मैं कहता आँखन देखी

बहुजन साहित्यकार भिखारी ठाकुर

 

  • नवल किशोर कुमार

 

कुछ दिनों पहले मैंने ओबीसी साहित्य की अवधारणा को लेकर लिखा था। मेरा प्रस्ताव यह था कि ओबीसी साहित्य की अवधारणा कोई निर्मूल अवधारणा नहीं है। इसका व्यापक आधार है। तब दिल्ली में मेरे एक बहुजन साथी का प्रस्ताव था कि ओबीसी साहित्य और दलित साहित्य कहने से बंटवारा होगा और मुख्य धारा के साहित्य जिस पर द्विजों का कब्जा है, के खिलाफ संघर्ष कमजोर पड़ेगा। उनका कहना था कि अब बहुजन साहित्य की बात कहनी चाहिए बजाय इसके कि कोई दलित साहित्य कहे या आंबेडकरवादी साहित्य या फिर ओबीसी साहित्य।

हालांकि मेरे मित्र ने अपनी टिप्पणी करने में जल्दबाजी की। संभवत: उन्होंने मेरा पूरा लेख नहीं पढ़ा होगा। वे बहुत सुलझे हुए और जागरूक साहित्यकार हैं। उनकी रचनाओं में यर्थाथ होता है। भाषा और साहित्य सौंदर्य के ज्ञाता तो वे हैं ही।

कल देर रात व्हाट्सअप पर एक संदेश आया। एक खबर का लिंक था उसमें। खोलकर देखा तो भिखारी ठाकुर से सम्बन्धित। भिखारी ठाकुर मेरे लेखन के विषय रहे हैं। संभवत: यही वजह रही होगी कि प्रेषक ने वह संदेश मुझे भेजा होगा। सबसे पहले प्रेषक के नाम पर नजर पड़ी। उसने अपना नाम सुशील ठाकुर लिखा और परिचय में भिखारी ठाकुर का प्रपौत्र। प्रपौत्र मतलब परपोता। खबर के मुताबिक उन्होंने एक व्यक्ति पर आरोप लगाया है कि वह व्यक्ति भिखारी ठाकुर के नाम पर फर्जीवाड़ा कर रहा है।

वह खबर थी ही नहीं। वह महज एक परपोते का बयान था। वह परपोता जिसने न तो अपने परदादे को समझा और न ही उनके रचना संसार को। मुझे लगा कि उसे समझाया जा सकता है कि भिखारी ठाकुर केवल आपके खानदान के नहीं थे। वे पूरे समाज के थे। उनकी रचनाओं में बहुजन समाज होता था। फोन करने पर बात हुई सुशील ठाकुर से। लेकिन समझने के बजाय वे मुझपर ही आरोप लगाने लगे कि मैं किसी व्यक्ति विशेष (जिस पर उन्होंने आरोप लगाया है) का पक्ष ले रहा हूं।

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खैर, परिवारवादी अंधे होते ही हैं। राजनीति में इसके प्रमाण आसानी से देखा जा सकता है। लालू प्रसाद के एक लाडले जिनके पास राजनीतिक क्षमता शून्य है, वे भी स्वयं को लालू प्रसाद का वारिस मानते हैं। यह बात वे हक से कहते हैं। अब इसको क्या कहा जाय| आप भी कहेंगे कि मैं कहां से कहां पहुंच गया। बात बहुजन साहित्य से शुरू की थी और भिखारी ठाकुर की चर्चा के बाद राजनीति तक पहुंच गया।

दरअसल, यही बहुजन साहित्य का असर है, जिसकी बात मैं भी करता हूं और उस दिन दिल्ली में बहुजन साहित्यकार साथी कह रहे थे। हम अपने साहित्य को अपने जीवन से अलग कर ही नहीं सकते। हमारा सोचना-विचारना सब कुछ प्रभावित होता है। हम यदि बहुजनों के बारे में सोचेंगे तो केवल किस्से-कहानियों के बारे में नहीं सोच सकेंगे। रोजी-रोटी की बात भी सोचनी होगी। साथ ही सोचना होगा सम्मान और समान अधिकार के बारे में। जाहिर तौर पर राजनीति भी शामिल है। भिखारी ठाकुर के परपोते ने जो बात कही, वह भी तो एक तरह की राजनीति ही है। एक ऐसी राजनीति जिसका मकसद केवल और केवल भिखारी ठाकुर के नाम पर चंदा मांगना है।

मैं इसमें सुशील ठाकुर का कोई दोष नहीं देखता। वह एक आम इंसान हैं, जिनके मन में यह भाव है कि भिखारी ठाकुर उनके परदादा थे तो सबसे पहला हक तो उनका ही बनता है। मानों भिखारी ठाकुर की रचनाएं उनके लिए जमीन हो और उन पर सुशील का खानदानी हक है। वे ऐसा सोचते हैं, यह गलत है। लेकिन इसके लिए उन्हें दोषी करार नहीं दिया जाना चाहिए। दरअसल, बिहार में शिक्षा के हालात ही ऐसे हैं।

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उफ्फ, फिर से राजनीतिक बातें करने लगा। यह राजनीति है कि पीछा ही नहीं छोड़ती। चलिए वापस लौटते हैं बहुजन साहित्य की ओर। मेरे हिसाब से बहुजन साहित्य की शुरूआत तो कबीर के साथ ही हो गयी थी। उनकी रचनाओं में बहुजन समाज के सवाल थे। उन रचनाओं में प्रतिरोध तो था ही, अपने लिए आत्मसम्मान के तत्व भी केंद्र में होते थे। जोती राव फुले की किताब गुलामगिरी को बहुजन साहित्य का महत्वपूर्ण ग्रंथ माना जाना चाहिए। उनकी इस रचना ने बहुजनों को यह बताया कि वे कैसे गुलाम बना दिए गए हैं। इस गुलामी को खत्म करने का तरीका भी उन्होंने सुझाया जिसे मुकम्मिल तौर पर डॉ. आंबेडकर ने ‘एनीहिलेशन ऑफ कास्ट’ यानी ‘जाति का विनाश’ के जरिए हमारे सामने रखा।

आंबेडकर की रचनाओं को कथा-कहानियां-कविताएं-गजल आदि लिखने वाले शायद ही साहित्य मानें। संभव है कि वे उन्हें आलेख की संज्ञा दें, लेकिन उनके लेखों ने बहुजन साहित्य की बुनियाद को मजबूती दी। उन दिनों ही बिहार में भिखारी ठाकुर की रचनाएं लोकप्रियता के शिखर की ओर अग्रसर थीं। बिदेसिया नाटक से लेकर गबरघिचोर और बेटीबेचवा तक। हर नाटक में बहुजनों के सवाल। उनकी रचनाओं में कोई नायक नहीं होता था। सब के सब किरदार थे। यह कहना भी गैरवाजिब नहीं कि उनके हर नाटक में तत्कालीन समाज अपने पूरे स्वरूप में सामने आता है।

आज मेरा प्रस्ताव है कि भिखारी ठाकुर को बहुजन साहित्यकार माना जाना चाहिए। दलित साहित्यकारों से भी गुजारिश है कि वे द्विजों की तरह व्यवहार न करें। दलित साहित्य पर कुंडली मारकर बैठने के बजाय बहुसंख्यकों के साहित्य निर्माण की दिशा में आगे बढ़ें।

लेखक फॉरवर्ड प्रेस, दिल्ली के सम्पादक (हिन्दी) हैं|

सम्पर्क-  naval4socialjustice@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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