मुद्दा

चिकित्सा शिक्षा में फैकल्टी की कमी पूरा कर सकते है 70 हजार डिप्लोमा डॉक्टर्स

 

  • अजय खेमरिया

 

देश की चिकित्सा शिक्षा से मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के विघटन के बाद भी तमाम ऐसे पहलू है जिन पर आज भी सरकार के स्तर पर सुधार की आवश्यकता है। मसलन शिक्षकीय कौशल के पुनगर्ठन पर नए सिरे से विचार किया जाना चाहिये। आज देश मे नए सरकारी  मेडिकल कॉलेज तो दनादन खोले जा रहे है लेकिन उनकी गुणवत्ता पर सरकार का कतई ध्यान नही है। सभी नए और पुराने कॉलेज फैकल्टीज की समस्या से पीड़ित है। एमसीआई ने जो मानक निर्धारित कर रखे है उनकी अनुपालना यदि बरकरार रखी जाए तो देश मे कभी भी फेकल्टी की समस्या का समाधान संभव नही है। मसलन पीजी डॉक्टर ही शिक्षकीय कार्य कर सकता है उसे पहले किसी कॉलेज में सीनियर रेजिडेंट के रूप में या फिर सहायक प्राध्यापक के रूप में अनुभव अनिवार्य है। इस प्रावधान के चलते देश भर में चिकित्सा शिक्षकों का अकाल इसलिए है क्योंकि कोई भी क्लिनिकल प्रेक्टिस वाला डॉक्टर अपनी मोटी कमाई खुले बाजार में करने की जगह सरकारी सिस्टम में अफसरशाही से अपमानित होने के लिये नही आना चाहता है। दूसरी बड़ी विसंगति यह है कि देश भर के पीजी डिप्लोमा डॉक्टर्स को मेडिकल एजुकेशन सिस्टम से बाहर करके रखा गया है। पीजी के समानांतर ये डिप्लोमा भी दो साल में होता है अगर इन डिप्लोमाधारी डॉक्टर्स को फैकल्टी के रूप में अधिमान्य किया जाए तो इस शिक्षकीय टोटे से निबटा जा सकता है। देश मे इस समय लगभग 70 हजार पीजी डिप्लोमा डॉक्टर्स है। नए मेडिकल बिल में सरकार ने डिप्लोमा को खत्म कर सीधे डिग्री का प्रावधान कर दिया है। यानी अब केवल डिग्री कोर्स ही चलेंगे मेडिकल एजुकेशन में। लेकिन इन 70 हजार पेशेवर डिप्लोमा डॉक्टर्स पर कोई नीति नही बनाई इधर 75 नए मेडिकल कॉलेज खोलने की अधिसूचना जारी हो चुकी है और जो 80 कॉलेज हाल ही में मोदी सरकार ने खोले थे वहाँ फैकल्टीज की समस्या बनी हुई है। बेहतर होगा सरकार डिप्लोमा डॉक्टर्स को  फैकल्टी के रूप में मान्यता प्रदान कर दे क्योंकि बुनियादी रूप से पीजी (एमडी एसएस) और डिप्लोमा में कोई बड़ा अंतर नही है।Related image

पीजी औऱ डिप्लोमा डॉक्टर्स दोनो ही साढ़े चार साल का स्नातक पाठ्यक्रम पूरा करते है। दोनो समान रूप से मेडिकल कॉलेज में एक बर्ष का इंटर्नशिप पूरा करते है। गांवों के लिये सेवा देने का बांड भी समान रुप से भरने का प्रावधान हो या फिर एक ही प्रवेश परीक्षा नीट पीजी पास कर दाखिला लेना। पीजी और पीजी डिप्लोमा में बड़ा अंतर नही है। दोनों की कक्षाएं एक ही है एक ही पाठ्यक्रम एक ही इंटरनल, एक्सटर्नल, कॉलेज लैब, फैकल्टी  सब कुछ एक जैसा होता है पीजी और पीजी डिप्लोमा में। बस एक अंतर यह है कि पीजी में दाखिला पाए डॉक्टर को तीसरे साल में एक थीसिस जमा करनी होती है जिसके आधार पर उसे पीजी की डिग्री मिल जाती है और वह मेडिकल कॉलेजों में पढ़ाने के लिये पात्र हो जाता है। विसंगतियों का प्रावधान देखिये डिप्लोमा धारी डॉक्टर मेडिकल कॉलेज में सीनियर रेजिडेंट बन सकता है वह कॉलेज के अस्पतालों में नए पीजी स्टूडेंट्स को अनोपचारिक रूप से पढा सकता है वहां उनको क्लिनिकल, ऑपरेशन, और दूसरी विधाओं में ट्रेंड कर सकता है लेकिन फैकल्टी नही बन सकता है। एक रोचक विसंगति यह भी है कि नॉन मेडिको यानी जो एमबीबीएस भी नही है उसके लिये मेडिकल कॉलेज में प्रोफेसर से लेकर डीन तक बनने के रास्ते खुले है। फिजियोलॉजी, एनाटोमी, बायोकेमिस्ट्री जैसे विषय जो एमबीबीएस पहली साल में पढ़ाये जाते है उनके सहायक प्रोफेसर सामान्य बीएससी-एमएससी करके भी फैकल्टी बन जाते है फिर डीन तक जाते है। लेकिन एक पीजी डिप्लोमा प्राप्त डॉक्टर जीवन भर न पढ़ाने की पात्रता हासिल कर पाता है न ही उसे कोई प्रमोशन मिलता है। कुछ साल पहले तक तो विदेश से डॉक्टरी पढ़कर आये लोग सीधे फेकल्टी बन जाते थे।

Image result for chikitsa shiksha

आज देश भर में इन डिप्लोमा डॉक्टर्स की उपयोगिता को अधिकतम स्तर पर सुनिश्चित किये जाने की आवश्यकता है। मोदी सरकार ने अपने पहले कार्यकाल मे 80 और इस कार्यकाल में 75 नए मेडिकल कॉलेज खोलने को मंजूरी दी है। फिलहाल देश मे 479 मेडिकल कॉलेज है। जिन 75 नए कॉलेजों को इस साल मंजूरी दी गई उनमें से 31 की अधिसूचना जारी हो चुकी है ये सभी कॉलेज देश के पिछड़े जिलों में खोले जा रहे है यहां पहले से मौजूद जिला अस्पतालों को इनसे संबद्ध कर दिया गया है। जाहिर है जिला अस्पताल ही अब मेडिकल कॉलेज के अस्पताल के रूप में काम करेंगे। 80 नए मेडिकल कॉलेजों के अनुभव बताते है की सभी जगह काबिल फैकल्टी का संकट है जाहिर है कागजी खानापूर्ति करके एलोपी हासिल करने के लिये फैकल्टी दिखाए जा रहे है ताकि नए कॉलेज शुरू किये जा सके। चूंकि ये सभी कॉलेज दूरदराज के जिलों में खोले गए है जहां शहरीकरण बड़े महानगरों जैसा नही है इसलिये अपने क्षेत्र के ख्यातिप्राप्त डॉक्टर यहां फैकल्टी के रूप में आना नही चाहते है जो 75 नए कॉलेज अभी खोले जा रहे है वे और भी पिछड़े जिलों में है जाहिर है करोडों की धन खर्ची के बाबजूद अगर फेकल्टी नही होंगे तो इन कॉलेजों के माध्यम से जन आरोग्य का मोदी मिशन फेल हो सकता है। इसलिये सरकार को इस दिशा में बहुत ही गंभीरता के साथ विचार कर पीजी डिप्लोमा डॉक्टर्स को फैकल्टी के रूप में अधिमान्य करना होगा। फिलहाल देश मे 70 हजार ऐसे डॉक्टर्स है अगर इनमें से आधे भी इस कार्य मे सहमति के साथ काम करने के लिये आगे आते है तब एक बड़ी समस्या मेडिकल कॉलेजों से जुड़ी दूर हो सकती है और इस विधा की गुणवत्ता भी दूषित नही होगी।

Image result for chikitsa shiksha

सरकार के स्तर पर एक बुनियादी निर्णय यह भी होना चाहिये कि जब जिला अस्पताल नए मेडिकल कॉलेजों से संबद्ध किये जा रहे तब वहां पदस्थ सभी विशेषज्ञ डॉक्टरों को भी उनकी वरीयता के हिसाब से टीचिंग कैडर दे दिया जाए क्योंकि जो नए शिक्षक भर्ती किये जाते है उनसे ज्यादा क्लिनिकल, औऱ सर्जरी का अनुभव इन डॉक्टरों के पास है। सरकार संभव है आने वाले समय में देश के सभी जिला अस्पताल को मेडिकल कॉलेजों से संबद्ध करेगी इसलिये  बेहतर होगा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर सभी पीजी डॉक्टरों को प्रवेश के साथ ही पदस्थ करे और महीने में तय दिन थ्योरी क्लास के लिये जिला अस्पताल या उस कॉलेज में बुलाये इससे ग्रामीण भारत मे डॉक्टर्स की कमी स्वतः ही खत्म हो जाएगी क्योंकि तीन तीन साल बाद रोटेशन से नए पीजी बैच गांव के अस्पताल में आते रहेंगे। फैक्ट यह है कि वर्तमान में देश मे कुल 10.40 लाख डॉक्टर रिजस्टर्ड है इनमें से सिर्फ 1.2लाख ही सरकारी सेवा में है। भारत मे 67 फीसदी नागरिक  इलाज का खर्च खुद अपनी जेब से उठाते है।

लेखक जिला बाल कल्याण समिति के अध्यक्ष है|

सम्पर्क-  +919109089500, ajaikhemariya@gmail.com

.

Facebook Comments
. . .
सबलोग को फेसबुक पर पढ़ने के लिए पेज लाइक करें| 

लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *