मैं कहता आँखन देखी

अमित शाह नहीं जानते कलकत्ता का यह इतिहास

  • नवल किशोर कुमार

 

ट्वीटर पर एक दिन पहले की सूचना पड़ी है। सूचना एएनआई के सौजन्य से है। इसके मुताबिक अमित शाह ने कोलकाता में कहा – “आज मैं हिन्दू, सिक्ख, जैन, बौद्ध और ईसाई धर्म के सभी रिफ्यूजीज को विश्वास दिलाना चाहता हूं कि केंद्र सरकार द्वारा आप सभी को भारत छोड़ने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा। अफवाहों पर विश्वास न करें। एनआरसी से पहले हमें एक संशोधन विधेयक लाएंगे जो इन धर्मों के लोगों को भारतीय नागरिकता प्रदान करेगा।”

कोलकाता यानी पश्चिम बंगाल की राजधानी। पूर्व में भारत की राजधानी रहने का सौभाग्य भी इस शहर को रहा है। अमित शाह देश के गृह मंत्री हैं। उनके मुंह से कही गयी यह बात पूरे देश में चर्चा का विषय है कि क्या केवल मुसलमान ही इस देश के लिए अनवांटेड हैं? लोग यह भी कह रहे हैं कि जब भारत का संविधान धर्म निरपेक्ष है तब फिर देश का गृहमंत्री संविधान के विपरीत ऐसी बातें कैसे कह सकते हैं? कुछ लोगों का मत है कि अमित शाह पर संविधान के विपरीत बात कहने पर उनके खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा चलाया जाना चाहिए। आरएसएस और भाजपा के लोगों का मत है कि अमित शाह ने कुछ गलत नहीं कहा है। मुसलमानों को इस देश में रहने का कोई अधिकार नहीं होना चाहिए।

मसलन श्रीवत्स नामक एक ट्वीटर यूजर ने जवाब में लिखा है – “पहले आसाम में एनआसी पर प्रोपर स्टैंड लें। अलग-अलग राज्यों में आप अलग-अलग बात कहते हैं। आप ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि आप लोगों को बांटकर केवल राजनीतिक लाभ लेना चाहते हैं ।”

सनद रहे कि आसाम में अमित शाह ने एनआसी को फ्लॉप करार दिया है और कहा है कि केंद्र सरकार एनआरसी को खारिज करती है।

महात्मा नीमो गांधी नाम से ट्वीटर चलाने वाले एक शख्स ने लिखा है – “सर, जाएगा तो कोई नहीं। न हिन्दू न मुसलमान। मगर आपका यही चलता रहा तो आप जरूर चले जाओगे सरकार से भी और युगांडा से भी।” मेघना नामक एक महिला ट्वीटर यूजर ने अमित शाह के बयान को सेकेंड क्लास के विशेषण से नवाजा है। संदीप जैन नामक एक व्यक्ति ने अमित शाह को अपनी टिप्पणी में गंजू कहा है और यह भी कहा है कि इकोनॉमी संभल नहीं रही। गंजू भाई अपनी औकात पर आ गए।

तो कहने का मतलब यह है कि अमित शाह के बयान की तीखी आलोचना हो रही है। आलोचना करने वालों का धर्म और जाति अलग-अलग है। यह भारत के लिए सौभाग्य ही है कि ऐसे दौर में जबकि सरकार ही संविधान का मजाक बना रही है, देश के लोग चाहे वे किसी धर्म के क्यों न हों, सरकार के बयान का विरोध कर रहे हैं।

कोलकाता में अमित शाह ने ऐसा क्यों कहा? इसका जवाब तो बहुत सीधा है कि वहां चुनाव होने वाले हैं और अमित शाह भाजपा की जीत हिन्दू-मुस्लिम बंटवारे के आधार पर सुनिश्चित करना चाहते हैं। लेकिन वे नहीं जानते हैं कि इसी कोलकाता में उनके ही राज्य के महात्मा गांधी ने वह फतह हासिल की थी जिसे भारत के प्रथम गर्वनर जनरल सी. राजागोपालाचारी आजादी से भी अधिक महत्वपूर्ण कहा था।

यह जीत थी धर्मनिरपेक्षता की। वह अगस्त-सितंबर 1947 का समय था। तब कलकत्ता में हिन्दू-मुस्लिम दंगे हो रहे थे। चारों ओर से हत्याओं की सूचना आ रही थी। देश तो 15 अगस्त 1947 को ही आजाद हो गया था और दिल्ली में वे लोग चैन की वंशी बजा रहे थे जिनके हाथों में सत्ता की बागडोर अंग्रेज थमाकर गए थे। गांधी एकमात्र इंसान थे जिनका मन बेचैन था। वह जल्दी से जल्दी कोलकाता पहुंचना चाहता थे। वह पहुंचे भी और उन्होंने सत्याग्रह के जरिए दंगों पर विजय पायी।

4 सितंबर 1947 को कलकत्ता में लोगों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा – “कलकत्ता के पास आज भारत में अमन-चैन कायम होने की चाबी है। अगर यहां छोटी सी भी घटना होती है तो उसकी प्रतिक्रिया पूरे देश में होगी। अगर पूरे मुल्क में भी आग लग जाए तो यह आपकी जिम्मेदारी बनती है कि आप कलकत्ता को दंगों से मुक्त रखेंगे।”

दरअसल, पश्चिम बंगाल की भौगोलिक स्थिति ऐसी जिसके कारण वह पूरे पूर्वोत्तर भारत में महत्वपूर्ण हो जाता है। बांग्लादेश तो उसी का हिस्सा रहा है। इसके अलावा भी कई देशों के साथ प्रत्यक्ष जुड़ाव रहा है। भारत सरकार के स्तर पर लंबे समय से यह बहस चलती रही है कि पश्चिम बंगाल सहित अनेक राज्यों में घुसपैठियों की संख्या बढ़ी है। इनमें आसाम, झारखंड,बिहार भी शामिल है। 1971 में जब भारत ने बांग्लादेश को पाकिस्तान के चंगुल से निकलने में मदद की तब बड़ी संख्या में वहां से लोग भारतीय सीमा में आए। इस तथ्य से भी सरकार इन्कार नहीं करती है। लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि कोलकाता और उसके आसपास के जिलों में आजादी के पहले से बड़ी संख्या में लोग पलायन कर रह रहे थे। उनमें हिन्दू भी थे और मुसलमान भी। मुगलों के काल में भी कलकत्ता को अहम दर्जा हासिल था।

अब सवाल यह उठता है कि भारत सरकार चाहती क्या है? क्या वह उन सभी को भारत से बाहर कर देना चाहती है जो दूसरे देशों से आए? दूसरे देशों का यहां मतलब केवल बांग्लादेश से ही है।

इस सवाल का कोई जवाब ही नहीं है। अमित शाह और नरेंद्र मोदी दोनों सरकार नहीं भारतीय जनता पार्टी नामक एक पार्टी चला रहे हैं। इस पार्टी का अपना एजेंडा है। यह एजेंडा है भारत के संविधान को महत्वहीन बनाकर संघ के संविधान को लागृ करना। मेरे हिसाब से हर भारतीय को जो संविधान में यकीन रखता है, आगे बढ़कर अमित शाह जैसे मूर्ख और अहंकारी के खिलाफ आवाज बुलंद करनी चाहिए। अमित शाह के लिए भले ही उनकी पार्टी महत्वपूर्ण है लेकिन हम भारतीयों के लिए भारत सबसे पहले है।

लेखक फॉरवर्ड प्रेस, दिल्ली के सम्पादक (हिन्दी) हैं|

सम्पर्क-  nawal4socialjustice@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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