मुद्दा

अपारदर्शी तरीके से पारदर्शिता कानून में संशोधन

 

  • रोली शिवहरे

 

अंततः ‘सूचना के अधिकार कानून में संशोधन विधेयक-2019’ केन्द्र सरकार ने संसद में पेश कर ही दिया। इस संशोधन के बहाने सरकार ने जनता की माँग पर बने देश के पहले कानून को कमजोर करने की दिशा में कील ठोंक दी। हालाँकि सरकार ने पिछले साल भी मानसून सत्र में यह कोशिश की थी, लेकिन तब उसे अपने कदम पीछे खींचने पड़े थे। पिछली बार भी सरकार इस संशोधन को पिछले दरवाजे से लाई थी और इस बार भी तरीका वैसा ही है। पारदर्शिता और सुशासन का राग अलापने वाली इस सरकार का यह एक ऐसा कुटिल प्रयास है जिसमें पारदर्शिता दूर-दूर तक नहीं है। यानी न तो सरकार ने पहले इस विधेयक को संसद की स्थाई समिति के पास भेजा और न ही इस विधेयक पर जनता की राय ली गई, इसे सीधे संसद में प्रस्तुत कर दिया गया।

सवाल है कि ‘आरटीआई’ कानून में संशोधन के जरिए सरकार क्या और कौन-से बदलाव करना चाहती है? मीडिया के मुताबिक इस संशोधन से ‘केन्द्रीय सूचना आयुक्त’ ‘सूचना आयुक्तों’ और राज्यों के ‘मुख्य सूचना आयुक्तों,’ ’सूचना आयुक्तों’ के वेतन और कार्यकाल में बदलाव करने की शक्तियाँ केन्द्र सरकार को मिल जाएंगी। फिलहाल ‘आरटीआई’ कानून के तहत किसी ‘सूचना आयुक्त’ का कार्यकाल पांच साल या 65 साल की उम्र में से जो भी पहले पूरा हो, का होता है। इस संशोधन विधेयक के लागू होने पर सरकार तय कर सकेगी कि ‘सूचना आयुक्त’ का कार्यकाल कितनी अवधि का होगा। अभी तक ‘मुख्य सूचना आयुक्त’ और ‘सूचना आयुक्त’ का वेतन ‘मुख्य चुनाव आयुक्त’ और ‘चुनाव आयुक्त’ के समकक्ष रहता है। वहीं राज्यों के ‘मुख्य सूचना आयुक्त’ और ‘सूचना आयुक्त’ का वेतन ‘चुनाव आयुक्त’ और राज्य सरकारों के मुख्य सचिव के वेतन के समान होता है। मुजूदा ‘सूचना के अधिकार कानून’ में संशोधन करके सरकार ‘सूचना आयुक्त’ और ‘राज्य सूचना आयुक्तों’ का वेतन, भत्ता और अन्य सुविधाएं निर्धारित करने की व्यवस्था अपने हाथ में लेना चाहती है। इस संशोधन विधेयक पर सरकार का मत है कि इस संशोधन का उद्देश्य ‘आरटीआई अधिनियम’ को संस्थागत स्वरूप प्रदान करते हुए व्यवस्थित तथा परिणामोन्मुखी ढ़ांचा सम्पूर्ण रूप से करना है। सरकार का कहना है कि मुजूदा कानून में कई विसंगतियाँ हैं जिनमें सुधार की जरूरत है। ‘मुख्य सूचना आयुक्त’ को उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के समकक्ष माना जाता है, लेकिन उनके फैसले पर उच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है। सरकार ने कहा कि मूल कानून बनाते समय उसके लिए कानून नहीं बनाया गया था, इसलिए सरकार को यह विधेयक लाना पड़ा।

इसके ठीक उलट इस संशोधन विधेयक को लेकर सूचना अधिकार कार्यकर्ताओं के अपने पुरजोर तर्क हैं। ‘सतर्क नागरिक संगठन,’ दिल्ली की अंजलि भारद्वाज कहती हैं कि जब सरकार यह कह रही है कि यह बहुत ही जरुरी संशोधन है और इससे बहुत पारदर्शिता आएगी तो इसके विपरीत हमारा कहना है कि यह बोगस तर्क है। सरकार इस संशोधन के बहाने सूचनाओं को दबाने के लिए आयुक्तों की सेवा शर्तें अपने अनुसार करना चाहती है, ताकि आयुक्तों को सरकार की कठपुतली बनाया जा सके। सुश्री भारद्वाज कहती हैं कि यह ‘आरटीआई’ कानून की स्वायत्तता पर सीधा प्रहार है। पूर्व ‘केन्द्रीय सूचना आयुक्त’ श्रीधर आचार्युलु ने सांसदों को पत्र लिखकर उनसे ‘सूचना के अधिकार ;संशोधन; विधेयक-2019’ को पारित करने से रोकने की अपील की है। उन्होंने कहा है कि कार्यपालिका विधायिका की शक्ति को छीनने की कोशिश कर रही है। सभी सांसदों को लिखे एक खुले पत्र में श्री आचार्युलु ने पारदर्शिता की वकालत करते हुए कहा है कि इस संशोधन के जरिए मोदी सरकार ‘आरटीआई कानून’ को कमजोर करने की कोशिश कर रही है।

