मैं कहता आँखन देखी

एक किताब ऐसी भी

 

  • नवल किशोर कुमार

 

अच्छा एक बात बताइए कि यदि आपकी भाषा अच्छी है तो कूड़े को आप क्या लिखेंगे? क्या आप उसे रसगुल्ला लिख सकते हैं? मतलब यह कि यदि आप पत्रकार हैं और आपको किसी घोटाले की खबर लिखनी है तो आप उसे घोटाले की खबर के रूप में ही लिखेंगे न। ऐसा तो नहीं ही होगा कि आप उसे कोई और रूप दे दें। लेकिन ऐसा नहीं है। वर्तमान में जो पत्रकारिता के तौर-तरीके हैं, वह आपको कूड़े को रसगुल्ला लिखने को बाध्य कर सकता है। आपको घोटालों वाली खबर को जनता पर मेहरबानी के जैसी खबर के रूप में पेश करना पड़ सकता है। मसलन, फलां महान नेता पर घोटाले का आरोप सरासर गलत है। उस फलां नेता ने अपने इलाके में गंगा किनारे इतने घाट बनवाए, इतने मंदिर बनवाए, कई मस्जिदों का जीर्णोद्धार कराया और इतने स्कूल-कॉलेज बनवाए। खबर से यह लगना चाहिए कि घोटाला करने वाला नेता ने धरती पर जन्म लेकर धरती पर अहसान किया है।पत्रकारिता में आए इस तरह के बदलावों को प्रमोद रंजन ने ‘रामकीरत की रीढ़’ शीर्षक कहानी में उदृधृत किया है। युवा पत्रकार और साहित्यकार के रूप में चर्चित प्रमोद रंजन ने अपनी इस किताब में उन हालातों का जिक्र किया है जो उन्होंने हिमाचल प्रदेश में भोगा-जीया और महसूस किया है। बिहार की राजधानी पटना के एक मध्यम आयवर्गीय परिवार के प्रमोद रंजन ने बतौर पत्रकार अपनी शुरुआत हिमाचल में की। रामकीरत की रीढ़ कहानी में उन्होंने एक पत्रकार के उस हालात को दर्ज किया है जो उसे रीढ़ विहीन बनने पर मजबूर कर देता है।

उनकी यह कहानी नब्बे के बाद देश में पूंजीवादी व्यवस्था का रिफ्लेकशन है। हालांकि इसके संकेत नब्बे के पहले भी दिखने लगे थे जब प्रबंधन संपादकीय कार्यों में घुसपैठ करने लगा था। शायद आपने ‘न्यू देहली टाइम्स’ फिल्म देखी हो। यह फिल्म 1985 में आयी थी। गुलजार की लिखी कहानी पर बनी इस फिल्म में शशि कपूर नायक हैं जो पेशे से पत्रकार हैं। फिल्म के एक दूसरे दृश्य में विकास पांडे के खिलाफ एक रिपोर्ट को लेकर अपने मुख्य संपादक से मिलता है। उसके संपादक कहते हैं कि रिपोर्ट में लिखे गए तथ्यों का कानूनी रूप से जांचना-परखना जरूरी है क्योंकि रिपोर्ट मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार के खिलाफ है। वह विकास से एक दिन का समय देने को कहते हैं। अगले दृश्य में विकास पांडे अपने मालिक के बेटे के साथ बैठा है। बड़ा मालिक अस्पताल में है और उसके बेटे ने अखबार का प्रबंधन संभाल लिया है। वह विकास पांडे से कहता है कि रिपोर्ट तो अच्छी है लेकिन इसे छापना संभव नहीं होगा। विकास पांडे कहता है कि उसे हैरानी हो रही है कि उसने अपनी रिपोर्ट अपने संपादक को दी थी, वह मैनेजमेंट के पास कैसे पहुंची।

प्रमोद रंजन के अनुभव नवउदारवादी युग में पत्रकारिता के हैं। पत्रकार अब कांट्रैक्ट पर काम करने वाला मजदूर है जिसके सारे अधिकार प्रबंधन ने छीन रखा है। वह चाहे भी तो मुंह नहीं खोल सकता है। वह दावा भी नहीं कर सकता है क्योंकि प्रबंधन के पास ऐसे लोगों की कोई कमी नहीं है जो उससे कम पैसे में कूड़े को रसगुल्ला लिखें।

किताब के पहले हिस्से में प्रमोद रंजन ने अपनी डायरी को रखा है। इसका शीर्षक है -‘हम स्वप्नों की तलाश में गए थे पहाड़ों की ओर’। यह डायरी पाठकों को एक नौजवान के मन में उठने वाले सवालों और सवालों के बीच जीवन के अंत:संबंध से जोड़ते हैं। प्रमोद रंजन ने 19 अक्टूबर 2003 को लिखा है – डायरी क्यों लिखता हूं? इसलिए कि समय पर अपने भूत के उतार-चढ़ावों को देख सकूं। यह एक तरह का रचनात्मक कार्य भी है और मन:स्थितियों को दर्ज कर देना एक तरह के विरेचन को राहत देता है। एक तरह से यह तात्कालिक मनोभावों, घटनाओं और परिवेशगत प्रभावों की प्राथमिकी है।

