आँखन देखी

एक राजा ऐसा भी

 

  • नवल किशोर कुमार

 

प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी आज 17 सितम्बर 2019 को 69 साल के हो गये। जाहिर तौर पर बधाई संदेश तो बनता ही है। राजा चाहे जैसा भी हो, प्रजा का काम है राजा की खुशियों में शामिल होना। फिर चाहे वह राजा किसी रानी के पेट से जन्मा हो या फिर गणतांत्रिक तरीके से जनता ने अपने वोट के जरिए राजा बनाया हो। हर राजा का चरित्र एक जैसा ही होता है। आधुनिक भाषा में इसे स्टेट कहते हैं। हिन्दी में कहना चाहें तो राज्य।

इससे पहले कि प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी को बधाई दी जाय, कुछ बातें अतीत की कर लेते हैं। आप यह न समझें कि मैं आपको नरेन्द्र मोदी के अतीत की बात बताने जा रहा है। मैं जिस अतीत की बात कर रहा हूं, दरअसल वह इतिहास का विषय है। अकादमिक जगत के लोग तो इस अतीत से वाकिफ होते हैं परन्तु जाने क्यों आम जनता के बीच इस इतिहास को क्यों नहीं प्रसारित किया जाता। यह अतीत भारत में मानव सभ्यता के विकास से जुड़ा है। हालांकि सभ्यता का विकास केवल एक भारत में थोड़े न हुआ है, यह तो विश्व के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग रूपों में हुआ। जैसे अपने यहां सिंधु घाटी सभ्यता तो पश्चिमी देशों में रोमन सभ्यता।

दरअसल, सत्ता यानी राज्य का अस्तित्व भारत के संदर्भ में कब आया, इसे लेकर निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता है। संभव है कि विश्वविद्यालयों तक सीमित इतिहासकारों के पास इसका जवाब भी हो, लेकिन जैसा कि पहले कहा कि अकादमिक जगत और आम आदमी की दुनिया में बहुत बड़ा फांक है। जितना कुछ अबतक इतिहास में जनसामान्य को राज्य द्वारा बताया गया है, भारत का इतिहास मतलब राजाओं का इतिहास। किस राजा ने कब किस राजा को हराया। कब कौन सी लड़ाई हुई और कौन राजा बना? बहुत हुआ तो यह कि किस राजा का कौन बेटा था, कौन पोता और कौन परपोता था।

 

इतिहास का मतलब आम जनता के लिए केवल इतना ही है। भारत की सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग केवल यही बताना चाहते हैं देश के लोगों को। इससे अधिक बताने से कई सवाल खड़े होंगे। वैसे सवाल खड़े भी होने चाहिए। इतिहास होता ही है सवाल खड़ा करने के लिए। तो मैँ आपको बता रहा था भारत का इतिहास। सिंधु घाटी सभ्यता को यदि प्रस्थान बिंदू मानें तो अबतक जितनी बार भी सत्ता बदली कुछेक अपवादों को छोड़कर हिंसक तरीके अपनाए गए। यहां तक कि सिंधु घाटी सभ्यता के पतन का कारण भी आपसी वर्चस्व को लेकर हुआ संघर्ष ही रहा होगा। इतिहासकारों की यह दलील नहीं जमती कि किसी प्राकृतिक आपदा के कारण सिंधु घाटी सभ्यता जैसा विकसित नागरीय व्यवस्था एक झटके में खत्म हो गयी हो। सिंधु घाटी सभ्यता को लेकर आकर्षण विश्व के अलग हिस्सों में रहने वालों को जरूर हुआ होगा। ऐसे भी यह सभ्यता कोई छोटे-मोटे भूभाग तक सीमित नहीं था। हड़प्पा (अब पाकिस्तान में) से लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ तक विस्तार के सबूत फिलहाल मिले हैं। अभी भी 85 फीसदी उन स्थलों पर उत्खनन कार्य होने शेष हैं जहां सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेष मिलने की संभावना भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने व्यक्त की है।

बाद के दिनों में भारत में सत्ता को लेकर जो संघर्ष हुए, वे खूनी ही थे। आर्य भारत की धरती पर आए तब हिंसा हुई। आर्य जीते और यहां के मूलनिवासी हार गए। बाद में हूण और शक आदि भी आए। खून की नदियां बही। बुद्ध के समय भी भारत के महाजनपदों पर राज करने के लिए जो भी राजा सामने आया, उसने खून ही बहाया। फिर चाहे वह बिम्बिसार हो या फिर उसका बेटा आजातशत्रु। उसके बाद जब नंद वंश का दौर आया तब भी हिंसा हुई। नंद वंश का प्रभाव करीब 22 वर्षों तक रहा। उसके तीसरे राजा धननंद को चंद्रगुप्त मौर्य ने चाणक्य के नेतृत्व में पराजित कर दिया। लाशें गिरी। उसके बाद वृहद्रथ को भी अकाल मौत ही मिली जब उसके करीबी पुष्यमित्र शुंग ने उसे धोखे से मार दिया। मुसलमानों का भारत आगमन भी ऐसे ही हुआ और अंग्रेजों का भी। 1857 में सत्ता बदलने का संग्राम भी हिंसक ही था। हालांकि तब अंग्रेज अधिक शक्तिशाली थे। उसके विरोधी मारे गए और भारत में ब्रिटिश हुकूमत का झंडा बुलंद हुआ।

सत्ता के लिए खून बहाना ही भारत का इतिहास रहा। इसमें बदलाव 1947 में आया। सत्ता बदल रही थी। देश के दो टुकड़े जरूर हुए लेकिन सत्ता के लिए हिंसक संघर्ष नहीं हुआ। हालांकि दंगे जरूर भड़के, लेकिन वह भी इसलिए कि देश को धर्म के आधार पर बांटा गया था। भारत के लोग इंसान से अधिक या तो हिन्दू थे या फिर मुसलमान।

लोकतांत्रिक व्यवस्था ने राज्य के स्वरूप के पूरी तरह बदल दिया। चुनाव में बहुमत प्राप्त करने वाले दल का मुखिया प्रधानमन्त्री बनेगा। प्रधानमन्त्री अपनी कैबिनेट बनाएंगे। प्रधानमन्त्री अपनी कैबिनेट के सहयोग से राष्ट्रपति का चयन करेंगे और फिर राष्ट्रपति संवैधनिक तौर पर राष्ट्र प्रमुख। तीनों सेनाओं के इंचार्ज से लेकर बहुत कुछ।

लोकतांत्रिक व्यवस्था ने सत्ता के लिए चुनाव को महत्वपूर्ण बना दिया और चुनाव में वोट कमाने पड़ते हैं। जनता को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए तमाम तरह के प्रलोभन दिए जाते हैं। कहीं-कहीं तो आकर्षित करने की जरूरत ही नहीं पड़ती है। प्रलोभन देने के अप्रत्यक्ष तरकीबें भी खूब ईजाद हो चुकी हैं। हिन्दू का वोट चाहिए तो मुसलमानों को गालियां दो। सभी मुसलमानों को आतंकवादी बना दो। बस इतना ही काफी होता है बहुसंख्यक हिन्दू समाज को छलने-ठगने-लूटने के लिए।

प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी का राजनीति में बुलंदियों पर पहुंचने के लिए हिंसा एक कारगर हथियार साबित हुइ। गुजरात के दांगों ने उन्हें उच्च जाति के हिन्दुओं की नजर में हीरो बना दिया। मुसलमान नरेन्द्र मोदी का नाम सुन बिदकने लगे। संघ को इसका ही इंतजार था। भारत भले ही धर्म निरपेक्ष राष्ट्र है लेकिन असली चरहित्र कुछ और ही है।

वैसे नरेन्द्र मोदी को इस बात का श्रेय/पाप जरूर है कि उन्होंने पहले गांधी का अहिंसक और बाद में समाजवादी गुजरात को भगवावादी बना दिया। जब लोग धर्म के नाम पर फैलाए गए भ्रमजाल में फंसकर उन्मादी बन वोट देंगे तो जीत किसकी होगी। जाहिर तौर पर नरेन्द्र मोदी को 2014 में मिली जीत उनकी इसी राजनीति की जीत थी। हिंसक राजनीति की जीत। इस साल जो उन्हें ऐतिहासिक जीत मिली, उसकी बुनियाद भी धर्म आधारित राजनीति है।

तो कहने का मतलब यह है कि प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी हिंसक राजनीति के मुखौटा हैं। हां, आपने बिल्कुल सही सुना। वे मात्र मुखौटा हैं। मुखौटा से बात नहीं बन रही हो तो उस डमरू बजाने वाले खिलौना रूपी बंदर को याद करें। जितनी चाबी भरी जाएगी उतना ही डमरू बजाएगा बंदर।

 

फिर भी कुछ बातें सकारात्मक हैं भारत के नये राजा में। वह सत्ता वर्ग का नहीं है। उन्होंने खुद कई अवसरों पर कहा है कि व्यापार उनके खून में है। यानी वह बनिया हैं। बनिया को मुनाफा चाहिए। यह मुनाफा उन्हें भारत की ऊंची जाति के लोगों से चाहिए। इसके लिए यदि वे कारपोरेट की हाथों का खिलौना भी बन जाते हैं तो क्या आश्चर्य। नरेन्द्र मोदी के बारे में एक सकारात्मक तथ्य यह है कि वे भारत की सामाजिक व्यवस्था को स्वीकार करते हैं। मनुवादी व्यवस्था को बनाए रखना चाहते हैं। लेकिन सत्ता में फिर से कोई ऊंची जाति का आदमी शीर्ष पर नहीं बैठे। अमित शाह को अपना उत्तराधिकारी बनाकर उन्होंने अपनी मंशा स्पष्ट कर दी है।

यह भारत में सत्ता संघर्ष का बदलता हुआ स्वरूप है। आने वाले समय में भी ऊंची जातियों के लोग प्रत्यक्ष तौर पर शीर्ष पर नहीं रहेंगे।

कहना गलत नहीं कि नरेन्द्र मोदी आज के चाणक्य हैं। लेकिन बाह्मण नहीं, बनिया चाणक्य। आपको जन्मदिन की खूब सारी बधाई और यह कामना कि हम भारत के लोग आपके राज में मॉब लिंचिंग के शिकार न हों।

लेखक फॉरवर्ड प्रेस, दिल्ली के सम्पादक (हिन्दी) हैं|

सम्पर्क-  naval4socialjustice@gmail.com

.

Facebook Comments
. . .
सबलोग को फेसबुक पर पढ़ने के लिए पेज लाइक करें| 

लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *