा उन्होने वर्षों बाद की है।

कार्यानन्द भवनके सबसे उपरी तल पर पुनः चाय-बिस्कुट आदि खिलाए गए। प्रियदर्शी जी, सतीश जी माइक न होने के कारण क्या कमी रह गयी इसकी चर्चा करते रहे। उनका कहना वाजिब था। माइक रहता तो लोगों को बताया जा सकता था कि जुलूस में कौन-कौन लोग थे, इस जूलस का क्या महत्व है आदि आदि। उनलोगों की बात जायज थी। बहरहाल जुलूस सम्पन्न हो चुका था। लम्बे जुलूस कीसार्थकता से सभी प्रसन्न थे। कई लोगों ने बताया कि बेगूसराय शहर में कन्हैया के समर्थन में इतना अच्छा व प्रभावी अभियान न चला था।

बस को रात में ही पटना लौटना था। अधिकांश लोग जहाँ बस खड़ी थी वहाँ जा चुके थे। मैं पीछे हो गया था। लपकते हुए बस की ओर जा रहा था कि रास्ते में सुधांषु फिरदोस, अरमान आनन्द आदि मिले। कन्हैया की सम्भावनाओं पर बातें होती रहीं। पिछले एक दो दिनों से कन्हैया की सभाओं में लगातार डिस्टर्बेंस किया जा रहा था। अरमान ने कहा कि ‘‘कन्हैया के काफिले के लोग ही मारपीट कर दे रहे हैं इससे बचना चाहिए। मैसेज अच्छा नहीं जा रहा है। ’’ गाँव घर के माहौल में ऐसी चीजें कभी भी बड़ा रूख अख्तियार कर सकती है। ऐसा न हो कि कहीं बात बिगड़ जाए और कन्हैया को नुकसान पहुँच जाए। उनकी बातों से थोड़ा चिंतित हो उठा। रामदीरी गाँव वाली घटना तब तक घट चुकी थी जिसमें कन्हैया के काफिले को रोक एक युवक ने उससे कुछ सवाल पूछे। बाद में किसी ने बताया कि वो लड़का वहाँ के सी.पी.एम के किसी साथी का भाई है और थोड़ा मेंटली डिस्टर्ब रहता है। अरमान आनन्द ने चलते-चलते ये भी कहा ने कहा कि ‘‘ यदि साठ प्रतिशत से अधिक वोटिंग हुई तभी कन्हैया की सम्भावना बनेगा अन्यथा मुश्किल होगी।’’

मैं बस पकड़ने की हड़बड़ी में था इस कारण चलता बना। अजय जी, जेपी और विश्वजीत यहीं रूक गए बाकियों को लेकर बस पटना के लिए रवाना हो गयी।

लेखक संस्कृतिकर्मी व स्वतंत्र पत्रकार हैं।

सम्पर्क- +919835430548, anish.ankur@gmail.com 

 

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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