प्रमोद रंजन

दूसरे हिस्से में प्रमोद रंजन युवा कवि और कहानीकार के रूप में सामने आते हैं। उनकी डायरी के पन्नों को पढ़ने के बाद उनकी कविताओं  और कहानियों में निहित सवालों को आसानी से समझा जा सकता है। उपर में वर्णित रामकीरत की रीढ़ इसी खंड का हिस्सा है। तीसरा खंड साहित्यिक आलोचना का है। भूमंडलीकरण के मेले में पहाड़ और यशपाल के हिमाचली होने का अर्थ आदि लेखों से इक्कीसवीं सदी के पहले दशक के आरंभिक वर्षों में हिमाचल के साहित्यिक परिधि में हुई गतिविधियों से रू-ब-रू हुआ जा सकता है। विपाशा के कविता अंक से गुजरते हुए लेख में कविताई के क्षेत्र में हो रहे बदलावों को लेकर एक युवा साहित्यकार किस रूप में महसूस करता है और उसके लिए इन बदलावों के मायने क्या हैं, यह समझा जा सकता है।

चौथा खंड ‘पौड़ियों के अरे-परे’ है। पौड़ियां मतलब पहाड़ों पर बनी सीढ़ियां। इस खंड में एक लेख हिंदी के चर्चित साहित्यकार रहे कमलेश्वर की अनोखी प्रेम कहानी पर आधारित है। अपने इस लेख में प्रमोद रंजन ने बताया है कि “प्रिया दी ने 14 वर्षों तक कमलेश्वर से प्रेम किया। लेकिन उन्हें देखा उनकी मृत्यु के एक महीना पहले। क्या यह तप था? यदि हां तो इस तपस्या का हासिल क्या है? शायद वह कहेंगी ‘जीवन’। कमलेश्वर ने उन्हें जीवनदान दिया!”

अपनी किताब के अंतिम हिस्से में प्रमोद रंजन हिमाचल प्रदेश का मौखिक इतिहास बताते हैं। वह इतिहास जो कहीं दर्ज नहीं है। दर्ज है तो वह लोगों के जेहन में। उनके जीवन में। सुदूर दुर्गम इलाकों जैसे पांगीऔर किन्नौर के लोगों का इतिहास। यह इतिहास लोगों के साक्षात्कार पर आधारित है। इसमें इतिहास के अलावा वर्तमान भी शामिल है जो कि लामावाद और देवतावाद के बीच पेंडूलम की तरह डोल रहा है। प्रमोद रंजन यह भी बताते हैं कि अब इस पेंडूलम की गति को अनियमित बनाया जा रहा है। इस खंड में वे एक जोमो से मुलाकात कराते हैं। जोमो यानी महिला बौद्ध भिक्षु। एक स्त्री को बौद्ध भिक्षु बनने के लिए किस तरह के नियमों का पालन करना पड़ता है, इसका सविस्तार वर्णन है। वह बाल नहीं रख सकती। वह कोई श्रृंगार नहीं कर सकती। वह बस में सफर नहीं कर सकती क्योंकि पुरूषों के स्पर्श से उसकी पवित्रता खंडित हो सकती है। इसी खंड में प्रमोद रंजन किन्नौर के अमीर लामा से मिलते हैं जो उन्हें वहां बहुपति प्रथा के बारे में बताते हैं। उनके मुताबिक, एक महिला के कई पति हो सकते हैं। ये पति आपस में भाई होते हैं। ठीक वैसे ही जैसा महाभारत में द्रौपदी का वर्णन है। यह प्रथा आज भी है। अमीर लामा खुद बहुपति प्रथा मानते हैं।

बहरहाल, प्रमोद रंजन की यह किताब रूहानी सुकून देने वाली किताब है। इसमें किसी एक तरह के विचार से बंधे रहने की बाध्यता नहीं है। मन करे तो हिमाचल की नैसर्गिक प्राकृतिक नजारे देख लें। मन यदि आशिकाना हो तो प्रमोद रंजन की कविता टिकुली पढ़ लें और मन यदि साहित्यकार होना चाहे तो समालोचना के नये आयामों को पढ़ लें। यही आजादी इस किताब की खासियत है।

समीक्षित पुस्तक : शिमला डायरी
लेखक : प्रमोद रंजन
प्रकाशक : द मार्जिनलाइज्ड पब्लिकेशन, नई दिल्ली
मूल्य : 350 रुपए (सजिल्द)
संपर्क : 8130284314

 

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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