आवरण कथा

स्वास्थ्य नीति के मूल आधार – रितु प्रिया

 

  • रितु प्रिया

 

दुनिया भर में स्वास्थ्य सेवाओं का संकट गहरा रहा है। पिछले डेढ़ सौ सालों में बनी यूरोप और उत्तरी अमेरिका की सेवाएं उन देशों के लिए भी अत्यधिक महंगी और एकांगी साबित हो रही हैं। मकिंजी कंपनी ने अनुमान लगाया था कि अगर स्वास्थ्य-सेवाओं पर खर्च ऐसे ही बढ़ता रहा तो 2100 में अमेरिका को अपनी सकल आय का सत्तानवे फीसद और यूरोप को साठ फीसद स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करना पड़ेगा। फिर भी राष्ट्रपति क्लिंटन और ओबामा की स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार की कोशिशें वर्तमान व्यवस्था के निहित स्वार्थों के आगे कमज़ोर पड़ गयीं। अगर भारत स्वास्थ्य-व्यवस्था का एक संगत मॉडल खड़ा कर सके तो वह भारतवासियों का दुख-दर्द कम करने के साथ-साथ अमीर और गरीब, सभी देशों के लिए मिसाल बन सकता है।

पिछले सात दशकों की उपलब्धियों को देशज धरोहर से जोड़ते हुए आगे बढ़ने का ढांचा गढ़ने का यह मौका है। इसको ठोस लोक-सशक्तीकरण का रूप देना आज की चुनौती। अगर इस की एक समग्र, वास्तविक रूपरेखा बने तो ये भारतीय स्वास्थ्य व्यवस्था की क्षमता को समयानुकूल रूप देते हैं। परन्तु अगर यह वर्तमान वर्चस्ववादी विशेषज्ञों से ही प्रेरित होगी तो स्वास्थ्य सेवाओं में थोड़ा-बहुत सुधार हो सकता है, मूल बदलाव नहीं। हमारा समाज व नीतिनिर्धारक कितना ‘स्वराज‘ की सोच से स्वास्थ्य व्यवस्था गढ़ते हैं, उससे तय होगा कि स्वास्थ्य व्यवस्था कितनी लोक-हितकारी बनेगी। स्वास्थ्य सम्बन्धी ‘स्वराज‘ का अभिप्राय होगा हर व्यक्ति अपने शरीर को समझे, उसकी ज़रूरतों व बदलावों का अहसास कर सके व उनके अनुसार कदम ले सके।  साथ ही हर समुदाय को उसके लिए उपयुक्त स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध हों और वह उन्हें नियन्त्रित कर सके।

स्वास्थ्य सेवा की समेकित भारतीय अवधारणा भारत की विशिष्ट स्थिति से ताल्लुक रखती है, क्योंकि हमारे यहाँ मान्यता प्राप्त आठ चिकित्सा पद्धतियाँ हैं। ‘आयुष’ मंत्रालय में आयुर्वेद, यूनानी, योग, नेचुरोपैथी, सिद्ध, सोवा-रिगोपा (तिब्बती पद्धति) और होमियोपैथी का स्थान है, और ऐलोपैथी का अलग ही मंत्रालय है। सभी की स्नातक शिक्षा, शोध और सेवाएं जारी हैं। इसके इलावा सभी इलाकों में घरेलू इलाज और जीवन-शैली में स्वास्थ्य सुरक्षा के साथ-साथ परम्परागत इलाज करने वाले वैद्य, हकीम, सिद्धर, हड्डी बिठाने वाले, दाई, जड़ी-बूटी वाले इत्यादि सेवाएं प्रदान करते हैं। वर्तमान व्यवस्था में इनमें से केवल एक, यानी ऐलोपैथी को मूल आधार माना गया है। बाकी सबके इस्तेमाल को नजरअंदाज कर उनकी वैधता पर ही प्रश्नचिह्न लगाए जाते हैं। जबकि अनेक अध्ययन बताते हैं कि अन्य पद्धतियों की सेवाओं की भी भारी मांग है, बशर्ते उनकी व्यवस्था में पर्याप्त गुणवत्ता हो। अठारह राज्यों के हमारे अध्ययन ने पाया कि तमिलनाडु और केरल में, जहाँ ऐलोपैथी और आयुष, दोनों की गुणवत्तापूर्ण सेवाएं उपलब्ध हैं, इन दोनों के बहिरंग विभाग और अस्पताल भरे रहते हैं (नैशनल हेल्थ सिस्टमज़ रिसोर्स सेन्टर, 2010)।

इसी अध्ययन में लोगों के घरेलू इलाज और खाद्य-पदार्थों सम्बन्धी जानकारी को पचहत्तर-अस्सी फीसद शास्त्रीय पद्धतियों के सिद्धांतों और ग्रंथों के अनुरूप पाया गया। इस लोक ज्ञान के ‘संसाधन’ को एक समेकित स्वास्थ्य व्यवस्था की नींव बनाते हुए इमारत नीचे से ऊपर तक खड़ी की जा सकती है। घरेलू इलाज से शुरू होकर, परम्परागत स्वास्थ्यकर्मियों को स्वास्थ्य उपकेंद्रों-केंद्रों से जोड़ते हुए बड़े अस्पतालों तक व्यवस्था का समग्र मॉडल बन सकता है। इसकी मोटा-मोटी लागत का आकलन करने पर पाया गया कि सार्वजनिक व्यवस्था पर कम-से-कम बीस प्रतिशत खर्च कम हो जाएगा। लोगों का खर्च जोड़ दें तो और किफायत होगी। आम आदमी के सशक्तीकरण और विभिन्न ज्ञान पद्धतियों को पुनर्स्थापित करने वाली ऐसी व्यवस्था अगर तर्कसंगत ढंग से कार्यान्वित की जाती है तो यह दुनिया के लिए एक न्यायसंगत, बहुलवादी और सातत्यपूर्ण मॉडल पेश करेगी।

 

समग्र लोक स्वास्थ्य व्यवस्था के मूल सिद्धांत

भाजपा के 2014 के राष्ट्रीय घोषणापत्र में स्वास्थ्य व्यवस्था के तीन मूल सिद्धांतों का जिक्र थाः ‘पहुँच बढ़ाना, गुणवत्ता में सुधार लाना, लागत कम करना’। इनको एक साथ लागू करने के लिए समग्र नज़रिए से ही पुख्ता व्यवस्था गठित की जा सकती है।

साथ ही स्वास्थ्य सेवाओं में अन्य सिद्धांतों को भी ध्यान में रखना आवश्यक हैः गुणवत्ता की कसौटियों: इलाज की विधि शरीर को नुकसान पहुंचाने वाली न हो; स्वास्थ्य सेवाएं विश्वसनीय हों; सेवाएं इज्जत से प्रदान की जाएं; इलाज के समय कोई खर्च न उठाना पड़े; और सेवा पाने वाले का सशक्तीकरण हो, यह मूल बिंदु हैं।

एक सिद्धांत यह भी है कि देखभाल करीब से करीब मिले। विभिन्न श्रेणी की संस्थागत सेवाओं में ऐसा तालमेल हो कि जो कार्य निचले स्तर पर हो सकता है उसके लिए ऊपर न जाना पड़े- जो उपचार घर में हो सकता है, उसके लिए बाहर न जाया जाए, और जो इलाज उपकेंद्र में हो सके उसके लिए अस्पताल न जाना पड़े। साथ ही, विशेषज्ञ सेवाओं की वाजिब जरूरत के समय वे सबको सुलभ हों।

‘आयुष्मान भारत‘ जैसे कार्यक्रमों द्वारा यह सब सिद्धांत नज़रअन्दाज होते दिखते हैं। यह स्वास्थ्य बीमा व प्राइवेट अस्पतालों द्वारा इलाज की ‘पहुँच बढ़ाना‘ व ‘गुणवत्ता में सुधार‘ लाना चाहती है। व्यवस्था में गुणवत्ता और विश्वसनीयता या तो सामुदायिक स्तर पर कार्यरत स्वास्थ्यकर्मियों/डॉक्टरों से आती है, सामाजिक प्रतिबद्धता वाले संस्थानों से जैसे कि चर्च, रामकृष्ण मिशन, गुरद्वारे या वक्फबोर्ड के हों, या निष्ठावान स्वयंसेवी समूहों द्वारा संचालित या फिर सरकारी सेवाओं से। ये सभी ‘प्राइवेट’ नहीं कहे जा सकते, ये ‘सार्वजनिक’ सेवाओं के भिन्न रूप हैं। पिछले तीन दशकों में ही प्राइवेट खासकर कॉरपोरेट अस्पतालों को गुणवत्ता की मिसाल माना गया है। वे साफ-सफाई और साज-सज्जा में और मरीजों का समय बचाने में आगे हैं, पर गुणवत्ता के अन्य पैमानों पर कमजोर रह जाते हैं, खासकर सुरक्षित इलाज और नैतिक व्यवहार में। उनकी सेवाओं की लागत भी हमेशा सार्वजनिक सेवाओं से अधिक ही होती है, अतः ‘लागत कम करने‘ का सिद्धान्त धरा-का-धरा रह जाता है।

विभिन्न देशों के अनुभव बताते हैं कि चाहे निजी बीमा हो या सामाजिक (यानी जिसमें सरकारें प्रीमियम दें), यह व्यय नियंत्रण और गुणवत्तापूर्ण व्यवस्था का विकल्प नहीं है। अमेरिका का निजी बीमा मॉडल दुनिया में सबसे महंगा है, जिसमें बीमा लिए हुए व्यक्ति ही अधिकतर मेडिकल खर्चे के कारण कंगाल घोषित हुए हैं।

थाईलैंड और ब्राजील जैसे देश ‘सामाजिक बीमा’ को लागू करके फिर छोड़ चुके हैं, और अब अपनी अधिकतर आबादी को सार्वजनिक सेवाएं प्रदान करने में कामयाब हो रहे हैं। हमारे देश में 2000 के दशक से चलाई गई सामाजिक बीमा योजनाओं, जैसे कि ‘राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना’, ‘राजीव गांधी आरोग्यश्री’ आदि के विभिन्न विश्लेषण दिखाते हैं कि उनसे गैर-जरूरी इलाज और अनैतिक मेडिकल व्यवहार कैसे बढ़ा है। इसीलिए स्वास्थ्य-बीमा की सीमित भूमिका ही हो सकती है।

विश्व बैंक और विश्व स्वास्थ्य संगठन भी स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में ‘मार्किट फेल्योर’ को पहचान कर 2000 के बाद से सार्वजनिक सेवाओं की अनिवार्यता पर जोर देने लगे हैं। यहाँ तर्क यह नहीं दिया जा रहा कि सभी प्राइवेट डॉक्टर बदनीयत हैं और सरकारी सबसे बढ़िया, बल्कि यह कि व्यवस्थागत तौर पर स्वास्थ्य-सेवा का सार्वजनिक, गैर-मुनाफे  वाला स्वरूप ही सबसे उपयुक्त है।

स्वास्थ्य व्यवस्था सुदृढ़ करने के लिए बहुआयामी नीति निर्धारण

पिछले दशक में सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए कई पहल हुई हैं, जिनसे नीति-निर्धारण के लिए मूल्यवान सीख मिल सकती है। जैसे कि ‘राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन’ द्वारा सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था जो मृतप्राय हो गई थी, को फिर से जीवित अवस्था में  लाना, अनेक सामाजिक बीमा योजनाएं और योजना आयोग की ‘सार्वजनिक स्वास्थ्य कवरेज पर उच्चस्तरीय विशेषज्ञ ग्रुप’ की रपट द्वारा उनके लाभ को खारिज करना। इनसे स्पष्ट होते प्रमुख कदमः उचित बजट, गुणवत्तापूर्ण सेवाओं के लिए सभी स्तरों के संस्थानों का सही संतुलन; घरों और समुदायों में स्वास्थ्यवर्धन, बीमारी की रोकथाम, इलाज और प्रशामक उपचार का स्थान और संस्थाओं से तालमेल; आयुष को मुख्यधारा से जोड़ने और स्थानीय परम्परागत स्वास्थ्य सम्बन्धी प्रथाओं को पुनर्जीवित करने के तरीके और उनका प्रभाव; पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप; डॉक्टरों, नर्सों और पैरामेडिकल्स की ज्यादा संख्या में सरकारी सेवाओं में भर्ती के लिए हर संभव कदम; उप-केंद्रों, केंद्रों और अस्पतालों की संख्या बढ़ाने की आवश्यकता; इनमें कार्य संस्कृति को ज्ञान आधारित, उपयोग-सुलभ और लोगों के प्रति संवेदशील बनाना; आवश्यक दवाएं सभी मरीजों को मुफ्त मिलें; पब्लिक हेल्थ काडर की स्थापना; स्वास्थ्य तकनीकी के मूल्यांकन के लिए सरकारी तंत्र की स्थापना; कम खर्चीली और प्रभावकारी स्वास्थ्य तकनीकी का विकास; और समुदाय द्वारा निगरानी के लिए प्रावधान।