‘आरटीआई कानून’ का मूल मकसद है सरकार की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता सुनिश्चित करना। यह नागरिकों और सरकार के बीच सम्बन्धों का एक महत्वपूर्ण आधार है। हालांकि बीते कुछ समय से यह सम्बन्ध गड़बड़ाया हुआ है और इसे और खराब करने की पुरजोर कोशिश केन्द्र सरकार द्वारा ‘सूचना आयुक्तों’ के रिक्त पदों को भरने में की जा रही कोताही है। इस समय देश के ‘सूचना आयोगों’ में 50 हजार से ज्यादा आवेदन लंबित हैं, लेकिन ‘सूचना आयुक्तों’ के पद खाली पड़े हैं। ‘सूचना आयुक्तों’ की कमी को सुप्रीम कोर्ट ने ‘बहुत ही गम्भीर’ मसला बताते हुए केन्द्र और राज्यों को इन पदों पर नियुक्ति के लिए कहा था। यह बड़े ही दुर्भाग्य की बात है कि सरकार सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन करने की बजाय ‘आरटीआई कानून’ में ऐसा संशोधन विधेयक लेकर आई है जो इस कानून की बुनियादी क्षमताओं को ही कमजोर बना देगा। लोकतंत्र में बहुमत मिलने से मनमानी का अधिकार नहीं मिलता, लेकिन केन्द्र सरकार के हालिया काम तो यही बताते हैं कि सरकार बहुमत का उपयोग मनमानी में ही कर रही है। सत्रहवीं लोकसभा में अब तक पेश 11 विधेयकों में से एक को भी संसदीय समितियों के पास नहीं भेजा गया है, जबकि यह एक परिपाटी है जो जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों को बहस-मुबाहिसे का मौका उपलब्ध कराती है। आम लोगों के संघर्ष और माँग की दम पर आए ‘सूचना के अधिकार कानून’ में संशोधन करते समय सरकार ने जनता तक के सुझाव नहीं माँगे।

‘आरटीआई कानून’ के अनुसार हर भारतीय देश में किसी भी प्राधिकरण से दस रुपये के भुगतान के साथ सूचना प्राप्त कर सकता है। अगर नागरिकों को सूचना देने में आनाकानी की जाती है तो वे ‘सूचना आयुक्तों’ के सामने अपील कर सकते हैं जो अंतिम अपीलीय अधिकारी होते हैं। यही वजह है कि ‘सूचना आयुक्तों’ की स्वतंत्रता सूचना के अधिकार की धुरी है, लेकिन वर्तमान संशोधन के जरिए इस धुरी को कब्जे में लेने की कोशिश की जा रही है। ‘आरटीआई कानून’ में भी यह कहा गया है कि सूचना अधिकारी बिना किसी दूसरे प्राधिकरण के प्रभाव में आए अपनी शक्तियों का उपयोग करेंगे, लेकिन उन्हें अपने कार्यकाल के लिए सरकार पर निर्भर करा देना इस कानून की मूल भावना पर ही प्रहार है। ‘सतर्क नागरिक संगठन’ की रिपोर्ट के मुताबिक हर साल लगभग 60 से 80 लाख लोग ‘सूचना का अधिकार अधिनियम’ का इस्तेमाल करते हुए जानकारी के लिए आवेदन करते हैं। सरकार लोगों के इस महत्वपूर्ण अधिकार में सेंध लगाना चाहती है इसलिए वह यह संशोधन ला रही है। सरकार को लगता है कि यदि वह इस अधिनियम में संशोधन कर देगी तो भविष्य में उसे और मनमानी का अधिकार मिलेगा और वह खुलेआम भ्रष्टाचार का संरक्षण कर सकेगी।

लोकसभा में यह विधेयक ध्वनिमत से पारित हो गया है। अब देखना यह है कि राज्यसभा किस तरह की भूमिका निभाती है, हालांकि वहाँ भी मौजूदा सत्ताधारी दल का ही बहुमत है। यह देखना भी समीचीन होगा कि क्या वास्तव में जनता की माँग पर देश में बना पहला कानून वास्तव में पारदर्शिता की अपनी मूल भावना को सलामत रख पायेगा या यह कानून भी सरकार के हाथ की कठपुतली भर बन जाएगा।

 

लेखिका आरटीआई कार्यकर्ता, नेशनल कैम्पेन फॉर पीपुल्स राइट टू इन्फॉर्मेशन की कार्यकारिणी समिति की सदस्या हैं तथा भोपाल स्थित ‘आवाज’ संस्था से जुड़ी हैं|

सम्पर्क- +919425466461, rollyshivhare@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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