साहित्यसिनेमा

दलित रंगमंच उर्फ बर्रे के छत्ते पर ढेला

अमूमन इस तरह के शीर्षक पारसी नाटकों के होते है। आलेख के लिए इस तरह का शीर्षक रखना कहाँ तक उचित है, ये तो लेख के अंत तक जाते – जाते स्पष्ट होगा। वैसे भी शीर्षक किसी कविता, कहानी, आलेख का मुकुट होता है। सारी बातें शीर्षक में ही खोल देना जायज नहीं है। एक रहस्य तो होना ही चाहिए। पर संपूर्णता की अंतर्निहिता भी आवश्यक है। मधुमक्खी का छत्ता ऊपर से बड़ा शांत नजर आता है, सन्नाटा भी छाया रहता है उसके इर्द – गिर्द। कामगार मधुमक्खियां छत्ते से बाहर निकलती हैं और फूल – पौधों से जो रस निकाल कर लाती हैं, यत्नपूर्वक सामूहिक ढंग से बटोरते रहती है। भसड़ तब फैलता है जब उस शांत, सब कुछ ठीक – ठाक चल रहे छत्ते पर कोई ढेला मार देता है। छत्ता फटता नहीं है कि एक साथ ढ़ेर सारे बर्रे निकलते हैं और चारों तरफ फैलकर भिन्न – भिन्नाना शुरू कर देते हैं।

आजकल इस तरह के परिदृश्य आपको फेसबुकव्हात्सप्प जैसे सोशल मीडिया पर देखने को सहज सुलभ हो जायेंगे जब रंगमंच के शांत माहौल में दलित रंगमंच का कोई ढेला फेंक देता है। बर्रे की तरह फेसबुक के पन्नों से रंगकर्मी जिन्हें आप जानते भी न हो, जिनसे आपका कभी वास्ता भी न रहा हो, निकल – निकल कर आने लगते हैं और डंक मारने लगते हैं। जरूरी नहीं कि ये बर्रे केवल रंगकर्म से ही जुड़े हो, दूसरी जगहों के भी जबरन टपक पड़ते हैं। उनका आपसी भाईचारा इतना प्रगाढ़ होता है कि कोई भी मुद्दा हो, संस्कृति से लेकर राजनीति तक जबरदस्त यारी निभाने लगते हैं। परस्पर तालमेल भी इतना रहता है कि आवाज लगाने की भी जरूरत नहीं पड़ती है। एक – दूसरे को ये जानते भी न हो तो भी पहचान लेते हैं। सरनेम देखकर ही उनके अंदर का अपनत्व जोर मारने लगता है। इसलिए जब भी, जहां भी दलित रंगमंच का कोई राग छेड़ता है, प्रायः एक ही तरह के सरनेम वाले एकजुट हो जाते हैं और मारने लगते हैं, तड़ातड़ सवालों के डंक।

प्रायः पहला वार इसी सवाल से करते हैं कि ये दलित रंगमंच क्या है? ऐसा नहीं है कि सवाल करने वाले पहली बार इस नाट्य शब्द से परिचित हो रहे हो। दलित एक सामान्य सा शब्द है। राजनीति में तो काफी सालों से प्रचलन में है। साहित्य के लोग भी इससे अनजान नहीं हैं। न राजनीति और साहित्य से जुड़े लोगों को इस शब्द से कोई विशेष एलर्जी है। नाटक की दुनिया में भी प्रायः कोई न कोई शब्द आये दिन जुड़ते ही रहते हैं।  पिछले कुछ दशकों में एब्सर्ड थिएटर, मनोशारीरिक थिएटर, पुअर थिएटर, थर्ड थिएटर, स्ट्रीट थिएटर,ब्लैक थिएटर जैसे कई शब्द हमारे बीच आये और अपनी अवधारण को लेकर चर्चा के केंद्र में भी रहे। किसी ने न इनका विरोध किया, न आपत्ति की, न इसके विरुद्ध कोई मोर्चा खोला। फिर दलित थिएटर के प्रति जिस तरह के रिएक्शन्स सोशल मीडिया और रंग जगत के बीच इनदिनों आ रहे हैं, किस मानसिकता के परिचायक हैं?

पिछले दिनों ‘ समकालीन रंगमंच ‘ के संपादक राजेश चंद्रा ने अपने व्हात्सप्प ग्रुप ‘ नया रंगविमर्श ‘ पर बहस चलाने के क्रम में स्वाभाविक ढंग से ‘ दलित रंगमंच ‘ का मुद्दा उठाया। इसके पहले किसी न किसी रूप में मैंने भी फेसबुक पर पोस्ट डालने के बहाने इस मुद्दे को रखा हैं। जब – जब इस सवाल पर बात करने की कोशिश की गई है, प्रतिक्रियाएं काफी उत्तेजक, अराजक रही है। जहां तक मुझे याद है, ‘ नया रंगविमर्श ‘ व्हात्सप्प ग्रुप में 26 अक्टूबर 2016 को यह बहस प्रारंभ हुई थी जो तकरीबन 15 दिनों तक लगातार, कभी धीमी तो कभी तीव्र गति से चली। फेसबुक पर किश्तों में कई बार चली है जिसकी तारीख स्मरण में नहीं है। फिलहाल ज्यों व्हात्सप्प पर दलित थिएटर को रखा गया, पुंज प्रकाश का तत्काल रिएक्शन आया कि राजपूत थिएटर, ब्राह्मण थिएटर, भूमिहार थिएटर, लाला थिएटर, सरदार थिएटर भी शुरू हो? फिर गोरा थिएटर, सांवला थिएटर, काला थिएटर, मोटा थिएटर, पतला थिएटर, लंबा थिएटर, नाटा थिएटर भी शुरू हो तो कोई बुराई तो नहीं?

रमेश खन्ना भी इसकी सुर में सुर मिलाने का मौका कहाँ छोड़ने वाले थे? उसी में अपना और रंग दे दिया। दलित खुशी और दलित गम। दलित सुख और दलित दुःख। दलित हँसी, दलित परिहास। दलित अंधेरा, दलित उजाला। एनएसडी की स्नातक विधु खरे ने दलित शास्त्रीय संगीत कहा तो फिर से रमेश खन्ना ने लंबी तान खिंची, दलित पिज़्ज़ा, दलित समोसा। विधु खरे ने संगत दी, दलित नदी- दलित समंदर। दलित शेर । अभिषेक खरे ने इसमें कुछ और जोड़ दिया, दलित क्रिकेट -फुटबॉल -दलित कुश्ती। शिबू गौर ने फरमाया कि और भी कोई जाति हो तो फिर उनका भी होना चाहिए। इस पर विधु खरे ने ताल ठोका – कायस्थ रंगमंच, इस पर मेरा कॉपी राइट होगा। नीरज कुंदेर ने ठहाका लगाया – हा हा हा।

अतुल श्रीवास्तव भी कहाँ मानने वाले थे, आ गए अखाड़े में। आवाज लगाई, अगड़ा रंगमंच – पिछड़ा रंगमंच – दलित रंगमंच – सवर्ण रंगमंच – शौकिया रंगमंच – पेशेवर रंगमंच आदि ये चक्कर क्या है?

अनिल पतंग ने तो शाप ही दे दिया, सत्यनाशी रंगमंच। मनोज मिश्रा ने कहा कि दलित रंगमंच अभी तक मेरी जानकारी में कल्पना है, कुछ स्पष्ट नहीं है। बकैती है। अनिल तिवारी ने स्वीकारा कि मेरी समझ के बाहर का है ये सब। अभिषेक पंडित को कन्फ्यूज़न हुआ, रंगकर्म में दलित? या दलित का रंगकर्म? या दलित पर रंगकर्म? या दलित के लिए रंगकर्म? या दलित के नाम पर रंगकर्म? या रंगकर्म ही दलित? इस दुविधा पर किसी ने लंबी उबासी ली, यार रंगमंच को रंगमंच ही क्यों न रखा जाय। दलित रंगमंच, ब्राह्मण रंगमंच, ये रंगमंच, वो रंगमंच क्यों? इस पर अभिषेक पंडित उसके दर्द को सहलाते हैं, भई परेशान न हो, कुछ लोगों ने नई दूकान खोली है, उसकी मार्केटिंग का टैग लाइन है – दलित रंगमंच।

अखिलेश नारायण एक नए ज्ञान बोध के साथ फेसबुक पर प्रकट होते हैं और उपदेश देते हैं कि रंगमंच की कोई जाति नहीं होती। न इसका कोई धर्म होता है। कुछ लोग पता नहीं क्यों हर चीज में धर्म और जाति खोजने लगते हैं? आह्वान भी किया, कला को विभाजित मत करो, थिएटर को जाति में न बांटो।

जिस तरह दलित रंगमंच का नाम आते लोग ब्राह्मण – राजपूत – कायस्थ रंगमंच का राग अलापने लगते हैं यानी जातियों से संबंधित रंगमंच का नाम लेने लगते हैं, क्या दलित रंगमंच से वो जातिगत ध्वनि आती है? दलित रंगमंच से कौन सी जाति का स्वर उभरता है? पुंज प्रकाश  जिस तर्ज पर ब्राह्मण रंगमंच या भूमिहार रंगमंच शुरू करने की दलील देते हैं, वो एक विशिष्ट जाति को संबोधित करता है।

दलित किसी विशिष्ट जाति का पर्याय नहीं है। एक समाज के लिए बना शब्द है। भले इस समाज में निम्न जाति के लोग हैं लेकिन किसी खास जाति के लिए यह शब्द उपयोग में नहीं है। वर्णवादी व्यवस्था में चार वर्ण होते हैं। ब्राह्मण – क्षत्रिय – वैश्य और शूद्र। सामाजिक और राजनीतिक स्तर से समाज में ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के सबल होने के कारण लोगों की दृष्टि में हमेशा उच्च रहे हैं, जिनके प्रति लोगों का कोई भेद – भाव नहीं रहा। सवर्ण होने के नाते समाज में आदरणीय और पूजनीय रहे हैं। सत्ता पर भी किसी न किसी रूप में इसी वर्ण का काबिज रहा है। प्रत्यक्ष या परोक्ष सत्ता पर नियंत्रण हमेशा से ब्राह्मणवादी धारा का ही रहा है। साहित्य व संस्कृति की मुख्यधारा पर ब्राह्मणवाद की ही वर्चस्वता रही है। शूद्र जिनका कार्य ही है तीनों वर्णों की सेवा करना, एक जाति के नहीं होते हैं। किसी को खेती करनी होती है, किसी को पशु पालना होता है, किसी के जिम्मे सफाई का कार्य होता है तो किसी को और विभिन्न तरह के कार्य। चूँकि सनातन धर्म उच्च- नीच और श्रेष्ठता की बुनियाद पर टिकी है, इसलिए हर जाति दूसरे से श्रेष्ठ होती है या निम्न। केवल जाति तक होती तो बात समझ में भी आती, यहां तो गोत्र में भी वही रामकहानी है। कोई गोत्र बड़ा है तो कोई छोटा। कोई उच्च है तो कोई निम्न।

इस लिए जो दलित रंगमंच का नाम आते किसी जाति विशेष से जोड़ लेते हैं, वो भ्रामक धारणा है। आज शूद्र वर्ण ही दो भागों में विभक्त है। शूद् और अतिशूद्र। शूद्र वर्ण में प्रायः पिछड़ी जातियां होती हैं। और अतिशूद्र में अधिकतर वो जातियां है जो वर्षों से अस्पृश्यता का शिकार रही हैं। उनके साथ इस स्तर पर अमानवीय व्यवहार हुआ है। वैसे पिछड़ी जातियां भी अस्पृश्यता से बच नहीं पायी हैं। लेकिन अतिशूद्र वर्ण के साथ सवर्णों ने जो सलूक किया है या आज भी देश के कोने – कोने में कर रहे हैं, कोई छुपा नहीं है। दलित शब्द जो आज प्रचलन में है, अतिशूद्र वर्ण के लोगों को ही संबोधित करता है। और दलित वर्ग में कोई एक जाति नहीं होती है। सौ से ऊपर जातियां इस वर्ग में आती है। इसी तरह का आंकड़ा शूद्र या कहे पिछड़ी जातियों का भी है। इसलिए जो रंगकर्मी दलित रंगमंच का नाम सुनते ब्राह्मण रंगमंच, भूमिहार रंगमंच, कायस्थ रंगमंच का राग अलापने लगते है, वो उनके अंदर की जातिगत कुंठा है जो किसी न किसी में फूट कर निकल रही है। अगर वे ब्राह्मण रंगमंच या राजपूत रंगमंच की कल्पना कर रहे हैं, तो वे मुक्त हैं स्थापना करने के लिए। और ऐसा नहीं है कि इस दिशा में लोग प्रयत्नशील नहीं है। राजनीति के क्षेत्र में तो इन्होंने पहले से ही कुंवर सेना, रणवीर सेना, ब्रह्मर्षि सेना का गठन कर जातिगत संकीर्णता का परिचय दे चुके हैं। अगर राजनीति की तरह संस्कृति के क्षेत्र में ब्राह्मण या राजपूत रंगमंच का गठन करते हैं तो ये रंगमंच जरूर जातिवादी रंगमंच कहलायेगा। क्योंकि इस तरह का रंगमंच केवल अपनी जाति को महिमामंडित करने का काम करेगा। अपनी जाति तक सीमित रहेगा इस रंगमंच का दायरा। जबकि दलित रंगमंच के दायरे में कोई विशिष्ट जाति नही होती है, एक व्यापक समाज होता है जिनके साथ जाति के स्तर पर भेद – भाव, अमानवीय व्यवहार होता रहा है। दलित रंगमंच सत्यनाशी रंगमंच नहीं है, प्रतिरोध का रंगमंच है जो समाज में जड़ जमाये वर्णव्यवस्था की असमानता के विरुद्ध जमीन तैयार कर रहा है। जो कह रहे हैं कि दलित रंगमंच समाज में जाति भावना को फैला रहा है, निर्मूल – निराधार है। दलित रंगमंच तो कुछ वर्षों की अवधारणा है, ये जातियां हमारे देश में हजारों वर्षों से है। और ये जातियां हमारे साहित्य, संस्कृति में हमेशा से किसी न किसी रूप में जीवित रही हैं, बल्कि पल्लवित – पुष्पित रही हैं। इसमें धर्म की भी खूब भूमिका रही है। रंगमंच में कई ऐसे उदाहरण मिल जाएंगे, जहां शूद्र समाज के प्रति क्या व्यवहार हो, स्पष्ट वर्णित है। शूद्र पात्रों की क्या भाषा हो, उनके बैठने की जगह कहाँ निर्धारित हो, एक सोच के तहत तय किया जाता था। नाटक में नायक के निर्धारण के प्रति संस्कृत नाटक का जो नज़रिया था और उस नजरिये के मूल में कौन सा दृष्टिकोण था, किसी से छुपा नहीं है।

जिस तरह हमारे धर्म, समाज में वर्षों से वर्ण विभाजन रहा है, जाति का वजूद रहा है, नाटक इससे बचा नहीं है।

जो लोग रंगमंच को शुद्धता से देखते हैं, उन्हें राजदरबारों में फ़लने – फूलने वाले रंगकर्म की धारा को जानने की जरूरत है, जहां नाटक के नायक के लिए उच्च वर्ण का होना अनिवार्य बताया गया है। संस्कृत नाटकों के लिए नायक उच्च वर्ण का सब गुण सम्पन्न, श्रेष्ठ चरित्र वाला ही हो सकता है। सेवक , कारीगर जैसे पात्रों के लिए निम्न वर्ण के ही चरित्र गढ़े जाते थे। यहीं नही, भाषा के प्रति भी इनका जातिवादी नजरिया होता था। उच्च वर्ण के पात्र के लिए संस्कृत तो निम्न वर्ण के लिए प्राकृत, पाली जैसी भाषा तय रहती थी। प्रेक्षागृह में भी जाति के आधार पर स्थान निर्धारित होता था। ये तो सत्ता से जुड़े रंगकर्म के प्रति समाज का व्यवहार था, जो रंगमंच सत्ता से दूर, लोगों में था, उनके प्रति क्या दृष्टिकोण था, इसे जानना हो तो कौटिल्य के ‘ अर्थशास्त्र ‘ के पन्नों को पलटे जिसमें उन्होंने नट – नटियों की आचारहीनता की ओर संकेत किया है और नगरपालिकाओं तथा पंचायतों पर जोर डाला है कि वे नटों – बाजीगरों, मदारियों और तमाशा करनेवालों को नगर के समीप न फटकने दें। इनके लिए नगर के बाहर ही बस्ती बनायी जाये। ‘ अर्थशास्त्र ‘ में ही नाट्यशालाओं का विरोध करते हुए यह भी लिखा गया है कि ये गॉवों में नहीं बनायी जानी चाहिए। क्योंकि इससे ग्रामीणों के काम में बाधा पहुंचती हैं।

रंगमंच को जाति में बाँटनेवाले अकेले कौटिल्य ही नही है, इसकी लंबी श्रृंखला है जो तब से आजतक अनवरत जारी है। आश्चर्य है, जो कहते नही अघाते हैं कि रंगमंच में जाति नहीं है, इन वर्णवादी दृष्टांतों पर गौर क्यों नहीं फरमाते है? अधिकतर संस्कृत नाटकों में राजाओं और सामन्तों की स्तुति कोई संयोगवश नहीं है। नाटकों के नायक के चयन के पीछे भी नाटककारों का यही मंशा रहती थी कि वह उच्च वर्ण का हो। इसी परंपरा का निर्वाह मुख्य धारा के भारतीय सिनेमा में आजतक चलती आ रही है। बहुसंख्यक आबादी को जान बूझकर नजरअंदाज कर उच्च वर्ण को नायकत्व देने का ट्रेंड है। धर्म से जुड़े होने और ईश्वर का प्रतिनिधि साबित करने के बहाने ब्राह्मण सत्ता के शीर्ष पर तो नहीं रहा, लेकिन धर्म, परंपरा, संस्कृति का भय दिखा- दिखा कर राजा हो या सामंत दोनों को अपने वश में रखता था। संस्कृत नाटकों में राजा के साथ प्रायः मित्र के रूप में विदूषक होता है जो ब्राह्मण ही होता है, वो मनोरंजन के साथ – साथ समाज की बुराइयों की पोल खोलता है या वक्रोक्ति का सहारा लेते हुए रूढ़िवादी तथा प्रतिगामी शक्तियों की खिल्ली उड़ाते हुए दिखता है। लेकिन यह चरित्र वर्ण, जाति के कारण समाज में जो भेदभाव है, उस पर कोई व्यंग्य, टिप्पणी करता हुआ नहीं दिखता है।

एक जुमला और फेंका जाता है कि दलित रंगमंच करनेवाले या उस पर बात करनेवाले जातिवादी होते हैं, जाति को फैलानेवाले लोग हैं।

कितनी सच्चाई है इस आरोप में?

उपरोक्त मिथकों, कथाओं, उद्धरणों ने मेरे ख्याल से काफी कुछ स्पष्ट कर दिया होगा। वर्ण और जाति किसने बनायी और इनके बनाने के पीछे क्या उद्देश्य था, जगजाहिर है। वर्ण और जाति के आधार पर जो असमानता, गैरबराबरी, अस्पृश्यता फैला रहे थे और आज भी किसी न किसी रूप में इसका समर्थन कर रहे हैं, ऐसे लोगों की संख्या कम नहीं है। लेकिन आश्चर्य होता है कि जो इसमें लिप्त हैं, वही दूसरों पर आरोप लगा रहे हैं। उल्टा चोर कोतवाल को डांटे? इनका वश चले तो बुद्ध, महावीर, चार्वाक, कबीर, रैदास, फुले, पेरियार और अम्बेडकर पर भी जातिवादी होने का आरोप लगा दे? उनके साहित्य, दर्शन, राजनीति को जाति फैलाने वाला साबित कर खारिज कर दे?

दलित रंगमंच की मुख्यधारा बुद्ध, कबीर, रैदास, फुले से लेकर अम्बेडकर के चिंतन और आंदोलन से जुड़ी है। संस्कृति के क्षेत्र में विशेष कर रंगमंच के माध्यम से दलित थिएटर ऊंच – नीच पर आधारित समाज व्यवस्था को खारिज करती हुई मनुष्यता की पक्षधर है। वर्ण और जाति पर टिकी संस्कृति जो असमानता की हिमायती है, उसे नकार कर समानता और बरोबरी को पुर्नस्थापित करना ही दलित रंगमंच की प्रस्तावना है।

बेहतर होगा कि भारतीय रंगमंच की इस धारा को किसी जातिगत ग्रंथि से ग्रस्त होने के बजाय राजनीतिक, सामाजिक धरातल से जोड़कर देखने का प्रयास करें और इसकी जड़ में क्या है, वैज्ञानिक ढंग से विचारें, तभी भारतीय रंगमंच रूढ़ियों से मुक्त होगा। और एक के बाद एक नये विचारों के स्वागत के लिए तैयार रहेगा।

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