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अखिल गोगोई और किसान आन्दोलन

 

  • राजन पाण्डेय 

असम के सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले अंग्रेजी दैनिक- ‘द असम ट्रिब्यून’ ने इस संगठन और उसके नेता का अघोषित बहिष्कार कर रखा है. भाजपा और कांग्रेस दोनों की सरकारों ने इसके नेता को “माओवादी”, “देशद्रोही” और “राष्ट्र की सुरक्षा के लिए खतरा” मानकर जेल में डाला. कई स्थापित राजनीतिकों और बुद्धिजीवियों के लिए वह जरुरत से ज्यादा रेडिकल है. लेकिन इन तमाम पूर्वाग्रहों के बावजूद यही लोग दबी जुबान से यह भी स्वीकार करते हैं कि अखिल गोगोई और उनकी कृषक मुक्ति संग्राम समिति असम में गरीबों की बात करने वाले जनांदोलनों की सशक्त आवाज़ है, और उसके प्रभाव को नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता.

आन्दोलन और राजनीति की पाठशाला का पुराना छात्र

2  अक्टूबर 1976 को असम के जोरहाट जिले में जन्मे अखिल गोगोई ने गुवाहाटी के प्रसिद्द कॉटन कॉलेज से अंग्रेजी साहित्य की पढाई की. कॉटन में अपने छात्र जीवन के समय से ही वे राजनीति में सक्रिय हो गए थे और अपने एक्टिविज्म के चलते कॉलेज छात्रसंघ के महासचिव भी बने. कुछ समय क्रन्तिकारी वामपंथी धारा के संगठनों के साथ काम करने के बाद वे जाने माने मार्क्सवादी आलोचक और विचारक हीरेन गोहाईं के साथ स्वतन्त्र मार्क्सवादी पत्रिका “नोतून पदातिक” के संपादक भी रहे.

बाद के दौर में अखिल गोगोई भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष में आर.टी.आई. एक्टिविस्ट की भूमिका में उतरे. 2005 में उन्होंने कृषक मुक्ति संग्राम समिति की स्थापना की और उसके पहले संस्थापक-महासचिव बने. इसी साल उन्होंने गोलाघाट में कई करोड़ रुपये के एक बड़े राशन घोटाले का पर्दाफाश किया. इसके लिए 2008 में उनको षण्मुगम मंजुनाथ इंटीग्रिटी अवार्ड से भी सम्मानित किया गया, जिससे उन्हें राष्ट्रीय पहचान मिली. आगे चलकर देश भर में भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़े हुए ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ आन्दोलन से जुड़े और असम में इसके संयोजक भी बने. आन्दोलन से राजनैतिक पार्टी बनाने के सवाल पर उनका अरविन्द केजरीवाल और उनके साथियों से मतभेद हो गया, और वे आई.ए.सी. से बाहर आकर असम और उत्तर पूर्व में किसानों, आदिवासियों, महिलाओं और छात्रों के आंदोलनों को खड़ा करने और धार देने के पुराने टास्क पर लौट आये.

 

कुछ अलग किस्म की किसान राजनीति:

उत्तर और दक्षिण भारत के अधिकांश किसान संगठन न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने, अधिक सब्सिडी, बकाया भुगतान, खाद-बीज-पानी की समुचित सप्लाई जैसे किसानों से जुड़े मुद्दों पर संघर्ष करते हैं. इससे इतर, कृषक मुक्ति संग्राम समिति भूमि अधिकारों के अलावा नरेगा, जनवितरण प्रणाली, सरकारी मशीनरी के भ्रष्टाचार और ‘चिटफंड’ की तरह के कार्पोरेट भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर ज्यादा सक्रिय रहती है. ऐसे में, ‘मुख्यधारा’ के चश्मे से देखें तो ‘टिपिकल’ किसान संगठन के ढाँचे में वह फिट नहीं आती. लेकिन इसका एक बड़ा कारण उत्तर और पूर्वी भारत की ‘किसान’ की परिभाषा में भी निहित है.

जहाँ उत्तर भारत के भारतीय किसान यूनियन जैसे किसान संगठन और महेंद्र सिंह टिकैत, चौधरी चरण सिंह जैसे किसान नेता भूमिहीन खेत मजदूरों, बटाईदारों को किसान मानने से ही इंकार करते रहे हैं वहीँ पूर्व और उत्तर पूर्व में यही तबके अंग्रेजी राज के समय से ही किसी भी किसान आन्दोलन की रीढ़ रहे हैं. समिति के असम अध्यक्ष राजू बोरा कहते हैं- “चूँकि भूमिहीन होने या कम जमीन होने के चलते सरकारी सस्ते राशन पर इनकी निर्भरता बहुत ज्यादा होती है इसलिए जन वितरण प्रणाली और अन्य कल्याणकारी योजनाओं के भ्रष्टाचार का सबसे ज्यादा नुकसान इन्हें झेलना पड़ता है. साथ ही साथ ‘चिटफंड’ जैसे निजी आर्थिक घपलों का भी सबसे ज्यादा नुकसान इन्हीं लोगों को होता है क्यूंकि यही लोग अपनी बचत का पैसा इन स्कीमों में लगाते हैं. इसी के चलते संग्राम समिति के लिए ये मुद्दे ‘किसान मुद्दे’ हैं और वह इन्हें लेकर गंभीर रहती है.”

साथ ही साथ समिति की किसान की परिभाषा में मछुवारे, पशुपालक वगैरह भी आते हैं और इसीलिए बड़े बांधों से मछुवारों को होने वाले नुक्सान को भी वह किसानों का मुद्दा ही मानती है. इस तरह देखें तो समिति की किसान की परिभाषा हरित क्रांति के दौर के कुलक (?) किसान संगठनों की तरह संकीर्ण नहीं, बल्कि ‘ला विया काम्पेसिना’ जैसे अंतर्राष्ट्रीय किसान नेटवर्क की भांति उदार और समावेशी है, जिसमें जमीन से आजीविका अर्जित कर रहे गरीब से गरीब आदमी के लिए जगह है.

 

सरकारी दमन के बावजूद जारी है लड़ाई:

अपने आंदोलनों के क्रम में समिति और उसके नेताओं को कई बार सरकारी दमन का सामना करना पड़ा है, और लाठीचार्ज, फायरिंग, जेल आदि का सिलसिला चलता रहता है. सितम्बर 2017 में नागरिकता संशोधन विधेयक के खिलाफ बयान देने के लिए अखिल गोगोई पर राष्ट्रद्रोह और बाद में रासुका के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया, जिसके बाद उन्हें 105 दिन तक जेल में रहना पड़ा था; वे अब तक कांग्रेस और भाजपा दोनों की सरकारों की मेहरबानी से दर्जनभर बार से ज्यादा जेल यात्रायें कर चुके हैं. 2010 में कांग्रेस सरकार के दौर में एक खुफिया रिपोर्ट में उनपर माओवादियों से सांठ-गाँठ करने का आरोप लगा था, पर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की चौतरफा आलोचना झेलने के बाद सरकार ने इसपर कोई कार्यवाही करने से हाथ खींच लिए. लेकिन 2011 में गुवाहाटी की पहाड़ियों में बसे गरीबों के विस्थापन के खिलाफ मुहिम चलाने के लिए उन्हें जेल जाना पड़ा था. 2011 में ही बांध विरोधी आन्दोलन के चलते समिति के प्रदेश अध्यक्ष राजू बोरा समेत 17 लोगों को लखीमपुर जेल में डाल दिया गया था.

 

विस्थापन और बाँध विरोधी मुहिम

असम की राजधानी गुवाहाटी छोटी छोटी पहाड़ियों से घिरा हुआ एक शहर है. रोज़ी-रोटी की तलाश में राज्यभर से गरीब लोग गुवाहाटी आते हैं, और गरीबी के चलते उन्हें रहने के लिए इन पहाड़ों का आसरा लेना पड़ता है. इन पहाड़ियों पर घर बनाने वाले मूलतः मजदूर या रेडी-पटरी का काम करने वाले लोग होते हैं, जिनके पास शहर में झोंपड़ी बनाने लायक संसाधन भी नहीं होते. 2011 की जुलाई में यहाँ घर बनाकर रह रहे गरीब लोगों का जबरन विस्थापन शुरू हुआ. अधिकारियों का तर्क था कि ये घर और कॉलोनियां अवैध थीं क्योंकि कब्जाधारकों के पास जमीन के वाजिब दस्तावेज नहीं थे. साथ ही एक तर्क यह भी था कि गुवाहाटी के ये पहाड़ और उनकी हरियाली शहर के लिए स्वच्छ हवा देने का काम करते हैं और यहाँ घर बना कर ये लोग गुवाहाटी के अन्य नागरिकों के लिए खुली हवा मिलना भी दूभर कर देंगे. जब इनके विस्थापन के खिलाफ किसी भी राजनैतिक दल ने चूं तक न की तो संग्राम समिति ने इसके खिलाफ मोर्चा खोला और यहाँ रहने वालों के लिए जमीन पट्टों की मांग की. विस्थापन विरोधी प्रदर्शन पुलिस दमन के चलते हिंसक हो गया और आखिर में पुलिस फायरिंग में समिति से जुड़े तीन लोग मारे गए जबकि हिंसक झडपों के चलते 43 लोग घायल हो गए, जिनमें कई पुलिसकर्मी भी थे. नागरिक समाज के तमाम लोगों, राजनैतिक दलों और सरकार के विरोध के बावजूद समिति ने इस मुद्दे पर संघर्ष जारी रखा और जबरन विस्थापन को रुकवाया.

इसके अलावा संग्राम समिति उत्तर पूर्व के संवेदनशील इलाके में बड़े बांधों का विरोध भी कर रही है. उसका कहना है कि असम-अरुणाचल प्रदेश का क्षेत्र भूकंप के प्रति अति संवेदनशील है और भूकंप के चलते यदि किसी बड़े बाँध को नुकसान हुआ तो निचले क्षेत्रों के लोग जल प्रलय का शिकार हो जायेंगे. साथ ही साथ बड़े बांधों से नदी के जलीय जंतुओं, मछुवारों और किसानों को भी काफी नुकसान होता है. इसलिए समिति इस क्षेत्र में प्रस्तावित 160 से ज्यादा बड़े बांधों का विरोध कर रही है. इसी के चलते संग्राम समिति के कार्यकर्ता 2009 से ही गेरुकामुख में बन रहे एनएचपीसी के 2000 मेगा वाट लोअर सुबानसिरी बाँध का विरोध कर रहे हैं. दिसंबर 2011 से उन्होंने बाँध की निर्माण सामग्री को गेरुकामुख ले जा रहे वाहनों को रोकने के लिए रास्ता बंद कर रखा है. 2011 में एक बाँध विरोधी रैली में मेधा पाटकर ने भी गुवाहाटी आकर इस अभियान को अपना समर्थन दिया था.

 

चुनाव भी हैं संघर्ष का एक मंच, जिसका बहिष्कार ठीक नहीं:

यूँ अखिल ने आई.ए.सी. के लोगों द्वारा राजनैतिक दल बनाने के निर्णय का विरोध किया था, लेकिन 2015 में उन्होंने खुद गण मुक्ति संग्राम, असम नाम के राजनैतिक दल की घोषणा की. द वायर को दिए जनवरी 2018 के एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा है कि अरविन्द केजरीवाल का विरोध उन्होंने राजनैतिक दल बनाने को लेकर नहीं, बल्कि इस काम में जल्दबाजी करने को लेकर किया था. उन्होंने यह भी कहा कि आरएसएस-भाजपा की जन विरोधी राजनीति का मुकाबला करने के लिए जन-आंदोलनों को चुनावी राजनीति में भी उतरना होगा और इसी के चलते उन्होंने गण मुक्ति संग्राम असम की स्थापना की है.

 

किसानों के मुद्दे पर जारी रहेगी जंग-

अखिल गोगोई का कहना है की वर्तमान सरकार ने किसानों के साथ भारी छल किया है. मोदीजी ने चुनावों से पहले हर खेत को पानी देने की बात कही थी पर 2017 के बजट में देशभर में सिंचाई के लिए सिर्फ 45 हज़ार करोड़ रुपये का ही प्रावधान किया गया जो ऊंट के मुंह में जीरा है. साथ ही किसानों की कई समस्याओं पर सही समाधान बताने वाली स्वामीनाथन कमिटी की सिफारिशें लागू करने से भी केंद्र सरकार साफ़ साफ़ मुकर गयी है. भाजपा की केंद्र और राज्य सरकारें कृषि भूमि को औने पौने दामों पर कॉर्पोरेट घरानों को दे रही हैं. ऐसे में जहाँ पिछली कांग्रेस सरकार कॉर्पोरेट का काम करती थी वहीँ मौजूदा सरकार कॉर्पोरेट की जेब में है, और इसीलिए उसे सबक सिखाने का समय आ गया है.

अखिल मानते हैं कि संस्थागत वाम पार्टियां अब विकल्प देने की स्थिति में नहीं रह गयी हैं और ऐसे में, देश में चल रहे मौजूदा संकटों का हल जनांदोलनों की एकता से ही निकलेगा. कृषक मुक्ति संघर्ष समिति और उसके अनुषांगिक संगठन ऐसी ही एकता कायम करने की मुहिम में जुटे हैं.

लेखक इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ़ साइंस एजुकेशन एंड रिसर्च, मोहाली में पोस्ट डॉक्टरल रिसर्चर हैं|

सम्पर्क- +919013140566, rajan.liberation@gmail.com

लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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