प्राइवेट सेवाओं को जिम्मेदार और उत्तरदायी बनाने हेतु विभिन्न कदम उठाने होंगे। मसलन, चिकित्सा प्रतिष्ठान अधिनियम (क्लिीनिकल इस्टैबलिशमेंट्स ऐक्ट) जैसे वर्तमान प्रावधानों का सही क्रियान्वयन; ऐसी प्रक्रियाएं और प्रावधान बनाना, जो अनैतिक स्नातक और विशेषज्ञ डॉक्टरों को किनारे करके पूरे पेशे को कलंकित होने से बचा सकें; मेडिकल शिक्षा का नवीनीकरण, जिसमें तकनीकी स्वास्थ्य ज्ञान के साथ-साथ उसके सामाजिक और नैतिक पक्ष को भी उपयुक्त स्थान मिले; मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया को उत्तरदायी बनाने के लिए उसकी पुर्नव्यवस्था; आयुष डाक्टरों का आत्म विश्वास बढ़ाना और अपनी ज्ञान पद्धति नैतिक प्रैक्टिस को प्रोत्साहन।

देश में आयुष सेवाओं की गुणवत्ता और पहुँच बढ़ाने पर जोर दिया जाए, न कि केवल विदेशों में। चीन ने अपने स्वास्थ्य-बजट का लगभग पचास प्रतिशत अपने देश में परम्परागत पद्धति पर लगाया, फिर औषधीय जड़ी-बूटी के 54 फीसद अंतरराष्ट्रीय बाजार पर कब्जा जमा लिया।

विभिन्न पद्धतियों के जानकारों से संवाद कर आम स्वास्थ्य समस्याओं के लिए ‘समेकित तर्कसंगत बचाव और इलाज के दिशानिर्देश’ बनाए जाएं जिनकी सभी पद्धतियों के डॉक्टरों और आम लोगों को जानकारी हो।

सभी स्वास्थ्यकर्मियों को समेकित व्यवस्था के लिए उपयुक्त शिक्षा मिले। ‘राष्ट्रीय कौशल विकास परिषद’ द्वारा स्वास्थ्य के क्षेत्र में योग और जड़ी-बूटी की दवा बनाने जैसे कौशल को भी प्रोत्साहन दिया जाए। सभी जिलों में ‘स्थानीय स्वास्थ्य संसाधन केंद्र‘ बनें, जो स्थानीय लोक परम्पराओं का अध्ययन करें और औषधीय जड़ी-बूटी सबको सुलभ कराएं। परम्परागत औषधियों के लघु उद्योग को बढ़ावा मिले। इस समेकित ढांचे के साथ-साथ आवश्यक होगा सभी स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करना ताकि वह गुणवत्ता के साथ सब तक पहुंचे।

सबके लिए स्वास्थ्य के इन लक्ष्यों को पाने का रास्ता चुनौतीपूर्ण होगा, परन्तु चुनौतियों को समझकर ही व्यवस्था बनानी होगी जो परिस्थितियों अनुसार उपयुक्त हो, कारगर साबित हो।

सबके लिए स्वास्थ्य: वर्तमान चुनौतियाँ

  1. पहली चुनौती है आज की डाक्टरी विशेषज्ञ आधारित मानसिकता जिसके कारण प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार व स्थानीय स्वास्थ्य परम्पराओं को उनमें जोड़ना मुश्किल हो गया है। फायदा सब को मिले। इसके लिए लोगों को डाक्टरों व विशेषज्ञों पर बनती निर्भरता को कम करना होगा, क्योंकि इस निर्भरता में भी गैर-जरूरी खर्च बढ़ने के साथ-साथ स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर बढ़ते हैं और जिनको असल में विशेषज्ञ सेवाओं की ज़रूरत होती है, वह उनसे महरूम रह जाते हैं।

ayushman bharat

‘हेल्थ एण्ड वेलनेस सेन्टर‘ भी सरकार के वर्तमान कार्यक्रम का हिस्सा हैं। परन्तु उनमें उप-स्वास्थ्य केन्द्र के मातृ-एवं शिशु स्वास्थ्य कार्यक्रम में एक ही नई सेवा जोड़ी गई है-ब्लड प्रेशर, डाइबिटीज़ और कैंसर रोगों की पहचान करना। क्योंकि इनका एलोपैथिक इलाज इस स्तर पर उचित नहीं माना जाता इसलिए इसे जाँचकर रोग पता लगाने का मतलब होगा लोगों को और प्राइवेट डाक्टरों की ओर धकेलना और जीवन भर के लिए दवाओं पर निर्भर बनाना। इससे इन रोगों की रोकथाम नहीं होगी, अगर इस काम को समग्र सोच में नहीं जोड़ा जाता।

अपने शरीर को समझकर स्थानीय घरेलू इलाज, श्रुतु-चर्या और दिनचर्या इत्यादि सम्बन्धी परम्परागत ज्ञान को फैलाने से निर्भर मानसिकता कम हो सकती है। इसके लिए कई कदम उठाए जा सकते हैं जैसे कि ‘जिला स्वास्थ्य रिसोर्स सेन्टर‘ बनाकर जो स्थानीय जड़ी-बूटी, लोक चिकित्सक जैसे कि हड्डी बिठाने व जड़ी-बूटी वाले, सम्बन्धी जानकारी इक्ट्ठी कर उसका मूल्यांकन (वैलिडेशन) करना व प्रोत्साहन देना ताकि इनका ज्ञान इस पीढ़ी के साथ खत्म न हो जाए (जैसा कि क्वालिटी काउंसिल ऑफ़ इंडिया की एक पहल है)। जड़ी-बूटियों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए स्थानीय उत्पाद इस प्रकार बढ़ाया जाए कि उसकी चिकित्सकीय गुणवत्ता बनी रहे। शहरों में जगह-जगह जड़ी-बूटी उगाकर उपलब्ध कराना एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम हो सकता है। इसके लिए स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं, नर्सों व डाक्टरों को भी परम्परागत पद्धतियों व स्थानीय परम्परागत जड़ी-बूटी इत्यादि का महत्व समझना होगा।

  1. दूसरी चुनौती आएगी अस्पताल की विशिष्ट सेवाओं के लिए सामाजिक बीमा योजनाओं के कारण चिकित्सा सेवाओं में अनेक विकृतियाँ पैदा होने की। यह दुनिया भर का अनुभव है, न कि केवल भारत में ऐसी वर्तमान योजनाओं का। इसलिए इन विकृतियों को समझकर इनके समाधान को व्यवस्था में जोड़ना होगा। स्थानीय समूहों, कुऔपरेटिव व पंचायतों की निगरानी में यह स्वास्थ्य बीमा योजनाएं चलाई जाए यह एक विकल्प है। सार्वजनिक स्वास्थ्य केन्द्रों व अस्पतालों की क्षमता बढ़ाना दूसरा रास्ता है।
  2. तीसरी चुनौती है बजट की। अगर सभी को डाक्टरी व अन्य पद्धतियों की सेवाएं सुनिश्चित करानी हैं तो लगभग 5 से 10 गुणा अधिक बजट चाहिए होगा। अभी के बजट में प्रति व्यक्ति केवल 250 रूपये (लगभग 4 अमरीकी डालर) सालाना खर्च किया जाता है। बाकी खर्च लोग अपनी जेब से करते हैं। सरकारी सेवाओं के साथ-साथ अगर सरकार प्राइवेट सेवाओं के लिए भी खर्च उठाएगी तो बजट और भी बढ़ाने की आवश्यकता पड़ सकती है जैसे कि अमेरिका का अनुभव दिखाता है, तो बजट 5-10 नहीं, 100 गुणा बढ़ाना पड़ेगा। इसलिए कम खर्च वाली वैकल्पिक व्यवस्था अनिवार्य हो गई है।
  3. चौथी चुनौती है सरकारी सेवाओं की गुणवत्ता की। ऊपर इंगित विभिन्न उपायों के साथ-साथ पंचायत को साथ लेकर, लोगों द्वारा सामुदायिक निगरानी का तरीका महाराष्ट्र व अन्य देशों में आज़माया जा चुका है और इसके व्यापक कार्यान्वयन की ज़रूरत है।
  4. अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर दवाओं के क्षेत्र में डब्लूटीओ एक चुनौती है। इसके लिए सरकार अन्य विकासशील देशों के साथ खड़ी है ताकि हमारी दवा इंडस्ट्री जो जिम्मेदारी निभाती आई है उसे जारी रख सकें। हमारी फार्मास्यूटिकल इंडस्ट्री कम दाम पर दवाएं उपलब्ध कराती आई है, हमारे देश में ही नहीं, अन्य गरीब देशों में भी। ऐसे प्रावधान अपनाने होंगे जो इस कार्य को बढ़ावा दे सकें।
  5. भारतीय जनता पार्टी के 2014 के राष्ट्रीय चुनाव घोषणापत्र में स्वास्थ्य सेवाओं, खाद्य और पोषण सुरक्षा, दवाओं और दवा उद्योग, व औषधियों से जुड़े विधि विभागों को समेकित करने का वायदा था। लोक स्वास्थ्य की कसौटियों पर इन सभी की नीतियाँ समग्रता से बनें इसके लिए यह कदम अतयन्त उपयोगी होगा, परन्तु यह बी.जे.पी. की सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में तो कार्यान्वित नहीं किया। हर विभाग की अपनी विशिष्टता रखने की प्रवृति व आर्थिक निहित स्वार्थ ऐसे कदम में आड़े आएंगे ही, परन्तु लोकहित में ऐसे कदम उठाए जाने चाहिएं।
  6. और आखरी चुनौती है स्वास्थ्य सेवाओं के साथ-साथ सामाजिक व पर्यावरणीय परिपेक्ष्य की। सामाजिक माहौल सौहार्दपूर्ण हो, मानसिक तनाव कम हों, स्वस्थ वातावरण हो जिससे रसायनिक प्रदूषण कम हो जाए। यानि ऐसी विकास नीतियाँ बनें-शहरी विकास, ग्रामीण विकास, कृषि, उद्योग, ऊर्जा की- सभी पर पुनर्विचार करके गढ़ने की आवश्यकता है। जब यह सभी के स्वास्थ्य व खुशहाली पर केंद्रित होंगी तभी आर्थिक विकास ‘स्वास्थ्य व खुशहाली‘ का एक सार्थक माध्यम बनेगा। स्वास्थ्य सेवाएं खुद यह नहीं कर सकतीं परन्तु पब्लिक हेल्थ कर्मियों की ज़िम्मेवारी मानी जानी चाहिए कि वह इन सभी मुद्दों के स्वास्थ्य पर प्रभाव को इंगित करके, स्वस्थकर विकास की अवधारणा समाज के विभिन्न निकायों तक पहुँचाएं। साथ ही हर नीति के पर्यावरण व स्वास्थ्य पर सम्भावित प्रभाव का आंकलन किए बिना उसे अपनाया नहीं जाना चाहिए। इस के लिए हर मंत्रालय में एक स्वास्थ्य-डेस्क बननी चाहिए।

जाहिर है कि स्वास्थ्य-सेवा के नीतिकारों के सामने कई मूल चुनौतिपूर्ण सवाल हैंः सभी पद्धतियों के बीच संतुलन कैसे बैठाया जाए? सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के बीच प्राथमिक भूमिका किसकी हो? लोक स्वास्थ्य की नज़र से सभी क्षेत्रों की नीतियों व विकास के काम में ‘स्वास्थ्य और खुशहाली‘ केन्द्र बिन्दु कैसे बनें? कार्यान्वयन के लिए ठोस कदम अनेक प्रकार के हो सकते हैं, जिनमें से उपयुक्त विकल्प चुने और गढ़े जा सकते हैं। आवश्यकता है ऐसी नई देशज अवधारणा की, जिसके चलते हर भारतीय कह सके ‘यह हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था है।’

लेखिका जेएनयू में सेन्टर ऑफ़ सोशल मेडिसिन एण्ड कम्युनिटी हेल्थ की प्रोफ़ेसर हैं|

सम्पर्क- +919313350186, ritupriyajnu@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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